" /> ध्वज भक्ति और आस्था का

ध्वज भक्ति और आस्था का

मरीन ड्रॉइव पर जिमखानों के बाहर पिछले कई दिनों से यह कार्यक्रम जारी है। सप्ताह में दो बार-देर शाम अंधेरी, भांडुप, भाइंदर, नालासोपारा और विरार जैसे उपनगरों से लोग आते हैं और तन्मयता से देर रात तक रिहर्सल करते रहते हैं-उस गीत और संगीतमय नाटक का, जो रत्नागिरी के उनके शीर गांव में गुडी पाडवा पर खेला जानेवाला है। मुंबई के विभिन्न ठिकानों पर इन दिनों ऐसे कई रिहर्सल खामोशी से चल रहे हैं। इनमें शरीक कुछ टोलियां कोकण के अपने गांवों के लिए रवाना भी हो चुकी हैं, जहां ये नाटक खेले जाने हैं।
मुंबई में थियेटर से जुड़े मोहन मोरे-जो शीर गांव में खेले जानेवाले नाटक के कर्णधार हैं-कहने लगे, ‘दिन में पालकी पर देवी महालक्ष्मी की सवारी और शामें नाटकों को समर्पित। गुडी पाडवा के कुछ दिन पहले से सारे गांव देवीमय हो जाते हैं।’ नाटक के निर्देशक शंकर मोरे बताते हैं, ‘ज्यादातर नाटक पौराणिक पृष्ठभूमि के होते हैं।’ शंकर पेशे से कांट्रेक्टर हैं, जबकि अभिनेताओं की भूमिका निभा रहे वजेश मोरे अकाउंटेंट और रमेश मोरे छापाखाने में काम करनेवाले। सभी व्हॉट्सऐप ग्रुप से भी जुड़े हैं।
गुडी पाडवा के साथ चैत्र नवरात्र बिलकुल करीब है, जब पूजा, उपासना, व्रत, उपवास व परहेज करते हुए पूरा समय आप ईश्वर से लौ लगाएंगे। देवी भक्त पूरे नौ दिन कठिन व्रत रखने के साथ अन्न और तामसी वस्तुओं का त्याग कर सात्विकता और कठिन नेम के साथ दिन बिताएंगे। मुंबई सहित समूचा महाराष्ट्रीयन समाज तरह-तरह की धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों से गुलजार हो उठेगा। पूरन पोली और श्रीखंड बनाया, परोसा और खाया जाएगा और किसी काष्ठखंड को लाल या पीले रंग के कपड़े से ढंककर, उसके सिरे पर बाहर हल्दी और कुमकुम लगे चांदी, तांबा या कांसे के कलश को उल्टा लटकाकर घर के दरवाजे, खिड़की या आंगन में गुडी की पूजा की जाएगी। गिरगांव, दादर और डोंबिवली जैसे इलाकों की आकर्षक शोभायात्राओं में आप महिलाओं की टोलियों को नौवारी साड़ी में बाइक रैलियों में बुलेट की सवारी करती भी देख लेंगे।
सार्वदेशिक पर्व
गुडी पाडवा आज सिर्फ महाराष्ट्रीयनों का पर्व नहीं रहा, सार्वदेशिक हो गया है। मालाड और कल्याण के उत्तर भारतीय घरों में माता के कलश की स्थापना के साथ वसंत ऋतु की पहली फसल के रूप में जई रोपी जाएगी और कंजकाओं को जिमाया जाएगा। दक्षिण भारतीय नवरात्रि देखना हो तो माटुंगा, चेंबूर और डोंबिवली की उनकी रिहाइशों में चले जाइए और कोकणी संवत्सर देखना हो तो भांडुप में कोकण नगर। आंध्र प्रदेश व कर्नाटक के निवासियों का नवरात्रि साफ-सफाई के बाद आम के पेड़ की पत्तियों के बंदनवारों, तोरण, फूलों और रंगोली से सजे घरों में और धोती-कुर्ते और नौवारी साड़ी के परिधान के साथ ‘उगादि’ के रूप में मनाया जाता मिलेगा। ‘उगादि’ के दिन ही पंचांग तैयार होता है। महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इसी दिन से सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीना और वर्ष की गणना करते हुए ‘पंचांग’ की रचना की। नवरात्र में देवी और नवग्रहों की पूजा से पूरे साल ग्रहों की स्थि‌ित‌ अनुकूल रहेगी, ऐसा मानते हैं। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा वह अवसर है, जब तेलुगु घरों में ‘पच्चड़ी/प्रसादम’ बांटा जाता है। कर्नाटक, आंध्र और महाराष्ट्र-इन तीनों ही प्रांतों में रसीले आमों का सेवन ईश्वर अर्पित कर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही खाना शुरू किया जाता है।
