दृष्टिकरण

आजादी के बाद जब हिंदुस्थान के दो टुकड़े कर दिए गए और कुछ मतांधों ने धर्म के नाम पर अपना एक अलग राष्ट्र बना लिया तो हिंदुस्थान ने सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल कायम करते हुए अपने राष्ट्र को सेकुलर घोषित किया और यहां रहनेवालों को पूरी धार्मिक आजादी दी गई। किसी भी धर्म के माननेवालों को समान अधिकार दिए गए। इस्लाम के नाम पर अलग राष्ट्र की मांग करनेवाले मुसलमानों को भी मताधिकार का अवसर मिला और मुख्यधारा में उन्हें स्वीकार किया गया, जिसके कारण राजनैतिक दलों में मुसलमानों के मतों के ध्रुवीकरण की भावना ने जोर पकड़ा और तुष्टिकरण की राजनीति शुरू हुई। इस्लाम के माननेवालों को अंधेरे में रखकर केवल धर्म के नाम पर उन्हें बेवकूफ बनाया गया और उनके मत पाने के लिए उनकी शिक्षा और सामाजिक उन्नति जैसे बुनियादी प्रश्नों पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। आम मुसलमान पढ़ाई-लिखाई से वंचित रहकर छोटे-मोटे काम करते रहे और गुट बनाकर विशेष दलों को मत देते रहे। तुष्टिकरण की राजनीति ने समाज और देश को बहुत नुकसान पहुंचाया। अब देश के जो हालात हैं उसे देखते हुए यह मानना पड़ता है कि तुष्टिकरण की राजनीति आजकल दुष्टिकरण की राजनीति में बदल गई है। बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की सरकार ने दुष्टिकरण की राजनीति में सारे कीर्तिमानों को पीछे छोड़ दिया है। वहां अराजकता का बोलबाला है। गुंडागर्दी अपनी चरम सीमा पर है। दूसरे दलों को माननेवाले लोगों का कत्लेआम किया जा रहा है। हमारा देश तुष्टिकरण से ही परेशान था, दुष्टिकरण से तो उसकी नाक में दम आ गया है। सभी राजनीतिक दलों को एकजुट होकर वैंâसर की तरह समाज में पैâल चुके दुष्टिकरण का इलाज ढूंढ़ना होगा अन्यथा हमारा देश खंड-खंड भी हो सकता है।