नहीं छूट सकता, फुटपाथ का प्यारा साथ

‘रहने को घर नहीं, सोने को बिस्तर नहीं, अपना तो है ऊपरवाला…’ यह चर्चित गाना मायानगरी मुंबई में फुटपाथों पर अपना गुजर-बसर करनेवालों पर सटीक बैठता है। इसी ऊपरवाले के भरोसे तो गरीब लोग मुंबई की फुटपाथों पर सोते हैं परंतु उनका यह भरोसा दगा दे जाता है और अक्सर होनेवाली दुर्घटना के वे शिकार बन बैठते हैं। विक्रोली में शनिवार की रात ऐसे ही एक दर्दनाक हादसे में ३ लोगों की मौत हो चुकी है। एक पार्क टैंकर को दूसरे टैंकर द्वारा टक्कर मारने से फुटपाथ पर सो रहे इन तीनों को अपनी जान गंवानी पड़ी। यह कोई पहली घटना नहीं है, इसके पहले भी फुटपाथ पर सो रहे लोगों को गाड़ी ने कुचल डाला है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित स्टेट शेल्टर मॉनिटरिंग समिति की मानें तो हर वर्ष १०० से ज्यादा बेघर लोगों की मौत सड़क हादसे, बीमारी या अन्य किसी वजह से होती रहती है। इसके बावजूद इन बेघर लोगों के पास फुटपाथ के सिवाय रहने का कोई दूसरा चारा नहीं है। कारण है शहर में रैन बसेरा का अभाव। इसी अभाव की वजह से देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में वर्तमान में २ लाख बेघर फुटपाथ पर रहने को मजबूर हैं, जिससे इन पर हमेशा मौत का साया मंडराते रहता है। इनकी सुध लेने में प्रशासन कोई दिलचस्पी नहीं ले रहा है।
मुंबई के उपनगरीय इलाके विक्रोली में शनिवार की रात टैंकर की चपेट में आने से फुटपाथ पर सो रहे एक मासूम सहित ३ लोगों की मौत हो गई। इस हादसे से एक बार फिर फुटपाथ पर रह रहे बेघरों के रैन बसेरा के मुद्दे ने जोर पकड़ लिया है। बेघरों के लिए काम करनेवाली संस्थाओं की मानें तो मुंबई के बेघरों की संख्या को देखते हुए शहर में करीब १२५ रैन बसेरा होना चाहिए।
बता दें कि मुंबई की सवा करोड़ की आबादी में २ लाख लोग बेघर हैं। विभिन्न राज्यों से आए ये लोग यहां निर्माण कार्य, ट्रैफिक सिग्नलों पर सामान बेचने, नाला सफाई जैसा कार्य कर अपना पालन-पोषण कर रहे हैं। दिन भर काम करके ये लोग रात के समय फुटपाथ पर ही सोने को मजबूर हैं। मॉनसून और ठंडी के इन मौसमों के अलावा सड़क हादसों में जान गंवा रहे फुटपाथ पर रहनेवाले इन बेघरों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष २०१० में रैन बसेरा बनाने का आदेश स्थानीय मनपा प्रशासन को दिया था। रैन बसेरों के लिए कोर्ट ने एक निगरानी समिति का गठन भी किया था। स्टेट शेल्टर मॉनिटरिंग समिति के सदस्य ब्रिजेश आर्य की मानें तो रैन बसेरो के निर्माण में मनपा प्रशासन कछुए की चाल चल रही है। २०११ की जनगणना में बेघरों की संख्या ५० हजार थी जो अब बढ़कर २ लाख हो गई है। ब्रिजेश ने बताया कि कोर्ट के दिशा-निर्देश के मुताबिक मुंबई की कुल जनसंख्या के हिसाब से शहर में १२५ रैन बसेरा होना चाहिए जबकि मौजूदा रूप में माटुंगा, कमाठीपुरा, बांद्रा, दादर, अंधेरी और चर्चगेट में गिने-चुने रैन बसेरा हैं, वो भी बच्चों के लिए न कि बड़ों के लिए। ब्रिजेश कार्य ने बताया कि निधि का अभाव बताकर मनपा प्रशासन रैन बसेरा के निर्माण में कछुए की चाल चल रहा है जबकि निधि केंद्र के जरिए राज्य को मुहैया कराई जा रही है। योजना और शहरी गरीबी उन्मूलन सेल की सहायक मनपा आयुक्त संगीता हसनाले ने बताया कि करीब ८ रैन बसेरा बनाने की योजना है। इसमें से तीन रैन बसेरा बनाया जा चुका है। इसके अलावा नई डिपी में ३३ रैन बसेरा बनाने का प्रस्तावित किया गया है।

२ लाख लोग सोते हैं खुले आकाश में
इनके लिए चाहिए १२५ रैन बसेरा
फुटपाथों पर अक्सर होती हैं दुर्घटनाएं
गत शनिवार को विक्रोली में ३ की मौत