" /> नारी के विकास का सकारात्मक पक्ष

नारी के विकास का सकारात्मक पक्ष

नारी शिक्षा को लेकर बहुत चर्चा होती है। न जाने क्यों हम ऐसा सोचते हैं कि भारतीय समाज में नारियों की शिक्षा को लेकर उदासी है। दरअसल हम किसी भी एक बात पर जो भी मत बना लेते हैं, उसी पर अटके रह जाते हैं। समय के साथ स्थिति-परिस्थितियों में बहुत बदलाव आते हैं किंतु हम एक ही बात पर अड़े हैं। उदाहरण के लिए मैं नारी शिक्षा की बात कर रहीं हूं। हम सब जानते हैं कि पौराणिक काल से ही नारी को पुरुषों की तरह ही शिक्षित किया जाता था। शस्त्र-कला, युद्ध कला, पुराण, वेद आदि की शिक्षा दी जाती थी। आप झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का ही उदाहरण लीजिए। वे जिस निपुणता के साथ युद्ध-कला में पारंगत थीं, उतना ही उन्हें वेद-पुराणों का भी ज्ञान था। ऐसे कई उदाहरण इतिहास में उपस्थित हैं और आज भी हैं। तब से अब तक नारी-शिक्षा में अत्यधिक प्रगति हुई है किंतु अभी शत-प्रतिशत सफलता नहीं मिली है।
किसी भी परिवार की नारी जब शिक्षित होती है तो वह अपने परिवार को बड़े अच्छे से संभालती है। पौष्टिक भोजन, स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता, बड़े-बुजुर्गों की देखभाल, बच्चों का पालन-पोषण, घर का आर्थिक संयोजन और परिवार के उतार-चढ़ाव में सशक्त भूमिका के साथ खड़ी रहती है। एक सुशिक्षित नारी ही एक आदर्श परिवार का मेरुदंड होती है इसलिए नारी का सुशिक्षित होना आवश्यक है।
शिक्षा नारी को केवल परिवार संभालने में ही सहायक नहीं हैं बल्कि एक सुशिक्षित नारी का सामान्य ज्ञान भी उत्तम होता है, जिससे वह बाहरी दुनिया को समझ पाती है। इसी के साथ उसका आत्मविश्वास भी बढ़ता है। जागरूक और आत्मविश्वास से भरी हुई नारी परिवार,  समाज और देश का गौरव होती हैं। आज नारी पुरुषों के समान ही प्रत्येक क्षेत्र में कार्यरत है। ऐसा कोई क्षेत्र नहीं हैं, जहां नारियों की उपस्थिति दर्ज न हो। फिर भी न जाने क्यों बार-बार अधिकांश लेखों, सम्मेलनों और भाषणों के उपदेशों में नारी को सदैव ही बेचारी कह कर संबोधित किया जाता है। क्या आप जानते हैं कि मनोविज्ञान कहता है कि जब आप किसी के बारे में केवल नकारात्मक विचार ही प्रगट करते रहेंगे तो उस व्यक्ति की मानसिकता भी नकारात्मक ही होते जाती है। मैं सदैव प्रयत्न करती हूं कि नारी के सकारात्मक पक्षों को सामने लाया जाए, जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़े। हम हमेशा जो नहीं है, उसके बारे में बात करते हैं, जो हैं, उसे अनदेखा करते हैं। समस्याओं पर चर्चा होनी चाहिए किंतु साथ ही नारी के सकारात्मक पक्ष, उसकी उपलब्धियां, उसका देश, समाज और परिवार में योगदान आदि की भी चर्चा होनी चाहिए, इसके लिए उनकी प्रशंसा भी होनी चाहिए। केवल महिला दिवस पर यही नहीं बल्कि सदैव ही उनके योगदान को गौरवान्वित करना चाहिए, इसी से उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा। १०० में से ९५ साक्षर महिलाओं के बारे में चर्चा कर, हम उनका उत्साह-वर्धन करने से विपरीत हम उन ५ महिलाओं के बारे में अधिक चर्चा करते हैं, इसलिए हमें लगता है कि समस्या अधिक गंभीर है। उदाहरण के लिए हिंदुस्थान में १९४७ में साक्षरता दर १२ प्रतिशत थी जो जनगणना २०११ के अनुसार बढ़कर ६५.४६ हुई थी। अब २०११ से लेकर २०२१ के बीच नारी साक्षरता में कितना विकास आया होगा, यह २०२१ की जनगणना के आंकड़े बताएंगे,
२०११ की जनगणना में १० करोड़ ७० लाख पुरुषों की तुलना में ११ करोड़ महिलाएं साक्षर हुई हैं, यह आंकड़े स्वयं ही नारी साक्षरता का बहुत बड़ा उदाहरण है। आज भी हम नारी को कमजोर, भयभीत, बेचारी, निर्भर आदि विशेषण लगाकर उसे आगे बढ़ने से रोकने की चेष्टा करते हैं, किंतु आज सेना से लेकर पुलिस, विदेश, राजनीति, इंजीनियरिंग, चिकित्सा सेवा, बड़े एवं छोटे, माध्यम उद्योगों की मालिक, भारतीय उच्च पदों पर आसीन, नारियों को कैसे अनदेखा कर सकते हैं? गांव में महिलाओं ने घरेलू उद्योग शुरू कर दिए, ग्राम सरपंच बनी हुई महिलाएं, खेतों में ट्रैक्टर चलाती महिलाएं, गांव के बच्चों को पढ़ाती शिक्षिकाएं, क्या ये सब नारी जागरूकता का ठोस उदाहरण नहीं है? यह आगे बढ़ने का आत्मविश्वास इन नारियों में कहां से आया, जी हां यह शिक्षा के माध्यम से ही संभव हुआ है, इसलिए नारी साक्षरता का प्रतिशत बढ़ा है और बढ़ेगा, हमें केवल सकारात्मक सोच से उनके विकास को देखना चाहिए, केवल आलोचना करने से हम नारी के सशक्त पक्ष को देख ही नहीं पाते। अच्छा सोचेंगे तो अच्छा होगा, यह एक सर्वमान्य प्राकृतिक नियम है।

डॉ. सुषमा गजापुरे ‘सुदिव’