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नारी

सहसा आज फिर से मेरे रक्त में उबाल है।
प्रसन्न मन है सन्न, जैसे आ गया भूचाल है।।
कैसे नियति के हैं नियम, ये कैसा काल चक्र है?
षड्यंत्र है विरुद्ध मेरे, या कोई दृष्टि वक्र है?
तिमिर की बात क्या करें? दिवस में अंधकार है।
ये किससे प्रतिद्वंद है? ये किसका प्रतिकार है?
ठहर ठहर के चल रहा था, मन ये प्रेम चाह में।
नहीं था इसको ज्ञात कितने शूल होंगे राह में।
मन बावरा हो प्रेम में, चले तो ये रुकता नहीं।
स्वभाव शूल का था जो, कैसे भला चुभता नहीं?
आलता रुधिर का पग में, पथ पे चलती जा रही ।
ऐसी चाल देख के वसुंधरा लजा रही।
ये कोई देवी रूप है? या बावरी सी नार है?
ये किससे प्रतिद्वंद है? ये किससे प्रतिकार है?
आदि काल से जो अंतकाल का प्रमाण है।
ब्रह्मांड का प्रकृति रूप, सृष्टि का निर्माण है।
जन्म देनेवाली जननी, ममता की मिसाल है।
नारी ही है भवतारिणी, जिसका हृदय विशाल है।।
नमन तुझे हे नारी, तेरी नारीत्व महान है।
क्रांति में भी प्रेम कांति की अलग पहचान है।।
-नीतू पांडेय, मुंबई