देवता को विधिक मान्यता देनेवाला निर्णय

हिंदुस्थान का मन प्रसन्न है। सारी दुनिया के राम आस्थालु उत्सव में हैं। सर्वोच्च न्यायपीठ ने अयोध्या विवाद पर ऐतिहासिक पैâसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्ववाली संविधान पीठ ने सर्वसम्मत निर्णय में श्री रामलला को विवादित भूमि का स्वामी बताया है। देवता को विधिक मान्यता देनेवाला यह निर्णय भारतीय संस्कृति का पोषक है। कोर्ट ने मस्जिद निर्माण के संबंध में शालीन टिप्पणी की है कि मस्जिद खाली जगह पर नहीं बनाई गई थी। भारतीय पुरातत्व एजेंसी- ए.एस.आई. द्वारा की गई खुदाई के तथ्यों व रिपोर्ट के आलोक में कोर्ट ने सम्यक विचार किया है। ए.एस.आई. रिपोर्ट में साढ़े तीन हजार बरस ईसा पूर्व का लेखाजोखा है। ई.पू. ३५०० वर्ष से १००० ई. पूर्व तक अयोध्या एक बस्ती के रूप में मिलती है। शुंग काल (२००-१००ई.पू.), कुषाण काल (१००ई.-३००ई.) और गुप्तकाल (४००ई-६००ई.) तक यहां बस्तियां हैं। सिक्के हैं। अभिलेख हैं। कलाकृतियां हैं। देवी भी हैं। इसके बाद के स्तरों से मंदिरों के अवशेष हैं। रिपोर्ट के अनुसार एक गोलाकार विशाल मंदिर दसवीं सदी में बना। इसके उत्तर में जलाभिषेक का प्रवाह निकालनेवाली नाली भी है। फिर एक दूसरे मंदिर का जिक्र है। यहां भारतीय परंपरा का प्रतीक कमल है। वल्लरी हैं। ५० खंभों के आधार मिले थे। काले पत्थरों के खंभों के अवशेष भी थे। यह मंदिर लगभग १५०० ई. तक रहा। पुरातत्व विभाग की यह रिपोर्ट लगभग ५०० ई. तक एक भव्य मंदिर के होने का साक्ष्य देती है। इसके आगे का इतिहास बाबर का है। कहा जाता है कि सन् १५२८ में बाबर के सिपहसालार मीरबाकी ने इसी मंदिर को गिराकर बाबरी मस्जिद बनवाई।
ए.एस.आई. ऐरी-गैरी संस्था नहीं है। हिंदुस्थान की संस्कृति और सभ्यता के पक्ष में काम कर रही एशियाटिक सोसाइटी के तर्कों अभियानों के बरक्स लार्डकर्जन के जरिए ए.एस.आई. की स्थापना (१९०४) में हुई थी। इसी ए.एस.आई. ने हड़प्पा और मोहनजोदड़ो खोजे थे। दयाराम साहनी ने हड़प्पा (१९२०-२१) और राखालदास बनर्जी ने मोहनजोदड़ो (१९२१-२२) की खोज की। यही खोज प्राचीन सिंधु घाटी की सभ्यता का पुख्ता सबूत बनी थी। ए.एस.आई. की इसी खुदाई का लाभ उठाकर आर्यों को विदेशी आक्रमणकारी बताया गया लेकिन अयोध्या खुदाई पर शोर मचाया गया था। इन्हीं इतिहासकारों ने ए.एस.आई. की रिपोर्ट के आधार पर आर्यों को विदेशी आक्रमणकारी सिद्ध किया। तब ए.एस.आई. उनके लिए विश्वसनीय और मुफीद थी। कुषाणकाल की सभ्यता इसी ए.एस.आई. के जरिए प्रकाश में आई थी। सम्राट अशोक के समय के अभिलेख ए.एस.आई. ने ही लगभग पचास बरस पूर्व खोजे। इलाहाबाद (उ.प्र.) संग्रहालय में मौजूद ए.एस.आई. के खोजे एक ही शिलालेख में गुप्तों के अभिलेख, समुद्रगुप्त का ‘प्रयाग प्रशस्ति’ और जहांगीर का विवरण दर्ज है। हिंदुस्थान की प्राचीन मंदिर संस्कृति के सबूत ए.एस.आई. के परिश्रम से ही अस्तित्व में आए। बौद्ध धम्म, दर्शन और स्थापत्य की तमाम गवाहियां ए.एस.आई. ने ही जुटाई थी। कोर्ट ने ए.एस.आई. के साक्ष्यों को महत्वपूर्ण माना है।
