नक्कालों से सावधान?

गैर जिम्मेदार सियासी दौर में किसी राजनेता पर विश्वास करना, मतदातओं के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं। फरेब, मक्कारी, धोखेबाजी, वादाखिलाफी व चुनावों में झूठ बोलकर वोट हथियाने का प्रचलन तेजी से बढ़ा है। ऐसे दौर में वोटरों को नक्कालों की पहचान कर उनसे सावधान रहना ही समझदारी माना जाएगा। इस वक्त राजनेताओं के प्रति अवाम में भयंकर आक्रोश व्याप्त है। पिछले कुछ सालों से कोई भी सियासी दल या राजनेता मतदाताओं के विश्वास पर खरा नहीं उतर सकें। जनता की जनभावनाओं को पैरों तले कुचला जा रहा है। चुनावी समर में अपने-अपने घोषणा पत्रों में तमाम लच्छेदार-लोकलुभावन वायदे करना और चुनाव के बाद भूल जाना? ये तरीका तकरीबन बड़े सभी राजनैतिक दलों ने अपना लिया है लेकिन इस प्रथा से मतदाता ठगे जा रहे हैं।
राजनीति से युवाओं का मोहभंग होता जा रहा है। खैर, देश में फरेब की राजनीति का अखाड़ा फिर सज चुका है। लोकसभा चुनाव की हलचल शुरू हो गई है। किसी भी सूरत में चुनाव जीतने के लिए विभिन्न दलों ने एक बार फिर कमर कस ली है। दरअसल इस बार ज्यादातर सियासी दल मुद्दाविहीन हैं, जिसमें प्रमुख पार्टियां विशेष रूप से शामिल हैं। केंद्र की सत्ताधारी पार्टी अपने सबसे बड़े मुद्दे ‘राम मंदिर निर्माण’ को लेकर फंस चुकी है। मंदिर के सहारे ही वह अपनी जर्नी को दो सीटों से लेकर दो सौ तक पहुंचाने में सफल रहें, लेकिन उसके बदले उन्होंने जनता को कुछ नहीं दिया, इसकी समीक्षा आगामी चुनाव में मतदाता करेंगे। मंदिर का मसला कम होने की बजाय और उलझ गया। यही कारण है कि रामभक्त मंदिर के मुद्दे को लेकर सरकार को घेरे हुए हैं। निश्चित रूप से भाजपा को २०१४ में मंदिर को लेकर किए वादों का जवाब २०१९ में जनता को देना पड़ेगा।
विचित्र सियासी युग में मतदाता पसोपेश में है। अपना समर्थन किसे दे, या किसे न दें? इसको लेकर भंवर में फंसा है। विशेषकर देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश के मतदाताओं को समझ में नहीं आ रहा कि वहां किस ओर जाए। बसपा-सपा के बीच गठबंधन होने से कमोबेश स्थिति और खराब हो गई है। अभी तक बसपा और सपा के समर्थकों में छत्तीस का आंकड़ा हुआ करता था लेकिन जब दोनों दलों की सियासी जमीन खिसकी तो आपस में दो कट्टर दुश्मनों ने हाथ मिला लिया, इससे दोनों तरफ के समर्थकों में खासी नाराजगी है। हालांकि खुलकर कोई अपनी नाराजगी का इजहार नहीं कर रहा है लेकिन उनके मन की टीस का असर आगामी चुनाव में जरूर देखने को मिलेगी। ऐसी ही तस्वीर अभी दो माह पहले राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में देखने को मिली। जहां मतदाताओं ने किसी दल को वोट न देकर ‘नोटा’ का इस्तेमाल करना उचित समझा।
