" /> नई आत्मनिर्भरता की ओर, लॉकडाउन – ४

नई आत्मनिर्भरता की ओर, लॉकडाउन – ४

हिंदी में कई फिल्मों के ‘सीक्वल’ आते रहते हैं। ‘शोले ’, ‘अग्निपथ’, ‘डॉन ’, ‘गोलमाल’ और ‘सिंघम’ जैसी कई फिल्मों के दो-चार अगले भाग आए। इनमें से कुछ फिल्में चलीं और कुछ औंधे मुंह गिरीं। क्या ‘लॉकडाउन-४’ के मामले में भी ऐसा ही कुछ होगा? प्रधानमंत्री मोदी मंगलवार रात ८ बजे के मुहूर्त पर लोगों के सामने आए और ‘लॉकडाउन-४’ की घोषणा की। सोमवार की शाम को प्रधानमंत्री ने ‘लॉकडाउन’ पर विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ लंबी चर्चा की। कई मुख्यमंत्रियों ने विचार व्यक्त किया कि ‘लॉकडाउन’ को बढ़ाया जाना चाहिए। इसलिए ‘लॉकडाउन-४’ का ठीकरा केवल प्रधानमंत्री पर नहीं फोड़ा जा सकता। जितने दिनों तक लॉकडाउन रहेगा, उतने दिनों तक देश की अर्थव्यवस्था चरमराई रहेगी। प्रधानमंत्री इसे समझ सकते हैं, लेकिन कुछ राज्य कोरोना को नियंत्रित करने में कमजोर साबित हो रहे हैं और उन्हें ‘लॉकडाउन’ बढ़ाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं दिखता। प्रधानमंत्री ने ‘लॉकडाउन-४’ को एक नए प्रारूप में प्रस्तुत करने की घोषणा की। इसके साथ ही चरमराई अर्थव्यवस्था को ठीक करने के लिए २० लाख करोड़ रुपए के वित्तीय पैकेज की भी घोषणा की। प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि यह पैकेज हिंदुस्थान को स्वावलंबी व आत्मनिर्भर बनाने के लिए है। प्रधानमंत्री ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ योजना पर जोर दिया है। इस बारे में वे चरणबद्ध तरीके से घोषणाएं करेंगे। फिलहाल उद्योग, व्यवसाय व व्यापार ठप हैं। बड़े पूंजीपतियों के भी पसीने छूट रहे हैं। छोटे और मध्यम उद्योग तो मर ही चुके हैं। प्रधानमंत्री का २० लाख ‘करोड़’ का पैकेज लघु, मध्यम और छोटे व्यापारियों और व्यवसायियों को सहारा देने के लिए है। गरीबों, मजदूरों, किसानों और नियमित कर चुकानेवाले मध्यम वर्ग को भी इस पैकेज का लाभ मिलेगा, ऐसा प्रतीत हो रहा है। देश की १३० करोड़ की आबादी के बीच कुल २० लाख करोड़ रुपए वितरित किए जाएंगे और इससे गरीब तथा मध्यम वर्ग को इस पैकेज का लाभ मिलेगा, ऐसी बात फैलाई गई है। इस २० लाख करोड़ के साथ हिंदुस्थान आत्मनिर्भर बन जाएगा। तो क्या वह अभी आत्मनिर्भर नहीं है? कोरोना का संकट अचानक आन पड़ा। कोरोना से पहले हिंदुस्थान के पास पीपीई और एन -९५ मास्क नहीं थे। अब २ लाख पीपीई और २ लाख एन -९५ मास्क हर दिन बनाए जा रहे हैं, यह ठीक है। कोई भी देश संकट और संघर्ष से ही सशक्त होता है। यह संघर्ष करने की प्रेरणा नेतृत्व देता है। आजादी से पहले देश में एक ‘सुई’ तक नहीं बनती थी। आजादी के बाद अगले साठ वर्षों में हिंदुस्थान कई क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बना। देश ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी, कृषि, रक्षा, विनिर्माण, परमाणु विज्ञान में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। आज पीपीई बनानेवाला आईसीएमआर जैसा विज्ञान संस्थान इस आत्मनिर्भर हिंदुस्थान का हिस्सा है। तब पंडित नेहरू थे, आज मोदी हैं। यदि राजीव गांधी ने डिजिटल इंडिया की नींव नहीं रखी होती, तो प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और अधिकारी आज