न्यायालय का परिश्रम प्रशंसनीय है। उसने लगातार ४० दिन सुनवाई की। साक्ष्य सुनें। तर्क सुने। लगभग ८० हजार पृष्ठों तक विस्तृत न्यायायिक कार्यवाही से तथ्य निकाले गए। निर्मोही अखाड़ा व शिया वक्फ बोर्ड के दावे खारिज किए गए। अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के निर्माण के लिए ट्रस्ट गठन का काम सरकार को सौंपा गया है। मस्जिद निर्माण के लिए अयोध्या में अन्यत्र ५ एकड़ जमीन देने के निर्देश भी कोर्ट ने दिए। हिंदुस्थान के न्यायायिक इतिहास में यह पैâसला वर्षों पुराने विवाद का अंत करनेवाला है।
सारी दुनिया के हिंदू राम जन्मभूमि पर श्रद्धा करते हैं। जन्मभूमि के प्रति श्रद्धा का जन्म किसी न्यास, एक्शन कमेटी या राजनीतिक दल के प्रस्तावों से नहीं हुआ। श्रद्धा लोकजीवन का परिपूर्ण विश्वास होती है। लोकविश्वास तथ्य देखता है। तर्क उठाता है। प्रतितर्क करता है। विचार-विमर्श करता है। करोड़ों आंखें देखती हैं। करोड़ों कान सुनते हैं। करोड़ों हाथ स्पर्श करते हैं। करोड़ों हृदय एक साथ स्पंदित होते हैं। समय के आयामों का ऐसे तथ्यों पर जब कोई फर्क नहीं पड़ता तब श्रद्धा जन्म लेती है। राम जन्मभूमि के प्रति हिंदुस्थान की श्रद्धा है। श्रद्धालुओं को इसीलिए बेचैनी थी। न्यायालयीन कार्यवाहियों की देरी उदास करती थी। तथ्य अभिलेख और पुरातत्व के साक्ष्य थे। इतिहास के विद्वान कनिंघम ने भी ‘लखनऊ गजेटियर’ में लिखा है ‘अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर तोड़े जाते समय हिंदुुओं ने अपनी जान की बाजी लगा दी। (लखनऊ गजेटियर अंक ३६ पृष्ठ ३) आईने अकबरी भी कहती है ‘अयोध्या में राम जन्मभूमि की वापसी के लिए हिंदुओं ने तमाम प्रयास किए थे।’ उदारमना हिंदू जनमानस व्यथित था।
सर्वोच्च न्यायालय के पैâसले से इतिहास के मध्यकाल की आक्रामक गलती सुधारने की राह आसान हुई है। मध्यकाल में सैकड़ों मंदिर ढहाए गए थे। ऐसे अवशेष राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली सहित अनेक क्षेत्रों में हैं। सोमनाथ का ध्वंस भारतीय इतिहास की त्रासद घटना थी। यह मंदिर आधुनिक काल में सरदार पटेल के नेतृत्व में पुननिर्मित हुआ था। कोर्ट के इस निर्णय से अध्योध्या में हुए ध्वंस के पुनर्निमाण का अवसर मिला है। यह विवाद एक लंबे अर्से से हिंदू मानस की व्यथा था। हिंदू मन आंदोलित था, उद्वेलित भी था। देश की सर्वोच्च न्यायपीठ ने साक्ष्यों और तमाम अभिलेखों के आधार पर यह निर्णय किया है।
संविधान हिंदुस्थान के लोगों की निष्ठा है। सर्वोच्च न्यायालय उच्चस्तरीय संवैधानिक संस्था है। इस निर्णय में वादी-प्रतिवादी में से किसी की भी जय या पराजय नहीं हुई। संविधान की सर्वोपरिता ही सिद्ध हुई है। दस्तावेज और साक्ष्य सामने हैं। उभय पक्षों के विद्वान अधिवक्ताओं की बहसें भी ऐतिहासिक दस्तावेज हैं। कोर्ट में पारदर्शी विचारण हुआ है। श्रीराम जन्मभूमि के प्रति जनमानस की श्रद्धा भी रेखांकित हुई है। श्रीराम का अस्तित्व न माननेवाले विद्वान स्वाभाविक ही निराश होंगे। श्रीराम जन्मभूमि का हिंदू विश्वास सिद्ध हो चुका है। सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायायिक निर्णयों के सुदीर्घ इतिहास में एक नया स्वागत योग्य पृष्ठ जोड़ा है। इतिहास न्यायायिक निर्णय की इस तिथि को अपने हृदय में संजोकर रखेगा।