हाल में संपन्न हुए कुछ विधानसभा चुनावों से मतदाताओं की जागरूकता साफ नजर आई। छत्तीसगढ़ में ७५ फीसदी, गोवा में ८० फीसद तो राजस्थान में ७० फीसदी से अधिक मतदान हुआ है। साफ है कि अब जनता लोकतंत्र के अपने इस सबसे बड़े अधिकार का उपयोग करना सीख गई है। पहले ज्यादातर लोग चुनाववाले दिन को अवकाश का दिन समझते थे और मतदान से कन्नी काटते थे। मगर अब समय बदल चुका है। मतदाता यह जान गया है कि देश-निर्माण में उसका भी बड़ा योगदान है। मतदाता अब किसी का गुलाम नहीं, उस पर किसी का पहरा नहीं? अपनी इच्छा से वोट देता है। सपा-बसपा गठबंधन से संभावना यही जताई जा रही है कि दोनों दलों को भयंकर नुकसान होनेवाला है। उनके समर्थकों का मत किसी दूसरी पार्टी में जाने की संभावना है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में मौजूदा राजनीति ने गलत परिपाटी के बीज बो कर, सभी के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं लेकिन इस कुंद व्यवस्था ने जनता को काफी समझदार बना दिया हैं। गांव के किसान से लेकर मल्टीनेशनल कंपनी में काम करनेवाले कर्मचारी में भी राजनीतिक जागरूकता का प्रसार हुआ है। हिंदुस्थान का मतदाता अब अपने विवेक और समझ का इस्तेमाल करता हैं। वह किसी के बहकावे में नहीं आता। चुनाव प्रचार के दौरान सबके लिए ‘हां’ कहता है लेकिन मतदान के दिन अपने मन की ही करता है। मतदाताओं के मन की बात को समझना भी सियासी दलों के लिए मुश्किल हो गया है। कब उनका खेल बिगाड़ दे, इसका अंदाजा उन्हें हो गया है।
२०१९ के आम चुनाव में कूदने के लिए किसी दल के पास वोट पाने का इस बार कोई ठोस मुद्दा नहीं है। ज्यों-ज्यों चुनाव नजदीक आता जा रहा है, प्रत्येक दल एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने का काम शुरू कर दिए हैं। पश्चिम बंगाल में जमकर सियासी नौटंकी हो रही है। भ्रष्टाचार में फंसे अपने नेताओं को बचाने के लिए वहां की मुख्यमंत्री धरने पर बैठी हैं। इसके अलावा विपक्ष के करप्ट नेताओं पर सीबीआई और अन्य एजेंसियों की ताबड़तोड़ छापेमारी जारी है।
डांवांडोल स्थिति के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पूरी उम्मीद है कि अगली सरकार भी उन्हीं की बनेगी। यही वजह है कि अपने आखिरी बजट के जरिए मतदाताओं को लुभावने की कोशिशें की गई हैं। बजट में मध्यम दर्जे के किसानों को सालाना छह हजार की खैरात देने का एलान हुआ है लेकिन उनके इस कदम को किसान चुनावी हथकंडा बता रहे हैं। किसानों का कहना है उनकी मांगों का विकल्प मात्र ‘छह हजार’ नहीं हो सकते। केंद्र का रास्ता खोलनेवाले सूबे उत्तर प्रदेश सरकार का भी पिछले सप्ताह बजट हुआ। पौने पांच हजार करोड़! यानी आजादी के बाद किसी भी सरकार का अब तक का सबसे भारी-भरकम बजट। पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के पूरे बजट से भी २० फीसद ज्यादा।
बजट में किसानों की कर्ज माफी, मुफ्त एलपीजी सिलिंडर, मकान देने जैसी बातें भी हो रही हैं। दुखद है कि कोई भी रोजगार बढ़ाने या देने की बात नहीं कर रहा है। नेता भी यह जान गए हैं कि अब गरीबी-महंगाई से मुक्ति नहीं, बल्कि मुफ्तखोरी जनता के लिए जरूरी है। यह तस्वीर बदलनी चाहिए। विकास के मुद्दों पर चुनाव लड़े जाने चाहिए और समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास की रोशनी वैâसे पहुंचे? इसकी कोशिश की जानी चाहिए। मगर लगता है कि ये सब बातें हमारे राजनीतिक दलों की प्राथमिकता में अब बची ही नहीं। २०१९ आम चुनाव नेताओं का नहीं, बल्कि मतदाताओं की परीक्षा है।