कोरोना संकट के ‘अस्पृश्य’ माहौल में वीडियो कॉन्प्रâेंसिंग के माध्यम से संवाद नहीं कर रहे होते। यह देश संघर्ष, मेहनत और स्वावलंबन नामक तीन सूत्रों पर ही खड़ा है। ठीक ऐसा ही प्रधानमंत्री मोदी ने भी कहा है। मोदी ने कुछ सकारात्मक विचार व्यक्त किए हैं। कोरोना का संक्रमण मतलब हमारी पूरी जिंदगी नहीं है। उन्होंने कहा, ‘कोरोना लंबे समय तक हमारे साथ रहेगा, इसलिए हमारे जीवन को कोरोना के आसपास रहने की जरूरत नहीं है,’ यह सबसे महत्वपूर्ण संदेश है। किसानों और मेहनतकशों को फिर से खड़ा होना ही पड़ेगा। कोई यह नहीं बता सकता कि २० लाख करोड़ के पैकेज में से कितनी बूंदें उन तक पहुंचेंगी। देशभर के प्रमुख शहरों के लाखों मजदूर पैदल ही अपने राज्यों के लिए निकल पड़े हैं। यह राज-व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता है। मोदी ने इन श्रमिकों के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त की और कहा कि आर्थिक पैकेज उन पर केंद्रित होगा। (वास्तव में क्या होगा?) श्रमिकों के स्थलांतर ने कई राज्यों के सामाजिक और औद्योगिक विघटन को जन्म दिया है। अगर मजदूर वर्ग नहीं होगा तो मूलभूत परियोजनाओं को अमल में कैसे लाया जाएगा? जो लोग अपनी नौकरी गंवाने के बाद अमेरिका जैसे देशों से यहां आए हैं और जो लोग ‘वंदे भारत मिशन’ की सरकारी योजना के तहत यहां आए हैं, वे इस तरह की शारीरिक मेहनत का काम नहीं करेंगे। तो उन श्रमिकों को ये २० लाख करोड़ का सपना क्या देगा? कोरोना से पहले ही हमारी अर्थव्यवस्था खराब हो चुकी थी। एयर इंडिया और भारत संचार निगम जैसे बड़े सरकारी प्रोजेक्ट मौत की कगार पर थे। सरकार उन्हें शुरू रखने के लिए ४००० करोड़ रुपए का वित्तीय पैकेज देने की भी हालत में नहीं थी। अगर जेट विमान कंपनी को ५०० करोड़ का सहारा दिया गया होता तो इससे वह उद्योग और वहां के लोगों की नौकरियां बच जातीं। इस परिप्रेक्ष्य में सरकार २० लाख करोड़ कहां से जुटाएगी? मुंबई में ‘मेट्रो’ रेलवे जैसी परियोजनाएं चल रही हैं। लखनऊ, हैदराबाद और दिल्ली में भी यह अधूरे में लटका है। बुलेट ट्रेन के जापानी कर्ज का बोझ है ही। इस परियोजना का अब आगे बढ़ पाना मुश्किल है। चुनाव आते रहेंगे और राजनीतिक दल, विशेष रूप से सत्ताधारी दल, उन पर पैसा खर्च करेंगे। देश के बाहर काला धन है, उसे लाकर गरीबों में बांटने के सपने की योजना मोदी ने रखी थी, कोरोना संकट ने उस पर काम करने का अच्छा मौका दिया हुआ है। उद्योगपति, व्यापारी और व्यवसायी निवेश करें, अब ऐसा माहौल बनाया जाना चाहिए। उद्योगपतियों का भाग जाना अब नई आत्मनिर्भरता की ओर बढ़े हिंदुस्थान के लिए ठीक नहीं है। उद्यमियों व व्यापारियों को संभालना होगा। इसके लिए ईडी और सीबीआई जैसी डरानेवाली ‘राजनीतिक’ संस्थाओं का कुछ समय के लिए ‘लॉकडाउन’ करना होगा। लॉकडाउन-४ की घोषणा के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा २० लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा के बाद भी शेयर बाजार के बैल ने अपनी पूंछ तक क्यों नहीं हिलाई? इसे देखते हुए केवल यही कयास लगाए जा सकते हैं कि पूंजीपति व निवेशक असमंजस की स्थिति में हैं। उन्हें राज्यों के मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री द्वारा विश्वास और अभय दिया ही जाना चाहिए!