दो कदम तुम भी चलो दो कदम हम भी चलें!

देश भर में सांप्रदायिक तनाव और ध्रुवीकरण का माहौल बनानेवालों की कमी नहीं है लेकिन प्रमुख मुस्लिम संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत की मुलाकात शायद ऐसे लोगों के लिए चिंताजनक हो सकती है। इसका सीधा असर देश के बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों पर पड़नेवाला है। यह मुलाकात ऐसे माहौल में हुई है, जब चंद ताकतों ने देशभर में दोनों तरफ गलतफहमियों की खाई को बजाय भरने के और गहरा कर दिया है। ऐसे समय में सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए संघ और जमीअत एक दूसरे की भूमिका को समझ रहे हैं। हालांकि इस मुलाकात के राजनीतिक मायने निकाले जानेवालों की भी कमी नहीं है। ऐसे लोग इस मुलाकात को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद ३७० और ३५-ए हटाने को लेकर देश के बाहर-भीतर गरमाई हुई सियासत से जोड़ रहे हैं। अनुमानत: नवंबर माह में सुप्रीम कोर्ट से राममंदिर निर्माण पर पैâसला भी आ सकता है। सो, इस मुलाकात को राजनीतिक बताया जा रहा है। बहरहाल, सकारात्मक पक्ष यह है कि इस शीर्ष मुलाकात के जो भी नतीजे आएं, देश का बड़ा प्रबुद्ध वर्ग ऐसी बैठकों का सदैव पक्षधर रहा है।
कभी एकदम विपरीत दिशाओं की ओर रुख कर एक-दूसरे से दूरी बनाए रखनेवाले देश के दो प्रमुख संगठनों के प्रमुखों का मिलना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इस दौरान खुलकर अपनी बात रखने का दोनों ने एक-दूसरे को मौका दिया। इस मुलाकात में देश के मौजूदा हालात पर जमीयत प्रमुख ने चिंता जताई और आपसी भाईचारा बढ़ाने के लिए साथ आकर काम करने की जरूरत पर जोर दिया। मदनी ने देश में भय का माहौल गरमाने की बात कही और संघप्रमुख का ध्यान आकर्षित कराया कि भीड़-हिंसा और तीन तलाक को लेकर अल्पसंख्यक वर्ग में चिंता का माहौल है। मदनी ने अपनी बात रखते हुए यह भी कहा कि एक बड़े समुदाय में भय पैदा कर देश का विकास नहीं हो सकता और इसे दूर करने की जरूरत है। साथ ही संघ को मुस्लिमों के प्रति अपना नजरिया बदलते हुए उनका विश्वास जीतने के लिए जमीनी स्तर पर काम भी करना चाहिए। जवाब में मोहन भागवत ने कहा कि संघ शुरू से मानता रहा है कि उसके हिंदुत्व का मतलब हिंदू, मुस्लिम सभी धर्मों से है। वह शांति और आपसी भाईचारे का हिमायती है, जिस पर मदनी ने बंद कमरों से बाहर निकलकर दोनों से मिलकर काम करने का आग्रह किया है। लेकिन इस मुलाकात की सबसे ज्यादा अहम और वर्तमान में सबसे ज्यादा विवाद पैदा करनेवाली एक बात पर मौलाना मदनी ने साफगोई से काम लिया। अरशद मदनी ने स्वीकार किया कि १९४७ में मुसलमानों को मजहबी घुट्टी पिलाई गई थी, जिसका नतीजा बंटवारे की शक्ल में सामने आया। मदनी ने इस बात पर चिंता जताई कि ठीक उसी तरह आज एक खास धर्म को मजहबी घुट्टी पिलाई जा रही है, जिसका नतीजा देश के हित में नहीं होगा।
