" /> निर्भया को न्याय, दोषी सूली पर लटके

निर्भया को न्याय, दोषी सूली पर लटके

-साढ़े पांच बजे चारों को हुई फांसी
-फांसी के तख्त पर गिड़गिड़ाए दोषी  

 

पैरामेडिकल छात्रा ज्योति सिंह उर्फ निर्भया रेप-हत्याकांड के चारों दोषियों और न्यायतंत्र के बीच चली लंबी नूराकुश्ती का पटाक्षेप बीस मार्च को तड़के साढे पांच हो गया। देश-दुनिया को झकझोर देने वाले जघन्य केस के चारों दोषियों को सुबह सूली पर लटकाया गया। सूली पर चढ़ाना जेल अधिकारियों के तो आसान था, पर चढ़ना दोषियों के लिए बड़ा मुस्किल हुआ? फांसी के तख्त को देखकर ही चारों पछाड़ मारकर रोने-बिलखने लगेे। अधिकारियों के पैरों में लिपट गए। दोषियों के मुंह से सिर्फ दो ही शब्द निकल रहे थे। ‘बचा लो-बचा लो, छोड़ दो-छोड़ दो‘! आखिरकार जेलर ने तय वक्त पर फांसी पर लटकाने का आदेश इशारों में जल्लाद पवन को दे दिया। देखते ही देखते चारों फांसी पर झूल गए और क्षण भर बाद ही दोषियांे की सांसों ने शरीर का साथ छोड़ दिया। दस मिनट में शरीर मृत्य अवस्था में निठाल होकर रस्सी पर लटक गए। फांसी के नियमानुसार आधे घंटे बाद शरीर को नीेचे उतारा गया। चिकित्सकों ने मृत्य घोषित किया। उसके बाद चारों शवों को दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल में पोस्टमार्टम के लिए ले जाया गया। दोषियों के परिजन रात से ही तिहाड़ जेल के बाहर डेरा डाले हुए थे। जीवन की अंतिम सुबह दोषियों की बड़ी डरावनी रही। चारों में कोई नहीं चाह रहा था कि अगली सुबह हो। लेकिन देश उस सुबह का बेसब्री से इंतजार कर रहा था। पूरा तिहाड़ जेल सन्नाटे में था। फांसी की रात चारों दोषियों में से कोई भी सोया नहीं था। खड़ी की सुई जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी, फांसी का समय नजदीक आ रहा था। दोषियों के होश उड़े हुए थे। उस रात खाना क्या, पानी तक नहीं पिया। सुबह चार बजे से ही फांसी की प्रक्रियाएं शुरू हुईं। ठीक साढ़े चार बजे दोषियों को नहाने को कहा गया। चाय-नास्ता मंगाया गया, लेकिन किसी ने कुछ नहीं खाया। उसके बाद सभी को सफेद कुर्ता-पजामा पहनने को दिया गया। बैरक से बाहर आने पर चारों के हाथ पीछे से बांधे गए। फांसी के तख्त पर जाने के लिए कहा गया, पर उनके पैर आगे नहीं बढ़ रहे थे। भंयकर डरे हुए थे। फंासीघर तक उन्हें पुलिसकर्मियों के सहयोग से ले जाया गया। फांसी के तख्त पर चढ़ने से पहले ही लेट गए। मौत का नजारा खुली आंखों से देख न पाए, इसलिए सूली पर चढ़ाने से पहले ही उनके चेहरों को काले कपड़े से ढका गया। फिर जबरदस्ती उनको फांसी के तख्त पर सीधा खड़ा किया गया, लेकिन खड़े नहीं हो रहे थे। तभी उनके गले में रस्सियां डाली गईं, चारों के पैर बांधे। उसके बाद जेल सुपरिटेंडेंट ने पवन जल्लाद की तरफ देखा और लीवर खींचने का इशारा कर दिया। जल्लाद ने लीवर खींचकर चारों को फंासी पर लटका दिया।

दो जल्लादों की थी जरूरत

कोर्ट द्वारा सभी दोषियों को एक साथ फांसी पर लटकाने का आदेश हुआ। तिहाड़ जेल नंबर-3 में बने फंासीघर में दो तख्त बनाए गए और दोनो के हैंगर व लीवर अलग-अलग दिशा में थे। दोनों को एक साथ खींचने के लिए दो जल्लाद चाहिए थे। लेकिन जल्लाद एक ही था। फांसी तय समय पर देनी थी। इसलिए एक जल्लाद का काम जेलकर्मी ने किया। एक लीवर को जल्लाद पवन ने खींचा और दूसरे का लीवर जेलकर्मी ने। चारों को फांसी पर लटकाने के लिए 60 हजार रुपये का मेहनताना तय हुआ था। जो दोनों में बंटना था। पर, जेलकर्मी ने लेने से मना कर दिया उसके बाद उसके हिस्से का भी पैसा पवन को मिला।