नशे की भेंट चढ़ती युवा पीढ़ी

युवा वर्ग में रेव पार्टियों का बढ़ता प्रचलन गंभीर चिंता का विषय है, एक त्रासदी है, विडंबना है। ऐसे बहुत से गिरोह सक्रिय हैं जो युवा वर्ग को नशे की दलदल में ढकेल रहे हैं। दिल्ली और एनसीआर में एक के बाद एक पकड़ी जा रही रेव पार्टियों से स्पष्ट है कि दिल्ली का युवा वर्ग नशे की चपेट में आ चुका है। पहले उत्तर प्रदेश के नोएडा में एक फार्म हाउस में चल रही रेव पार्टी पर छापा मारा गया था, तब १९२ लोगों को गिरफ्तार किया गया था, जिनमें ३१ युवतियां भी शामिल थीं। अब दिल्ली के छतरपुर में एक कंपाउंड में रेव पार्टी पर छापेमारी की गई। दिल्ली पुलिस और एक्साइज डिपार्टमेंट की कार्रवाई में नाबालिग लड़कों और लड़कियों समेत एक हजार लोगों को पकड़ा गया। भारी मात्रा में शराब और मादक पदार्थ पकड़े गए हैं। पंजाब की तर्ज पर दिल्ली एवं एनसीआर में बढ़ती रेव पार्टियां उन्मुक्त होने एवं नशे की अंधी सुरंगों में उतरने का एक माध्यम है, जो समाज एवं राष्ट्र के लिए खतरनाक साबित होती जा रही है। क्या ऐसी पार्टियां बिना स्थानीय पुलिस की मिलीभगत के हो सकती हैं? यह सब कुछ पुलिस और ड्रग्स एवं नशे का धंधा करनेवालों की सांठ-गांठ से ही होता है। इसमें सरकार की नीतियों पर भी प्रश्न खड़े होते हैं।
रेव पार्टियों की नई पनप रही संस्कृति अनेक विकृतियों का सबब बन रही है, जिसमें युवापीढ़ी को नए-नए नशे के साधन उपलब्ध कराए जाते हैं। देर रात तक चलनेवाली इन पार्टियों में महफिलें जमती हैं, देश के कई हिस्सों में हर वीकेंड पर फार्म हाउस एवं आलीशान बिल्डिंगों, होटलों में ये महफिलें सजती हैं। इन महफिलों में आनेवाले लोगों को पूरी रात डांस, म्यूजिक, ड्रग्स आदि का काकटेल मिलता है। चमचमाती गाड़ियों में घर लौट जाते हैं। इन महफिलों की सूचना भी खास-खास लोगों को सोशल मीडिया पर दी जाती है। समाज में मादक पदार्थों के एजेंट सक्रिय हैं जो युवा पीढ़ी को ऐसी पार्टियों के लिए आकर्षित करते हैं। रेव पार्टियों में पकड़े जानेवाले लोगों में स्कूल जानेवाले छात्र-छात्राओं से लेकर बड़े बिजनेसमैन, राजनीतिज्ञों और अफसरों के बच्चे तक शामिल हैं। ऐसी पार्टियों में ऊंची पहुंचवाले और पैसे वाले ही जा सकते हैं। आयोजक न केवल एक ही रात में लाखों कमाते हैं बल्कि जो लड़के-लड़कियां अपने ज्यादा दोस्तों को लाते हैं, उन्हें भी मोटी कमीशन दी जाती है। यह रातों को रंगीन बनाने का जरिया बनता जा रहा है लेकिन ये रंगीनियां कितने अंधेरों एवं खतरों का कारण बन रही हैं, इस पर चिंतन करना जरूरी है।
गोवा, पुणे, खंडाला, पुष्कर, मनाली से चली रेव पार्टियों ने अब दिल्ली और आस-पास के शहरों में जगह बना ली हैं। ड्रग्स का धंधा करनेवालों के लिए यह पार्टियां फायदे का धंधा बन गई हैं। जो देश के युवाओं को बर्बाद कर रहे हैंै, अब तो लड़कियों ने भी सारी सीमाएं तोड़ दी हैं। मादक पदार्थों, शराब, बीयर से लेकर तेज मादक पदार्थों, औषधियों तक की सहज उपलब्धता से इन रेव पार्टियां के प्रति युवा एवं किशोर वर्ग का आकर्षक बढ़ता जा रहा है। इस दीवानगी को ओढ़ने के लिए प्रचार माध्यमों ने भी भटकाया है। सरकार भी विवेक से काम नहीं ले रही है। शराब बंदी का नारा देती है, नशे की बुराइयों से लोगों को आगाह भी करती है और शराब, तंबाकू का उत्पादन भी बढ़ा रही है। राजस्व प्राप्ति के लिए जनता की जिंदगी से खेलना क्या किसी लोककल्याणकारी सरकार का काम होना चाहिए? वैâसी विडंबना एवं विसंगति है कि लाइसेंस से ज्यादा की शराब बरामद हुई इसलिए आयोजकों के खिलाफ कार्रवाई हुई, लेकिन तयसीमा में पार्टी करने का सरकारी लाइसेंस होने पर ऐसी पार्टियां आयोजित हो सकती हैं? यह कैसी समाज-व्यवस्था है जिसमें लाइसेंस लेकर आप चाहे जो करो? इनके पीछे कौन-कौन लोग हैं, जो देश के युवाओं को बर्बाद कर रहे हैं, ड्रग्स एवं मादक पदार्थों के सेवन से जवानी खत्म हो रही है। इसके बावजूद उन पर हाथ डालने की हिम्मत किसी में नहीं होती।
विश्व की गंभीर समस्याओं में प्रमुख है मादक पदार्थों का उत्पादन, तस्करी और सेवन की निरंतर हो रही वृद्धि। नई पीढ़ी इस जाल में बुरी तरह वैâद हो चुकी है। आज हर तीसरा व्यक्ति किसी न किसी नशे का आदी हो चुका है। गुजरात प्रांत में कुल शराबबंदी है, क्योंकि वह महात्मा गांधी का गृह प्रदेश है। क्या पूरा देश गांधी का नहीं है? वे तो राष्ट्र के पिता थे, जनता के बापू थे। नशे की संस्कृति युवा पीढ़ी को गुमराह कर रही है। अगर यही प्रवृत्ति रही तो सरकार, सेना और समाज के ऊंचे पदों के लिए शरीर और दिमाग से स्वस्थ व्यक्ति नहीं मिलेंगे। एक नशेड़ी पीढ़ी का देश वैâसे अपना पूर्व गौरव प्राप्त कर सकेगा?