मजे की बात यह है कि इस मुलाकात के बाद बहुसंख्यकों की तरफ से कोई खास नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं आई, लेकिन कुछ नाम-निहाद मुस्लिम संगठनों और मुस्लिम नेताओं ने अपनी जहरीली टिप्पणियों से इस मुलाकात को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की है। कारण साफ है, वे नहीं चाहते कि इस देश में हिंदू-मुस्लिम संवाद का मार्ग प्रशस्त हो। आखिर दुकानदारी बंद हो जाने का खतरा जो है। सवाल उठाया जा रहा है कि जब ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड मुस्लिम समाज के सभी रूपों और लगभग सभी संगठनों की नुमाइंदगी करता है तो फिर संघ परिवार ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से बातचीत की पहल क्यों नहीं की या फिर जमीयत के महमूद मदनी गुट को विश्वास में क्यों नहीं लिया जो पहले से ही हिंदू-मुस्लिम संवाद पर मोदी सरकार के साथ बातचीत करते रहे हैं। माना जा रहा है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने ट्रिपल तलाक जैसे मुद्दे पर काफी कड़ा रुख अख्तियार किया था। बोर्ड ने केंद्र सरकार के खिलाफ सड़कों पर आंदोलन तक किया था इसलिए उसके रुख को देखते हुए संघ ने उससे बातचीत करना मुनासिब नहीं समझा। जमीयत उलमा-ए-हिंद की तरफ से कई मुद्दों पर लचीला रुख अपनाना शायद उसके पक्ष में गया।
संघ प्रमुख और जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष की इस मुलाकात की अहमियत को इस बात से समझा जा सकता है कि दोनों संगठनों के प्रमुख इन संगठनों के वजूद में आने के करीब एक सदी बाद औपचारिक रूप से एक-दूसरे समुदाय के बीच मतभेद दूर करने की पहल कर रहे हैं। जमीयत उलमा-ए-हिंद का गठन १९ नवंबर १९१९ को हुआ था और २ महीने बाद इसके गठन के १०० साल पूरे हो जाएंगे। देश के स्वतंत्रता संग्राम में जमीयत की बड़ी भूमिका थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना १९२५ में हुई थी। इतने वर्ष बाद अगर जमीयत और संघ के माध्यम से दूरियां मिटने की संभावना बन रही है तो क्यों न ‘दो कदम तुम चलो- दो कदम हम चलें’ की तर्ज पर बात को आगे बढ़ाया जाए? बड़ी से बड़ी जंग बातचीत से सुलझी है। अनेक देशों ने अपनी जंग रोक कर दोस्ती का हाथ बढ़ाया है और कामयाबी पाई है। यह तो शुद्ध रूप से हमारा आंतरिक मामला है। दो भाइयों जैसा। क्या कोई छोटा भाई अपने बड़े भाई को नाराज कर या बड़ा भाई अपने से छोटे भाई के साथ उलझकर घर में शांति रख सकता है? यह मुमकिन ही नहीं है। ऐसे में अगर देश के दो बड़े समुदाय के दो जिम्मेदार संगठन आपसी बातचीत के दरवाजे खोलकर सुखद हवाओं के लिए रास्ता बना रहे हों तो बजाय उनपर उंगलियां उठाने के, उसका स्वागत किया जाना चाहिए। नफरतों की खेती से कभी मोहब्बत की फसल नहीं उगाई जा सकती। और अगर मोहब्बत की फसल को लहलहाते देखना है तो उसमें प्रेम और विश्वास के बीज रोपने ही होंगे। कट्टरपंथियों ने जितना जहर बोना था, बो लिया। अब बारी सच्चे इस्लाम के माननेवालों की है जो यह मानते हैं कि सही इस्लाम ने लोगों को मोहब्बत का पैगाम दिया है। जिनका यह पक्का यकीन है कि इस्लाम तोड़ता नहीं बल्कि जोड़ता है। जिनकी यह प्रबल धारणा है कि इस्लाम सबका भला चाहता है। सहिष्णुता से भरे हिंदू धर्म और अमन का पैगाम देने वाले सच्चे इस्लाम के पैरोकारों का नजदीक आना देश को नई ऊर्जा देगा, नई ऊंचाइयां देगा, नया जोश-ओ-जज्बा देगा जो नवभारत का निर्माण करने में सहायक होगा। जंग खाई तमाम खिड़कियों और दरवाजों को खोलकर नए युग की शुरुआत करने में ही समझदारी है और आखिर कौन-सा हिंदुस्थानी होगा जो इस नए युग की आशा नहीं रखता होगा। देशहित और समाजहित के लिए अगर दोनों संगठनों की वजह से हिंदू-मुस्लिम समुदाय के बीच तनाव वाले मुद्दों को खत्म करने पर सहमति बनती है तो विरोध करनेवालों को पहचानकर किनारे करना ही समझदारी भरा कदम होगा।