निर्णय नहीं समाधान हुआ

राजनीतिक प्रयासों से सभी मसले नहीं सुलझ सकते, इसका अंदाजा फिलहाल देशवासियों को अब हो चुका है। हां, इतना जरूर है कि उन मसलों की आड़ में सियासी दल राजनैतिक फायदा जरूर उठा जाते हैं। दशकों से राम मंदिर मुद्दे पर यही होता आया। पीढ़ियां गुजर गर्इं, उम्मीदें धूमिल हो गर्इं, वायदें चकनाचूर होते गए, दो धर्म आपस में लड़ते रहे। लेकिन इन सबके बीच सियासी दलों ने जमकर राजनीतिक रोटियां सेंकी। वैसे कायदे से देखा जाए तो अवाम को खुश रखना, उनकी खैरियत-सलामती का पहला जिम्मा हुकूमतों पर होता है, पर कई बार हुकूमतें उन जिम्मेदारियों को निभाने में विफल हो जाती हैं। कमोबेश, राममंदिर का मसला भी कुछ ऐसा ही रहा, जिसे सुलझाने में सियासी दलों के हाथ-पांव फूल गए। आजादी के बाद से अब तक मंदिर मसले की आड़ में राजनीति होती आई, र्पािटयों के लिए मंदिर निर्माण वोट बैंक का जरिया बना। मंदिर के नाम पर कई सरकारें बनीं, र्पािटयों का जन्म हुआ, कई नेता स्थापित हुए। लेकिन मसला जस का तस बना रहा।
गौरतलब है कि निचली अदालतों में १३५ साल जिरह होने के बाद जब केस दिल्ली स्थित सर्वोच्च अदालत पहुंचा, जहां प्रतिदिन तीन महीने तक सुनवाई हुई। आखिर में ९ तारीख मुकर्रर हुई, जिसने दशकों पुराने रार को खत्म किया। मंदिर कब बनेगा इस बात का सपना देखते-देखते कई पीढ़ियां गुजर गर्इं? लेकिन मंदिर का मसला नहीं सुलझा। भारतीय जनता पार्टी का जन्म मंदिर के नाम पर हुआ। प्रत्येक चुनावों में उन्होंने अपने घोषण पत्रों में जनता से मंदिर बनाने का वादा किया लेकिन नहीं बनवा सकी। सूबे के प्रमुख सियासी दल सपा-बसपा ने भी राजनीति की लेकिन उनसे भाजपा ने मंदिर का मुद्दा छीना। मंदिर को भाजपा ने अपना मुद्दा बनाया। जनता ने भी उनका भरपूर साथ दिया लेकिन किसी नतीजे पर पार्टी नहीं पहुंच सकी।
एक सवाल मन में उठता है कि मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के सुनाए गए निर्णय को निर्णय किसी भी सूरत में नहीं कह सकते। उन्होंने निर्णय नहीं बल्कि मसले का समाधान किया है। गौरतलब है कि बात अगर १९४७ से लेकर २०१९ तक की जाए तो समाज की सोच में बड़ा परिवर्तन आ चुका है। अब कोई बेवजह के मसलों में उलझना नहीं चाहता। िंहदुस्थानी लोग इस बात को ठीक से समझ चुके हैं कि देश की सियासत ने उन्हें लंबे समय तक मंदिर के नाम पर बांटकर रखा। सुप्रीम कोर्ट से निकले इस समाधान के बाद शांति-सौहार्द की एक अच्छी तस्वीर देखने को मिली। पूरी दुनिया की नजरें शनिवार को सुप्रीम कोर्ट पर थीं। कहते हैं किसी भी देश की नींव संविधान, लोकतंत्र और भाईचारे पर टिकी होती है। पैâसले के दिन इन तीनों की परीक्षा होनी थी लेकिन जब पैâसला सुनाया गया तब िंहदुस्थान की अटूट एकता और अखंडता जरा भी नहीं हिली। सभी पक्षों ने अक्षुण्णता को बनाए रखने में अपनी बड़ी भूमिका निभाई।
