निजीकरण क्यों?

आजकल बहुत चर्चा है कि सरकार कई सारे पीएसयू का विनिवेशीकरण कर रही है, सरकार का मानना है कि ये घाटे में चल रहे हैं और सरकार इसे चलाने में सक्षम नहीं है लेकिन मेरा सवाल है कि यदि सरकार सक्षम नहीं है तो प्राइवेट सेक्टर वैâसे सक्षम है, निजी क्षेत्र तो ठोंक बजाकर व्यावसायिक निर्णय लेता है, इसका मतलब यह उद्यम तो लाभ का है बस या तो सरकारी निर्णयन या प्रबंधन में चूक हो रही है। सरकार एयर इंडिया भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड, कंटेनर कॉरपोरेशन दी इंडिया लिमिटेड, शिपिंग कॉरपोरेशन दी इंडिया जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के विनिवेश के बारे में तेजी से सोच रही है। हालांकि सवाल फिर यही है कि सरकार फेल क्यों है? जवाब यह है कि सरकार ऐसे पीएसयू को चलाने के लिए जो व्यावसायिक चातुर्य चाहिए, उसे वह लोकसेवा आयोग में ढूंढ़ रहा है जबकि सरकार को लोकसेवा आयोग से ऊपर आकर एक प्रबंधन आयोग बनाना चाहिए, जिसमें देश-विदेश के उच्च प्रबंध संस्थानों के पेशेवर हों और इस तरह के पीएसयू को वही चलाएं न कि लोकसेवा आयोग के सदस्य। लोकसेवा आयोग के सदस्य लोकसेवा के लिए ठीक हैं। व्यावसायिक उद्देश्य के लिए इंडस्ट्री विशेषज्ञ लेना पड़ेगा और यह बुनियादी गलती शुरू से हो गई है, जिस कारण आज ये पीएसयूअंतिम सांस ले रहे हैं।
भारत के जो पीएसयू हैं वो सिर्फ एक यूनिट ही नहीं हैं, इनका एक रणनीतिक महत्व है, इनका विनिवेशीकरण का मैसेज बड़े पैमाने पर प्रभावित करेगा। सरकार एयर इंडिया को बेचना चाहती है लेकिन जब आप विदेश में होते हैं और आसमान में आपको एयर इंडिया का जहाज दिखता है तब हर भारतीय को गौरव बोध के साथ-साथ सुकून भी मिलता है कि अपना देश आ गया है। जब खाड़ी देश में कोई हिंदुस्थानी फंसा होता है तो हिंदुस्थान की यही सरकारी एयरलाइंस है, जो नफे-नुकसान का फायदा किए बिना उन्हे वहां से एयर लिफ्ट करने जाती है, यह सिर्फ एक जहाज नहीं है भारतीय राष्ट्रवाद का प्रतीक भी है। जरा आप कल्पना करिए की अगर कोई प्राइवेट एयर लाइन हो जाए तो क्या उसके अंदर राष्ट्रवाद का वह जज्बा आएगा कि वह नुकसान पर भी विदेशों में फंसे भारतीयों को निकालेगी? तब हमारे सिविल एविएशन मिनिस्टर उस प्राइवेट एयरलाइंस को क्या आदेश देंगे या निवेदन करेंगे? अगर उसने निवेदन अस्वीकार कर दिया तो!
