द्रविड योद्धा!

द्रविड मुन्नेत्र कजगम दल के अध्यक्ष तथा तमिलनाडु के शक्तिशाली नेता एम. करुणानिधि के निधन से हिंदुस्थान की राजनीति का एक लड़ाकू नेता राजनीतिक पटल से अस्त हो गया है। तमिलनाडु के शोषितों, वंचितों और पीड़ितों को सदैव अपने लगनेवाले नेता के रूप में मुथ्थुवेल उर्फ एम. करुणानिधि। आखिरी सांस तक तमिल भाषा और राज्य पर प्रचंड गर्व करनेवाले करुणानिधि ने अपनी प्रादेशिक अस्मिता का कट्टरता से जतन किया। मौका पड़ने पर राष्ट्रीय दलों से दो हाथ भी किया लेकिन तमिलनाडु की जनता से, तमिल जनता के हितों से तथा तमिल अस्मिता की कभी अनदेखी नहीं की। किसी भी सरकार को तमिल जनता की भावनाओं से खेलने नहीं दिया। इसी वजह से समस्त तमिलनाडु आज शोक सागर में डूबा हुआ है! द्रविड आंदोलन के अध्वर्यू पेरियार, अण्णादुराई, एम.जी. रामचंद्रन की पंक्ति के महत्वपूर्ण शिलेदार रहे करुणानिधि को सौभाग्य से तमिलनाडु की जनता का सर्वाधिक सेवा करने का मौका मिला। पांच बार मुख्यमंत्री पद देकर तमिल जनता ने उन्हें सिर-आंखों पर बिठाया था। १२ बार विधानसभा में चुनकर जाने का रिकॉर्ड भी उनके नाम पर है। करुणानिधि कौन थे? यह नए सिरे से कहने की जरूरत नहीं। राजनीति की एबीसीडी भी जिन्हें पता नहीं है, ऐसा व्यक्ति भी एम. करुणानिधि को दक्षिण के एक सशक्त नेता के रूप में पहचानता है। इतना ही नहीं उत्तर हिंदुस्थान की जनता भी करुणानिधि को द्रविड आंदोलन तथा तमिल अस्मिता के सच्चे सिपाही के रूप में पहचानती है। एक राज्य तक सीमित राजनीति करने के बावजूद तमिलनाडु के बाहर दिल्ली में भी अपना रौब पैदा करनेवाले इस दिग्गज नेता की देशभर में जो प्रशंसा हुई, उसका राज उनके ६० वर्ष के लंबे राजनीतिक कार्यकाल में छिपा है। भूमिपुत्रों के न्याय अधिकार के लिए शिवसेना ने जब मुंबई के दक्षिण भारतीयों के खिलाफ आंदोलन शुरू किया उस समय मुंबई में आकर उन्होंने शिवसेनाप्रमुख से मुलाकात की। मराठी भाषियों के प्रति जिस तरह का स्नेह शिवसेनाप्रमुख को था उसी तरह करुणानिधि को तमिलों के प्रति था। ऐसा कहते हैं कि मौत के बाद अंतिम यात्रा के लिए घर के बाहर जो भीड़ जमा होती है, उसे देखते हुए इंसान की अहमियत पहचानी जानी चाहिए। करुणानिधि की आखिरी विदाई के समय चेन्नई में जो जनसागर उमड़ा, उसे देखते हुए करुणानिधि की महत्ता आसानी से समझ में आ जाती है। हमारे देश में राजनीतिज्ञों की, राजनीतिक नेताओं की कमी बिल्कुल ही नहीं मगर आखिरी विदाई देने के लिए लाखों का शोकाकुल जनसागर उमड़े यह सौभाग्य बहुत कम राजनीतिज्ञों की किस्मत में होता है। करुणानिधि उनमें से ही एक थे। करुणानिधि की उम्र ९४ वर्ष की थी। शरीर थक चुका था। हाल के दिनों में कुछ वर्षों तक वे व्हीलचेयर पर दिखाई देते थे मगर मंगलवार की शाम कावेरी अस्पताल द्वारा उनके निधन की घोषणा के बाद तमिलनाडु की जनता शोकाकुल हो उठी। लाखों लोगों का आक्रोश और आक्रांत दूसरे दिन भी करुणानिधि को आखिरी विदाई देने तक जारी था। करुणानिधि की राजनीतिक विरोधी कु. जयललिता के निधन के बाद भी तमिलनाडु में इसी तरह दिल दहलानेवाले दृश्य दिखाई दिए थे। जनता के प्रति सच्ची और आंतरिक बेचैनी दिखानेवाले लोकनेता के लिए ही लोग आंसू बहाते हैं, यह इतिहास तमिलनाडु में एक बार फिर जीवंत हो उठा है। करुणानिधि पर तमिल जनता की इसी तरह अपार श्रद्धा थी। एक आम परिवार में जन्मा बच्चा उम्र के १४वें वर्ष में ‘हिंदी हटाओ’ आंदोलन के जरिए राजनीति में उतरता है, २० वर्ष की उम्र में तमिल फिल्म की पटकथा लिखकर लोकप्रिय होता है, २५ वर्ष पूर्ण होने से पहले ही द्रविड आंदोलन के मुखपत्र का संपादक बनता है और एक-एक पायदान चढ़ते हुए ४५ वर्ष की उम्र में तमिलनाडु का मुख्यमंत्री बनता है… करुणानिधि की सारी यात्रा विलक्षण है। करुणानिधि क्या थे? यह कहने की बजाय क्या नहीं थे? ये कहना चाहिए। सफल राजनीतिज्ञ, ७५ से अधिक फिल्मों की पटकथा, कविता, उपन्यास, आत्मचरित्र, निबंध, गीत लेखन आदि १०० से अधिक पुस्तकें लिखनेवाला महान साहित्यकार वे ऐसे बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। हिंदू धर्म की कुप्रथाओं पर और रूढ़िवादिता पर कुठाराघात करनेवाला लेखन करते समय नास्तिकता का झंडा हाथ में लेकर करुणानिधि ने अपनी राजनीति को सफल करने का चमत्कार दिखाया। प्रवाह के विरुद्ध तैरते हुए सफल राजनीति का आदर्श सिखानेवाले नेता के रूप में एम. करुणानिधि हमेशा स्मरण में रहेंगे। सफेद लुंगी, उसी तरह का शुभ्र कुर्ता, उस पर पीले रंग का गमछा और आंखों पर सदैव काले रंग का चश्मा, ये उनकी पहचान थी। उनके इस रूप को कभी मिटाया नहीं जा सकता! नाम की तरह ही करुणानिधि के मन में समाज के शोषितों और वंचितों के प्रति अपार ‘करुणा’ थी। इसीलिए तमिल जनता के हृदय सिंहासन पर वे इतने वर्षों तक विराजमान रहे। प्रादेशिक अस्मिता का जतन करनेवाले इस द्रविड योद्धा को हम लाखों शिवसैनिकों की तरफ से श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं!