नाणार की धमकियां! परियोजना महाराष्ट्र में ही रखो!!

जो भी उठता है वह महाराष्ट्र को अक्ल सिखाने लगता है, ऐसा पिछले कुछ वर्षों में घटित हो रहा है। दूसरी बात यह है कि जो भी उठता है वह कोकण की प्रकृति को चौपट करने निकल पड़ता है। यह बात नाणार परियोजना ने दिखा दी है। नाणार जैसी रिफाइनरी परियोजना लादकर प्रकृति से समृद्ध कोकण की भूमि को बर्बाद मत करो, ऐसी भूमिका शिवसेना की होने के बावजूद वेंâद्र सरकार ने स्थानीय जनता के विरोध को नजरअंदाज कर एक अरबी वंâपनी के साथ इस परियोजना का आपसी समझौता किया है। स्थानीयों का विरोध होगा तो नाणार परियोजना नहीं होगी, ऐसा शब्द कहने के बावजूद मुख्यमंत्री ने विश्वासघात किया है। मुख्यमंत्री झूठ बोले तथा उन्होंने कोकण की जनता को मूर्ख बनाया है। झूठ बोलने के मामले में तो मुख्यमंत्री और दस कदम आगे बढ़ गए हैं। मुख्यमंत्री ने अब घोषित किया है कि लोगों का ऐसा ही विरोध होता रहा तो नाणार रिफाइनरी गुजरात चली जाएगी। मुख्यमंत्री ने यह धमकी दी है या फिर उन्होंने किसी और की चमचागीरी की है! मुख्यमंत्री को ‘नाणार’ परियोजना बचानी चाहिए लेकिन उसके लिए कोकण के झरने, समुद्र, मछलियां, खेती, आम के बागानों की बलि क्यों चढ़ा रहे हो? सारी जहरीली परियोजनाएं एक साथ कोकण के ही समुद्र किनारे क्यों लाई जा रही हैं? प्रकृति, बागवानी, मछलीमारी और पर्यटन के साथ ही कोकण की जनता का स्वास्थ्य भी खतरे में पड़ जाएगा, इसका विचार मुख्यमंत्री नहीं करते, इस बात का आश्चर्य होता है। पहले एनरॉन, फिर जैतापुर की अणु ऊर्जा परियोजना और अब नाणार रिफाइनरी परियोजना। इसके अलावा दूसरी और औद्योगिक परियोजनाएं कोकण की भूमि पर क्यों नहीं लाई जातीं? जहाज निर्माण परियोजनाएं समुद्र किनारे भली-भांति निर्माण की जा सकती हैं। गोवा में जिस तरह फार्मास्यूटिकल उद्योग ने एकछत्र राज्य स्थापित किया है उसी तरह के उद्योग कोंकण में भी हाथ-पैर फैला सकते हैं। पर कोंकण के माथे मारी जाती हैं तो समुद्र किनारे तथा हवा को प्रदूषित करनेवाली जहरीली परियोजनाएं। शिवसेना विकास के कभी खिलाफ नहीं थी और न रहेगी। पश्चिम बंगाल में वामपंथियों ने तथा बाद में ममता ने उद्योग का विरोध किया और ‘टाटा’ की नैनो जैसी परियोजना सिंगूर से बाहर निकल गई। शिवसेना ने इस तरह विरोध के लिए विरोध की राजनीति कभी नहीं की। मुंबई, पुणे, नासिक, संभाजी नगर जैसे शहरों में उद्योग टिके और विकास हुआ तो शिवसेना की उदार नीति के कारण ही। कामगार क्षेत्र में दबदबा होने के बावजूद उद्योगपति और उनके उद्योग बंद न पड़ें इसका विशेष खयाल हमने रखा। उद्योग आएगा तो मजदूरों को काम मिलेगा। उनकी उन्नति होगी, इस तरह की भूमिका हम लेते रहे हैं इसलिए शिवसेना विकास का विरोध कर रही है इस तरह की ‘गप’ पर जनता विश्वास नहीं करेगी। कृषि, पर्यटन, बागवानी, मछलीमारी यह कोकणवासियों का परंपरागत व्यवसाय है। इतना ही हमारा फिलहाल हाथ जोड़कर कहना है। विरोध होता रहा तो नाणार रिफाइनरी गुजरात में चली जाएगी, ऐसा मुख्यमंत्री ने कहा है। नाणार परियोजना मतलब मुख्यमंत्री को अमदाबाद-मुंबई बुलेट ट्रेन लगती है क्या? मुख्यमंत्री संयम रखें और महाराष्ट्र के वे मुख्यमंत्री हैं इसका खयाल रखकर बोलें। पिछले दिनों गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल मुंबई आई थीं और यहां के उद्योगपतियों को ‘फुसलाने’ की कोशिश की थी। ‘मुंबई में क्या रखा है? उद्योगपतियों गुजरात चलो।’ ऐसा आनंदी बेन ने कहा था। तब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री आक्रोशित हो उठते तो अच्छा होता। मुख्यमंत्री को मुंबई तथा महाराष्ट्र के उद्योगों की चिंता है, ऐसा हमें लगता। दूसरा ऐसा है कि नाणार जैसी परियोजना गुजरात में जाएगी, ऐसा इशारा क्यों करते हो? हमारे विदर्भ में ले जाओ। वहां भी बड़ी परियोजनाएं आने दो। इस तरह की परियोजनाओं को समुद्र का पानी लगता है। विदर्भ में समुद्र नहीं है, ऐसा जवाब उस पर दिया जाएगा लेकिन नाणार परियोजना के लिए समुद्र का पानी न लेते हुए कोयना के अवजल का इस्तेमाल किया जा सकता है क्या? इस तरह का अंदाजा लगाया जा रहा है। महाराष्ट्र में अन्य स्थानों पर जलविद्युत परियोजनाएं हैं। रायगढ़, ठाणे, नासिक, नगर, कोल्हापुर, पुणे जिले से दूर नागपुर, मराठवाड़ा तक ये केंद्र चालू हैं। यदि कोयना के अवजल का इस्तेमाल रिफाइनरी के लिए करने का अध्ययन किया जा रहा होगा तो इस परियोजना के बारे में भी वैसा विचार और अध्ययन करने में क्या आपत्ति है, ऐसा होने ही वाला होगा तो गुजरात की धमकी न देते हुए इस परियोजना को महाराष्ट्र में अन्यत्र ले जाया जा सकता है। हम तो कहते हैं विदर्भ अथवा मराठवाड़ा में ले जाओ। वहां एक लाख रोजगार का निर्माण होगा और समृद्धि भी आएगी। मुख्यमंत्री का ‘मैग्नेटिक महाराष्ट्र’ का सपना भी एक कदम आगे बढ़ जाएगा। मुख्यमंत्री, इतना करो ही!