ब्रह्मा ने प्रारंभ की सृष्टि संरचना
नवरात्रि, यानी वर्षारंभ-दो ऋतुओं का वह संधिकाल, जब प्रकृति नवपल्लवों और हरीतिमा से सजी-धजी नव रूप में नवजीवन का प्रतीक बनकर नव संरचना के लिए ऊर्जस्वित हो जाती है। रातें छोटी व दिन बड़े होने और बर्फ पिघलने लगती है। मानव, पशु-पक्षी, जड़-चेतन-सब प्रमाद और आलस्य को त्याग सचेतन हो जाते हैं। लहलहाती फसलें खेत-खलिहानों में आ जाती हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मां दुर्गा का प्राकट्य चैत्र नवरात्रि के पहले दिन ही हुआ था। वैदिक ग्रंथों के अनुसार जब महिषासुर, शुंभ-निशुंभ, रक्तबीज आदि आसुरी शक्तियों ने दैवीय वरदानों से गर्व में मदमत्त भूलोक और देवलोक को संत्रस्त किया तो परमेश्वर की प्रेरणा से देवगणों ने अद्भुत शक्ति संपन्न देवी का सृजन कर उन्हें नाना प्रकार के अमोघ अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। यही आदि शक्ति मां दुर्गा के नाम से विख्यात होकर विश्व की अधिष्ठात्री बनीं। भगवती दुर्गा ने नौ दिनों में अपने नौ रूपों जयंती, मंगला, काली, भद्रकाली कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा धात्री, स्वाहा, स्वधा को प्रकट कर इन असुरों का वधकर विश्व को निष्कंटक कर दिया।
ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्र मास के प्रथम दिन ही ब्रह्मा ने सृष्टि संरचना भी प्रारंभ की, इसीलिए चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से हिंदू नवसंवत्सर, यानी नववर्षारंभ माना जाता है। इस दिन ब्रह्माजी और उनके द्वारा निर्मित सृष्टि के प्रमुख देवी-देवता, यक्ष, असुर, गंधर्व, ऋषि-मुनि, नदी और पर्वत, पशु-पक्षी, रोगों और उनके उपचारों का ही नहीं, कीट-पतंगों का भी पूजन किया जाता है, ताकि वे परिवार और समाज की सुखी-समृद्धि के साथ फसलों पर मेहरबानी बनाए रखें। भगवान राम का जन्म भी चैत्र नवरात्रि में ही हुआ था। नवरात्रि के दौरान नव दुर्गा के नौ रूपों का ध्‍यान, उपासना, हवन व आराधना की जाती है तथा दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जाता है। नौ दिन तक मनाया जानेवाला यह त्यौहार दुर्गा पूजा के साथ-साथ रामनवमी को रामजन्म के साथ संपन्न होगा।
विजय पताका
गुडी मतलब, ध्वज या विजय पताका। कथा है कि शालिवाहन नामक कुम्हार के पुत्र ने मिट्टी के सैनिकों की सेना बनाई और पानी छिड़ककर उनमें प्राण फूंक दिए। इसी सेना की सहायता से शालिवाहन ने बलवान शत्रुओं को पराजित किया। इस विजय के प्रतीक के रूप में शालिवाहन शक संवत का प्रारंभ हुआ। इसी दिन भगवान राम ने भी वानरराज बालि के अत्याचारी शासन से दक्षिण की प्रजा को मुक्ति दिलाई थी और उसके त्रास से मुक्त हुई प्रजा ने घर-घर में उत्सव मनाकर ध्वज (गुडी) फहराई थी।