सरकार को यह बात समझना चाहिए कि कोई प्राइवेट कंपनी आकर क्या कमाल कर देगी? किसी को इन पीएसयू में लाभ दिखेगा तो ही निवेश करेगी अन्यथा नहीं करेगी। हिंदुस्थान का हवाई व्यापार तेजी से बढ़ रहा है। यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सरकार दूरस्थ क्षेत्रों कि कनेक्टिविटी बढ़ाने पर जोर दे रही है। आजकल देश का मध्यवर्ग तेजी से ट्रेन की जगह हवाई यात्रा को प्राथमिकता दे रहा है और इन सारी संभावनाओं को प्राइवेट सेक्टर के प्लेयर अच्छे से सूंघ रहे हैं जबकि हर तरह से देश में यह माहौल बनाया जा रहा है कि एयर इंडिया फायदा में नहीं आ सकती है, जब तक कि इसका निजीकरण नहीं किया जाए लेकिन सवाल यही है कि निजीकरण से हवाई जहाज, संपत्तियां और संसाधन भी वही रहेंगे, हवाई भाड़े कर की गणना भी वही रहेगी तो बदलेगा क्या? इक्विटी गंवाने के बदले, प्रबंधन और कुछ पूंजी आएगी, जिससे कि लोन चुकता किया जा सकेगा। अब रही प्रबंधन कि बात तो इसे आप तो बिना इक्विटी गंवाए भी ला सकते हैं, जैसे आपने मेट्रो के लिए श्रीधरन और आधार अभियान के लिए नंदन निलेकनी को लाया गया था, एयर इंडिया समेत अन्य पीएसयू के लिए भी तो यह निर्णय लिया जा सकता है।
बेहतर होती परिचालन लाभ, कम होती र्इंधन की कीमतें, विमान की पर्याप्त उपलब्धता, बढ़ती केबिन जनशक्ति और अधिक आक्रामक विपणन कुछ और कारण हैं, जो एयरलाइन की वित्तीय सुधार कर रहे हैं, ऐसे में इस मौके को निजी क्षेत्र में क्यों न ले लिए जाएं, ऐसा निजी क्षेत्र कि रणनीति है, मेरा मानना यह है कि इस मौके को सरकार के पास ही क्यों न रहने दिए जाएं। हालांकि जब वैश्विक कच्चे तेल के दाम बढ़ने लगते हैं तो एयर इंडिया का ऑपरेटिंग प्रॉफिट भी काफी कम हो जाएगा। जब तक कि अन्य परिचालन मापदंडों में सुधार करने में बड़े पैमाने पर कदम नहीं उठाते लेकिन यह परिस्थिति तो पूरे एयर लाइन उद्योग की रहेगी तो सिर्फ एयर इंडिया के नुकसान की ही चर्चा क्यों?
हिंदुस्थान दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ते उड्डयन बाजारों में से एक है और यातायात के मामले में एयरलाइनों के लिए बहुत अधिक विकास क्षमता है। यह पकड़ तेजी से प्रतिस्पर्धी माहौल में मुनाफे के संचालन में निहित है, जहां नियंत्रण की लागत प्रमुख है। सरकारी टॉप प्रबंधन को विमानन सेवा से बाहर निकलने की जरूरत है, प्रबंध पेशेवरों को एयरलाइन का प्रबंधन करने की इजाजत देनी चाहिए।
विमानन क्षेत्र का ग्राफ देखेंगे तो आप पाएंगे कि यह लगातार बढ़ रहा है, ऐसे में निजी क्षेत्रों की निगाहें इन्हीं संकेतों के कारण एयर लाइन पर हैं, उन्हे बैठे बिठाए एक चलता हुआ हिंदुस्थान का बड़ा स्टार अलायंसवाला एयर लाइन मिल जाएगा और वह कोई जादू नहीं करेंगे या इसका रातों-रात मेक ओवर नहीं करेंगे, वह इसका या तो चेंज मैनेजमेंट करेंगे और ऋण और ऋण के ब्याज पर काम करेंगे जबकि यह काम सरकार अपने स्तर पर भी कर सकती है। वह टॉप मैनेजमेंट पर बाहर से योग्य पेशेवरों को बैठाए और ऋण का पुनर्गठन कर दे और कुछ गेस्टेशन पीरियड दे दे।
ठीक यही सवाल अन्य पीएसयू के लिए है, जब दुनिया चारों तरफ सप्लाई चेन प्रबंधन की बात कर रही है, विश्व व्यापार में सप्लाई चेन एक बड़ा भविष्य है तो ऐसे में शिपिंग कॉरपोरेशन इंडिया लिमिटेड समत अन्य रणनीतिक महत्व की कंपनियों को बेचना समझदारी नहीं कही जाएगी। सरकार को पैसा इकट्ठा करना है तो अन्य स्रोत से कर ले। अगर सरकार को इसमें सुधार करना ही है तो वह नेहरू जी के द्वारा जो इसके प्रबंधन के लिए लोकसेवा आयोग से आईएएस को लेने की प्रक्रिया है सिर्फ उसे बदल दे तो ऐसे सरकारी व्यावसायिक उद्यम की किस्मत बदल सकती है। एक आईएएस लोक प्रशासन बेहतर चला सकता है, उसकी एक विशेषज्ञता होती है, उसमें एक व्यवसाय नहीं चला सकता है, उसका अनुभव यहां काम नहीं आएगा। मेरा मानना है कि सरकार बस यही एक निर्णय मान ले तो पीएसयू के दिन बहुर आएंगे।