नसीरुद्दीन, गाय और इंसान, जरा मुद्दे को समझ लो!

अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने एक बयान दिया। उसका प्रतिसाद १५ दिनों बाद भी सामने आ रहा है। नसीरुद्दीन ने ऐसा कहा कि एक पुलिस निरीक्षक की मौत से ज्यादा गाय की मौत को महत्व दिया जा रहा है। देश के माहौल में बहुत जहर घोला जा रहा है। ऐसी अवस्था में मुझे मेरे बच्चों की चिंता होती है। ऐसा नसीरुद्दीन ने कहा तो उन्हें ‘मुल्ला’ नसीरुद्दीन ठहराकर एक विशिष्ट वर्ग ने उनकी अच्छे से खबर ली। नसीरुद्दीन के बयान पर आलोचना या चर्चा हो सकती है। लेकिन उनके इस बयान पर उन्हें पाकिस्तान चले जाओ, ऐसा कहा गया। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में ‘गोमांस’ बेचा जाता है, इस वजह से दंगा भड़का व भीड़ ने पुलिस अधिकारी की हत्या कर दी। इसी से हमारे देश में पुलिस की हत्या की तुलना में गौ हत्या अधिक महत्वपूर्ण सिद्ध हुई, ऐसा बयान इस अभिनेता ने दिया व तूफान खड़ा हो गया। श्री नसीरुद्दीन शाह कहते हैं, ‘देश के प्रति मेरे मन में उठ रही चिंता पर मैंने अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। तो क्या मुझे गद्दार ठहराना चाहिए।’ देश का माहौल खराब करके फिर एक बार धर्म और जाति के आधार पर दरार पड़े, ऐसा जिन्हें लगता है उन्हें देश की नाजुक स्थिति समझ लेनी चाहिए। गोधरा दंगों के बाद प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को ऐसी ही चिंता लगी थी तथा उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री रहे वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उन्होंने राजधर्म का पालन करने के संबंध में मार्गदर्शन किया था। फिर क्या तुम अटल जी को भी दोष दोगे?
आत्मपरीक्षण!
नसीरुद्दीन शाह को अपराधियों के कटघरे में खड़ा करनेवालों को आत्मपरीक्षण करने की आवश्यकता है। गाय महत्वपूर्ण है या इंसान? यह सवाल नसीरुद्दीन शाह के मन में उठा। उसी तरह से वह हिंदुत्ववाद के जनक वीर सावरकर के मन में भी उठा था। गाय के लिए इंसानों की हत्या करनेवाले नराधम हैं। जिन्हें गाय गोमाता लगती है उनकी श्रद्धा का आदर होना चाहिए लेकिन गोवा और ईशान्य के कई राज्यों में भाजपा की सरकार है। वहां ये गोमाता नहीं है और गोमांस अन्न है। वहां गाय को मारने पर इंसान की हत्या नहीं होती। मुंबई जैसे शहर में सिर्पâ मांसाहार करने की वजह से मराठियों को घर देने से मना करनेवाले जैन हैं और जैन समाज आज मोदी समर्थक है। गाय काटनेवाले और मराठी लोग मांसाहार करते हैं इसलिए घर देने से मना करना एक ही मनोवृत्ति है तथा इन दोनों से समाज को खतरा है। नसीरुद्दीन शाह जैसे कलाकार गाय और इंसान के बारे में बोलते हैं लेकिन मुंबई के शाकाहारियों के हिंसाचार के खिलाफ कभी नहीं बोलते।
कितनी हत्या हुई?