राजधानी दिल्ली की बस्तियों में नजर डालें तो आपको पार्कों में, सड़कों के किनारे नशा करते लोग दिखाई दे जाएंगे। पुनर्वास कॉलोनियों में तो ८० फीसदी बच्चे ड्रग्स के आदी हो चुके हैं। कबाड़ बीन कर रोजाना तीन सौ रुपए कमानेवाले लोग अपना पैसा ड्रग्स पर खर्च कर रहे हैं। नशा और नशे का कारोबार अपनी सीमाएं पार कर रहा है। अमीर वर्ग महंगे ड्रग्स की दलदल में फंसा है तो गरीब वर्ग सस्ते नशों की गिरफ्त में है। पानी सिर के ऊपर बहने लगा है। जब तक ड्रग्स सप्लाई की चेन नहीं टूटेगी तब तक नशे का खात्मा करना मुश्किल है, भले ही कानून कितना ही सख्त क्यों न हों।
प्रसिद्ध फुटबॉल खिलाड़ी मैराडोना, पॉप संगीत गायक एल्विस प्रिंसले, तेज धावक बेन जॉनसन, युवकों का चहेता गायक माइकल जैक्सन, ऐसे कितने ही खिलाड़ी, गायक, सिने कलाकार नशे की आदत से या तो अपनी जीवन लीला समाप्त कर चुके हैं या बरबाद हो चुके हैं। नशे की यह जमीन कितने-कितने आसमान खा गई। विश्वस्तर की ये प्रतिभाएं कीर्तिमान तो स्थापित कर सकती हैं, पर नई पीढ़ी के लिए स्वस्थ विरासत नहीं छोड़ पा रही हैं। नशे की ओर बढ़ रही युवापीढ़ी बौद्धिक रूप से दरिद्र बन जाएगी। जीवन का माप सफलता नहीं सार्थकता होती है। सफलता तो गलत तरीकों से भी प्राप्त की जा सकती है, जिनको शरीर की ताकत खैरात में मिली हो वे जीवन की लड़ाई कैसे लड़ सकते हैं?
कितने ही परिवारों की सुख-शांति परिवार का मुखिया शराब के साथ पी जाता है। बूढ़े मां-बाप की दवा नहीं, बच्चों के लिए कपड़े-किताब नहीं, पत्नी के गले में मंगलसूत्र नहीं, चूल्हे पर दाल-रोटी नहीं, पर बोतल रोज चाहिए। अस्पतालों के वॉर्ड ऐसे रोगियों से भरे रहते हैं जो अपनी जवानी नशे को भेंट कर चुके होते हैं। ये तो वे उदाहरणों के कुछ बिंदु हैं, वरना करोड़ों लोग अपनी अमूल्य देह में बीमार फेफड़े और जिगर लिए एक जिंदा लाश बने जी रहे हैं पौरुषहीन भीड़ का अंग बनकर। हजारों-लाखों लोग अपने लाभ के लिए नशे के व्यापार में लगे हुए हैं और राष्ट्र के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। चमड़े के फीते के लिए भैंस मारने जैसा अपराध कर रहे हैं। बढ़ती नशा प्रवृत्ति के चलते महिलाओं के प्रति अपराध बढ़ रहे हैं। हैरानी की बात तो यह है कि दिल्ली में उड़ता पंजाब की तर्ज पर नशा युवा पीढ़ी के लिए नासूर बन रहा है फिर भी कहीं से कोई इसके खिलाफ आवाज नहीं उठा रहा है, वैâसा विचित्र सन्नाटा पसरा है। राजधानी ने बड़े-बड़े राजनीतिक एवं सामाजिक आंदोलन देखे हैं लेकिन इस समय जरूरत है एक नशामुक्ति आंदोलन की, रेव पार्टियों पर अंकुश की। अगर ऐसा नहीं किया गया तो युवा वर्ग नशे की दलदल में इतना फंस जाएगा, जहां से उसे निकालना मुश्किल होगा। किसी भी महानगर का रात की बांहों में झूमना जीवन की शैली हो सकता है लेकिन नशे में झूमना एक वैंâसर है। नशे की आदत कांच की तरह नहीं टूटती, इसे लोहे की तरह गलाना पड़ता है। पक्षी भी एक विशेष मौसम में अपने घोंसले बदल लेते हैं पर मनुष्य अपनी वृत्तियां नहीं बदलता। वह अपनी वृत्तियां तब बदलने को मजबूर होता है जब दुर्घटना, दुर्दिन या दुर्भाग्य का सामना होता है। आखिर हम क्यों दुर्घटना, दुर्दिन या दुर्भाग्य का इंतजार कर रहे हैं?