सियासत ने भले ही देश को बांटने की कोशिशें की हों, पर यह वही अखंड भारत है, जिसके बगीचों में आज भी एक साथ खुशबूदार सुगंधित रंगों के फूल खिलते और फूलते हैं। सोच के विपरीत पैâसले पर भी मुस्लिम पक्षकारों ने स्वागत किया। मुस्लिम वर्ग ने खुशी में िंहदुओं को मिठाइयां खिलार्इं। इस तरह की तस्वीरें समूचे हिंदुस्थान से देखने को मिलीं। उच्च अदालत के पैâसले के बाद पूरे देश में जो आपसी एकता देखने को मिलीं, वह शायद आजादी के बाद कभी देखने को नहीं मिली हो। मंदिर जैसे नासूर मसले का अंत हो जाने के बाद िंहदुस्थान की आपसी एकता एक बार फिर अपने मूल सनातनी रसूलों की तरफ लौटती दिखाई देने लगी है।
वोटबैंक की राजनीति कहें या स्वार्थ की सियासत, मंदिर के नाम पर दो धर्मों की एकता को हमेशा कुत्सित करने के प्रयास किए गए। गंदी सियासत का ही नतीजा रहा जिसे न समझने की भूल वामपंथी, कांग्रेसी और मुसलमान करते आए। उच्च अदालत ने १३५ वर्ष की लड़ाई में उलझा अयोध्या राम जन्मभूमि पर मालिकाना हक के केस को फिलहाल समाप्त कर दिया है। पांच एकड़ जमीन मुस्लिम पक्षों को देने की बात कही गई है। अब जिम्मेदारी केंद्र सरकार की बनती है कि उसे दोनों पक्षों का ख्याल रखकर आगे बढ़े। मंदिर का निर्माण भी हो और उचित स्थान पर मस्जिद भी बनाई जाए। र्धािमक, राजनैतिक और सामाजिक रूप से संवेदनशील हो चुके मुकदमे में लगातार चालीस दिनों की मैराथन सुनवाई में प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, जस्टिस एसए बोबडे, डीवाई चंद्रचूड़, एस अब्दुल नजीर और अशोक भूषण ने पंचपरमेश्वर के रूप में जो निष्पक्ष तरीके से समाधान निकाला है, उस पर मात्र ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिममीन के अध्यक्ष असबुद्दीन ओवैसी जैसे एकाध लोगों के अलावा किसी को कोई एजरात नहीं हुआ।
दरअसल ओवैसी टाइप के लोग अब भी देश को धर्म के नाम पर गुमराह करना चाहते हैं लेकिन उनकी दाल अब गलनेवाली नहीं? अगर ऐसे लोग अड़ंगा नहीं अड़ाए होते तो मंदिर निर्माण को तपस्या के रूप में लेनेवाले योद्धा बालासाहेब ठाकरे, लालकृष्ण आडवाणी और मुरलीमनोहर जोशी के प्रयास कबके सफल हो गए होते। मंदिर बनाने की अलख जगानेवाले इन लोगों के प्रयासों पर आधुनिक युग के नेताओं ने पानी फेरने का काम किया। इसलिए मंदिर बनाने का जो रास्ता सुप्रीम कोर्ट ने अपने स्तर से साफ किया है, उसका श्रेय किसी राजनीति पार्टी को नहीं दिया जाना चाहिए। भाजपा की पूरी राजनीति मंदिर के इर्द-गिर्द घूमती रही। उनकी तरफ से मंदिर निर्माण का हर चुनाव में वायदा किया गया लेकिन नतीजा शून्य ही रहा। आखिरकार समाधान सुप्रीम कोर्ट ने ही निकाला। बाकी देश के लोग काफी समझदार हैं ही?