धुंधले बादल हटो

हे धुंधले बादल हटो,
सूर्य को निकलने दो।
क्यों अंधेरा ले छाए हो?
जीवन उजाला होने दो।
कब तक पीड़ा सहेंगे?
कुछ गान करने दो।
मानव तन ले आए हैं।
प्रकृति कुछ चलने दो।
सूर्य को निकलने दो।
हीरो को चमकने दो।
मार्ग ही हमारा दर्शन है।
उसमें हमको चलने दो।
अंधेरों में छिपे हैं तारे।
समय गीत गाने दो।
हे धुंधले बादल हटो।
सूर्य को निकलने दो।
हर लय हर ऋतु तुम्हारा।
जीवन, जीवन जी लेने दो।
लंबी लड़ाई चलने दो।
सूर्य निकला जलने दो।
लहर में चल रहे हैं।
तट पर हमको आने दो।।
-जयप्रकाश सोनकर, मुंबई

मत बांधो मुझको मोह जाल में,
इस दुनिया से अब जाने दो।
ये झूठी छल-कपटी दुनिया से,
दूर निकल अब जाने दो,
मुझको मेरे अंतसमन की
इस पीड़ा में बह जाने दो,
दुनिया एक मायाजाल लगे
हर घड़ी यहां संघर्ष बहुत,
है छलियों का बहुत बड़ा पैâलाव
इस कोने से उस कोने तक।
तैयार खड़े हैं रंगमंच
तैयार खड़े इस रंगमंचों पर
अभिनय मुझको भी कर जाने दो
मुझको मेरे अंतसमन की
इस पीड़ा में अब बह जाने दो।
भेष बदल कर ठगा मुझे
लज्जित समाज में कर डाला,
मीरा जैसी भक्ति जो देखी
विष का प्याला भी दे डाला।
अब खुले हुए इस केशों को
रक्तिम बूंदों से धुल जाने दो।
मुझको मेरे अंतसमन की इस
पीड़ा में अब बह जाने दो।
पीड़ा को सुंदर स्वर देकर
थी विकल रागिनी भी गाई,
सुंदर स्वर मालाओं से सज्जित
कर शहनाई भी गुंजाई।
शबनम की इस बूंदों को अब
शोला बन मन पिघलाने दो।
मुझको मेरे अंतसमन की
इस पीड़ा में अब बह जाने दो।
था शिशु जैसा कोमल मेरा मन
अबोध थी पेंग मारती आशाएं,
जागी-जागी सी रातें थीं
खोई-खोई सी अभिलाषाएं।
इस बार मुझे उन सपनों को
फिर से उतार ले आने दो।
मुझको मेरे अंतसमन की
इस पीड़ा में अब बह जाने दो।।
-हेमलता त्रिपाठी
लखनऊ, यूपी

बेटी की दर्द

पड़ते सेनुरवा
पराई भइली बिटिया त
छूटि गइले बाबुल के देश रे
कवने कसूरवा ससुरवा
पठाइ दिहली
रखलू न माई अपना देश रे
एक ही कोखिया स
भाई-बहिन जनमले त
काहे कइलू दूनो में विभेद रे
कबड्डी, क्रिकेट भइया
खेलत अघात नाही
हमरा के गुड्डा-गुड़िया खेल रे
गन, पिस्तौल, तूरवारी
धनुष-बान उनके
हमने फिनाइल किचन सेट रे
लाज, हया गठरी
धराइल हमरा कपरा त
भइया के शान अभिमान रे
रोव जनि रोव धिया
मन में धीरज रख
बेटी हुई धरती समान रे
सब के दुलारी बिटिया
प्राण से भी प्यारी बिटिया
एक दिन जइहे पिया देश रे
दादी, नानी, काकी, चाचियों
केहू के त बिटिया हुई
बेटिया से घर-परिवार रे
पगरी संभारल आ उछालल
हाथ तोहरे बा
नइहर, ससुरा दोनों के अभिमान रे
कुल के कमान बेटी
लाज स्वाभिमान बेटी
काहे मन में सोचे अइसन बात रे
कोखिया पराई नाही
भाई-बहिन एके जाई
राख, अब नइहर ससुरा ध्यान रे
सोच न पराई
बन दूनो घर के प्यारी
रह बनी आजीवन नैना-तारी रे
-कुबेरनाथ ओझा ‘निठुर’, मुंबई