धरती मिल जाएगी धूल में, पृथ्वी पर अटैक करेगी ‘धूम’ मिसाइल

धरती पर एक क्षुद्र ग्रह के टकराने का खतरा मंडरा रहा है। अगर यह क्षुद्र ग्रह ‘धूम’ मिसाइल के स्टाइल में पृथ्वी पर अटैक करती है तो महाविनाश हो सकता है। धरती पर धूल का साम्राज्य कायम हो सकता है और बड़ी संख्या में जीव-जंतु मारे जा सकते हैं। क्षुद्र ग्रह (एस्ट्रायड) आकार में काफी बड़े होते हैं। इनका आकार एक छोटे कस्बे से लेकर एक बड़े शहर और यहां तक की किसी राज्य जितना बड़ा हो सकता है। ये ग्रह से छोटे और धूमकेतु से बड़े होते हैं। हाल ही में नासा के एक वैज्ञानिक ने यह कहकर सनसनी पैâला दी कि आनेवाले कुछ वर्षों में ‘पीडीसी-२०१९’ नाम का एक क्षुद्र ग्रह पृथ्वी से टकरा सकता है।

धरती के शहरों पर खतरा मंडरा रहा है। यह खतरा है क्षुद्र ग्रह का। नासा के एक वैज्ञानिक का कहना है कि धरती पर एक क्षुद्र ग्रह टकरा सकता है। क्षुद्र ग्रह काफी बड़े होते हैं। इनका आकार १ किलोमीटर से लेकर ८०० किलोमीटर तक बड़ा होता है। हमारे सौर मंडल में करीब एक लाख क्षुद्र ग्रह हैं जो अपने पथ पर घूम रहे हैं। इनमें से कभी-कभी उनके मार्ग में भटकाव भी होता है। ऐसा ही एक क्षुद्र ग्रह है ‘पीडीसी-२०१९’ जिसके धरती से टकरा जाने की आशंका व्यक्त की जा रही है।
नासा के एक वैज्ञानिक पॉल चडस ने इस खतरे का इशारा किया है। माना जाता है कि पूर्व में करोड़ों साल पहले एक बड़ा क्षुद्र ग्रह धरती से टकराया था जिससे महाविनाश हुआ था और डायनासोर जैसे विशाल जीव का खात्मा हो गया था। ‘पीडीसी-२०१९’ के बारे में चडस का कहना है कि यह तेजी से हमारी ओर बढ़ रहा है और ८ साल बाद हमारी धरती से टकरा सकता है। हालांकि इसके साथ ही चडस का ये भी कहना था कि २०,००० से अधिक विश्लेषणों से पता चलता है कि अगली सदी में इंसानों के खत्म होने की संभावना १०,००० में १ है।

सौरमंडल के आवारा ग्रह
हम सभी जानते हैं कि हमारी सौर प्रणाली में ९ ग्रह हैं जो सूर्य के इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं। इन ग्रहों के अतिरिक्त बहुत से ऐसे छोटे-छोटे पिंड या पत्थरों के विषम ढेले हैं, जो सूर्य के गिर्द घूमते रहते हैं। इन छोटे खगोलीय पिंडों को क्षुद्रग्रह (एस्ट्रायड्स) या ग्रहिका (प्लैनेटायड) कहा जाता है। इन्हें बोलचाल की भाषा में आवारा ग्रह भी कह सकते हैं।
हमारी सौर प्रणाली में लगभग १००,००० क्षुद्रग्रह हैं लेकिन उनमें से अधिकतर इतने छोटे हैं कि उन्हें पृथ्वी से नहीं देखा जा सकता। प्रत्येक क्षुद्रग्रह की अपनी कक्षा होती है, जिसमें ये सूर्य के इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं। इनमें से सबसे बड़ा क्षुद्र ग्रह हैं ‘सेरेस’। एक इतालवी खगोलवेत्ता ने इस क्षुद्रग्रह को जनवरी १८०१ में खोजा था। केवल ‘वेस्टाल’ ही एक ऐसा क्षुद्रग्रह है जिसे नंगी आंखों से देखा जा सकता है यद्यपि इसे सेरेस के बाद खोजा गया था। इनमें से दो-तिहाई क्षुद्रग्रह उन कक्षाओं में घूमते हैं जो मंगल तथा बृहस्पति ग्रहों की कक्षाओं के बीच पड़ती हैं। कुछ क्षुद्रग्रह भी इनमें से एक हैं। ‘हिडाल्गो’ नामक क्षुद्रग्रह की कक्षा मंगल तथा शनि ग्रहों के बीच पड़ती है। ‘हर्मेस’ तथा ‘ऐरोस’ नामक क्षुद्रग्रह पृथ्वी से कुछ लाख किलोमीटर की ही दूरी पर हैं।

नजदीकी क्षुद्र ग्रह
ऐरोस एक छोटा क्षुद्रग्रह है जो क्षुद्रग्रहों की कक्षा से भटक गया है तथा प्रत्येक सात वर्षों के बाद पृथ्वी से २५६ लाख किलोमीटर की दूरी पर आ जाता है। इसका अर्थ यह हुआ कि चंद्रमा के अतिरिक्त यह पृथ्वी के सबसे नजदीक का पिंड बन जाता है। इसकी खोज १८९८ में जी.विट ने की थी। वैज्ञानिकों ने अपने हाल ही के अध्ययनों में प्लूटो की कक्षा से परे भी क्षुद्रग्रहों के एक बेल्ट (पट्टी) की उपस्थिति की संभवना प्रकट की है। ये पिंड शक्तिशाली दूरबीनों के माध्यम से उड़नतश्तरियों जैसे हैं। उनमें से कुछ बहुत चमकदार हैं, जबकि कुछ अन्य बहुत मध्यम हैं। उनके आकारों को उनकी चमक के आधार पर निर्धारित किया जाता है।
अधिकतर क्षुद्रग्रह उन्हीं पदार्थों से बने हैं, जिनमें पृथ्वी पर पाए जानेवाले पत्थर बने हैं। हालांकि उनकी सतह के तापमान भिन्न हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन क्षुद्रग्रहों का निर्माण तब हुआ होगा जब अंतरिक्ष में किसी बड़े ग्रह में विस्फोट हुआ होगा तथा फिर उसके छोटे-छोटे टुकड़े सूर्य के गिर्द घूमने शुरू हो गए होंगे। यद्यपि उनके जन्म के बारे में कुछ भी ठीक से कहा नहीं जा सकता।