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दोष न लगने पाए!

ढाई महीने के लॉकडाउन को शिथिल हुए अब चार-पांच दिन हो चुके हैं। ठप हुई अर्थव्यवस्था और रुके हुए जनजीवन को पूर्ववत करने के लिए ही लॉकडाउन में कुछ शिथिलता दी गई। इसका परिणाम भी देखने में आया। बंद पड़े जनजीवन और व्यवहार में ‘जान’ आ गई। बाजारों में रौनक छा गई। मुंबई जैसे महानगर में ढाई महीनों तक नहीं दिखने वाला ट्रैफिक, दिखने लगा। ‘बेस्ट’ और एसटी की बसें ज्यादा संख्या में दौड़ने लगीं। कोरोना जैसी खतरनाक बीमारी का संक्रमण भीड़ के कारण बढ़ सकता है। फिर भी आर्थिक व्यवहार और जनजीवन को गति देने के लिए ही लॉकडाउन में छूट दी गई। घर से बाहर निकलने वाले नौकरीपेशा लोगों को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए। कोरोना के बचाव व उपाय तथा सरकार द्वारा जारी नियमों का पालन करते हुए ही हमें रहना है। दुर्भाग्य से कुछ स्थानों पर जो हुआ या हो रहा है, वह इसके विपरीत हो रहा है। लॉकडाउन में शिथिलता देने के बाद भीड़ की अनुशासनहीनता के कारण दोष लगा तो क्या होगा? मुंबई जैसे शहर में यह संकट फिलहाल टला नहीं है। कोरोना से युध्द जारी है। इस युध्द को जारी रखते हुए रुके हुए अर्थचक्र को धीरे-धीरे गति देना ही लॉकडाउन में शिथिलता का उद्देश्य है। लॉकडाउन शिथिल होने के बाद पहले ही दिन मरीन ड्राइव पर जॉगिंग के लिए इकट्ठा हुई भीड़ हो या दो दिन पहले कल्याण बस स्थानक पर एसटी बस में चढ़ने के लिए हुई झड़प हो, यह सबकुछ चिंता बढ़ाने वाली बातें हैं। ढाई महीनों में लॉकडाउन के कारण जो अर्थचक्र और जनजीवन ठप हो गया था, उसे धीरे-धीरे शुरू करने के लिए चरणबद्ध तरीके से ‘अनलॉक’ करने की आवश्यकता थी और है। फिलहाल इसका पहला चरण शुरू है। हालांकि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी व जल्दबाजी न करते हुए लोगों को नियमों का पालन करना होगा। लॉकडाउन के कारण उद्योगों से लेकर व्यवसाय तक, नौकरीपेशा लोगों से लेकर दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर, सभी लोग परेशान हैं। यह परेशानी धीरे-धीरे दूर करनी होगी। सवाल यह है कि अर्थचक्र हो या जीवनचक्र, इसे कितनी देर रोका जा सकता है? चरणबद्ध तरीके से किया जानेवाला ‘अनलॉक’ इसी सवाल का जवाब देने का प्रयास है। दुर्भाग्य से कुछ स्थानों पर होनेवाली भीड़ और की जा रही गड़बड़ी, ऐसे प्रयासों को बेकार कर देती है। जब जोरदार बरसात आती है तब किसानों को अनुशासित ढंग से काम करना होता है। अनलॉक भी जनजीवन को ठीक करने के लिए दी गई एक प्रकार की व्यवस्था ही है। लोगों को अनुशासन का पालन करते हुए रहना होगा। कोरोना काल में नियमों का पालन करना होगा। मुंबई जैसे महानगर में फिलहाल यातायात सेवा पर दबाव बढ़ रहा है। इसे स्वीकार करें तो भी इस प्रकार की जल्दबाजी व गड़बड़ी लोगों के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। देश में फिलहाल प्रतिदिन १० से १२ हजार और राज्य में लगभग ३ हजार कोरोना के मरीज मिल रहे हैं। दिल्ली जैसे स्थानों पर भी अगले महीने-डेढ़ महीने में कोरोना मरीजों की संख्या में इजाफा हो सकता है, ऐसी संभावना खुद वहां के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने जताई है। मुंबई में कोरोना मरीजों की दोगुनी होने की गति २४.५ पर आ गई है और कोरोना की मृत्यु दर भी ३ प्रतिशत है। निसंदेह यह एक ‘गुड न्यूज’ है। हालांकि शिथिलता के दौरान अर्थचक्र सुधरेगा लेकिन गड़बड़ी में जीवन चक्र बिगड़ सकता है, ऐसा ना होने पाए। लोगों को भी इस बात का ध्यान रखना होगा। अति जल्दबाजी संकट की ओर ले जाती है। इसका सभी को ध्यान रखना चाहिए। लॉकडाउन के काल में जनता ने जो संयम दिखाया, वहीं संयम ‘अनलॉक’ काल के दौरान भी दिखाना होगा। इसी में सबकी भलाई है। सरकार अपनी ओर से रुकी हुई गाड़ी को चलाने का प्रयास कर रही है और कोरोना पर नियंत्रण पाने का प्रयास कर रही है। सिर्फ ‘अनलॉक’ के दौरान गड़बड़ी से दोष न लगने पाए, इतना ही!