बुलंदशहर में गाय मारने की वजह से एक पुलिस अधिकारी की हत्या हो गई। गोमांस साथ रखने की वजह से देश में अब तक करीब ५० लोगों की हत्या हो चुकी है। नोटबंदी ने १०० बलि ले ली। कश्मीर में रोज सैनिक मर रहे हैं। लेकिन देश में चर्चा होती है और उस पर हंगामा होता है तो सिर्पâ गोहत्या तथा उसके कारण होनेवाली मनुष्य हत्या पर। मुसलमान बीफ खाते हैं। उसी तरह अन्य धर्मों के लोग भी खाते हैं। खानेवाले कुछ लोग मोदी के मंत्रिमंडल में हैं तथा उन्हें सरकारी सुरक्षा में गोमांस खाने का संपूर्ण अधिकार इसीलिए मिला है। ये बात मजेदार ही है।
भक्तों का हमला
फिल्म जगत में एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो अपनी भावना हमेशा ही व्यक्त करता है। दूसरा वर्ग आएगा, वह सरकार की चमचागीरी करके सत्ता और पद पाता है। हिंदुस्थान में अमिताभ बच्चन आज भी शिखर पर हैं। लेकिन राजनैतिक विषयों पर वे कभी भी मत प्रदर्शन नहीं करते। यह संयम उन्होंने पाल रखा है क्योंकि कांग्रेस के गांधी परिवार से लेकर उत्तर प्रदेश के मुलायम सिंह यादव के प्रचार तक में एक समय पूरा बच्चन परिवार उतरा था। चाहनेवालों को यह पसंद नहीं आया। नसीरुद्दीन शाह व उनके जैसे अन्य कलाकार ‘मुसलमान’ के रूप में एक डर वेâ कारण मत प्रदर्शन करते हैं तथा मोदी के भक्त उन पर टूट पड़ते हैं। अर्थात श्री शाह ने मुसलमान की हैसियत से पाकिस्तान का गुणगान नहीं किया। इसे भी ध्यान में रखना चाहिए। मेरी जानकारी के अनुसार उनका एक भाई हिंदुस्थानी सेना से सेवानिवृत्त हुआ है तथा उन्होंने ईशान्य स्थित सीमा रेखा पर देश रक्षा का बड़ा काम किया था। नसीरुद्दीन शाह ने अपना मत संयम के साथ व्यक्त किया। उत्तर प्रदेश के आजम खान जैसा बयान उन्होंने नहीं दिया। फिर भी शाह को पाकिस्तान चले जाओ, ऐसा कहनेवाले मोदीभक्त जिस तरह से दहशत मचाते दिखे, वह तरीका भद्दा है। आमिर खान और शाहरुख खान ने भी पहले ऐसे ही बयान दिए थे लेकिन इन दोनों खानों के कार्यक्रम में भाजपा नेता और मुख्यमंत्री जाते हैं तथा जांघ से जांघ सटाकर बैठते हैं। इस देश में हर किसी को अभिव्यक्ति की आजादी है, इसे समझ लेना चाहिए।
ऐसा करके दिखाओ!
श्री राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी के विरोध में ही बोलते हैं, फिर भी सरकार ने उनकी नकेल नहीं कसी। राहुल गांधी तथा उनका पूरा खानदान किस तरह से मुस्लिम वंशज है, यह सिद्ध करने का ‘घिसापिटा’ प्रयास बीच के दिनों में सोशल मीडिया पर हुआ। अब नसीरुद्दीन शाह को देशद्रोही ठहराने का वैसा ही प्रयास चल रहा है। यहां के मुसलमानों को एकमुश्त पाकिस्तान भेजकर उनकी ताकत बढ़ाने की बजाय पाकिस्तान को हिंदुस्थान में लाकर अखंड हिंदुस्थान का सपना (संघ का) साकार करने पर जोर दो। ऐसी मांग मोदी के समक्ष करो। कम-से-कम पाक के कब्जे से कश्मीर तो ले आओ। नसीरुद्दीन शाह से पहले कई हिंदू बुद्धिजीवियों ने ऐसी ही भावना और डर व्यक्त किया है। तो उन सभी को तुम कौन से देश में भगानेवाले हो?
यही सही वेदना
‘भारत मेरी मातृभूमि है। देश की आलोचना करने में मुझे भी वेदना होती है। लेकिन यदि देश में कुछ गलत होता है तो मैं बोलता ही रहूंगा। मेरी चार पीढ़ी इस देश में जन्मी है। मेरा जन्म यहीं हुआ है। मेरे बच्चे भी यहीं रहेंगे। मैं देशभक्त हूं। यह ढोलकर बजाकर मुझे कहने की आवश्यकता नहीं है।’ ऐसा नसीरुद्दीन शाह अंतत: बोले। ‘मुझे मेरे बच्चों की चिंता है क्योंकि उनका कोई धर्म नहीं है। हमने उन्हें धर्म की शिक्षा दी ही नहीं क्योंकि अच्छे या बुरे का धर्म से लेना-देना नहीं है। कल को मेरे बच्चों को भीड़ ने घेर लिया और पूछा कि तुम्हारा धर्म कौन-सा है? तो वे क्या उत्तर देंगे। इसकी चिंता होती है क्योंकि उनके पास कोई जवाब ही नहीं होगा।’ यह नसीरुद्दीन की वेदना होगी तो उनकी वेदना को समझना चाहिए। समझने की स्थिति में आज देश नहीं है। देश बहरा हो गया है।