निश्चयानुसार होगा!

शिवसेना की ५३वीं वर्षगांठ धूमधाम से संपन्न हुई। शिवसैनिक हर कार्य दिल खोलकर करते हैं। इसलिए ५३वें वर्षगांठ के दिन मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित मुख्यमंत्री फडणवीस का उसी जोश के साथ स्वागत किया गया। षण्मुखानंद सभागृह अंदर और बाहर पूरी तरह से भरा था। यह बंधी हुई ऊर्जा होती है। मुख्यमंत्री सहज ही बोल उठे, ‘शिवसैनिकों से ऊर्जा लेने के लिए मैं यहां आया हूं।’ लेकिन सामने की ऊर्जा देखकर वे स्वयं उस जल्लोष का एक हिस्सा बन गए। शिवसेना के ‘शुद्ध’ मंच पर मुख्यमंत्री को देखकर कई लोगों की भृकुटियां तन गई होंगी। शायद उनकी आंखें भी बाहर निकल आई होंगी। साफ-साफ कहें तो शिवसेना-भाजपा युति के विरोधियों को पानी में डाले हुए देवता को बाहर निकालना ही ठीक रहेगा! एक तो यह युति टूटेगी नहीं, मतभेदों के बावजूद फूटेगी नहीं। महाराष्ट्र का भविष्य और भाग्य की गांठ युति के साथ बंध चुकी है। शिवसेना के मंच पर मुख्यमंत्री कैसे? इस पर जिन लोगों को जहां खुजलाहट हो वे खुजला लें। सिर न होने की वजह से सिर खुजलाने का सवाल ही नहीं उठता। अतिथि को बुलाकर उनके विचार सुनने की परंपरा शिवसेना की है। ऐसा नहीं होता तो शिवसेना के कट्टर विरोधी कामरेड श्रीपाद अमृत डांगे को पहले राष्ट्रीय अधिवेशन में विशेष अतिथि के रूप में बुलाया ही नहीं गया होता। समय-समय पर ऐसे कई लोग शिवसेना के मंच पर आए ही हैं। जॉर्ज फर्नांडिस और शरद पवार ने भी शिवतीर्थ पर हाजिरी लगाई है। शिवसेनाप्रमुख हों या आज हम हों, शिवसैनिकों का मार्गदर्शन करते रहते हैं लेकिन कई बार नए मेहमान नए विचार लेकर आते हैं। ये विचार नई दिशा दिखाते हैं। जैसा कि मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कहा, ‘मैं भगवा का शिलेदार हूं।’ मुख्यमंत्री ने बेबाकी से कहा, ‘हमारे बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर कोई विवाद नहीं। सबकुछ निश्चयानुसार होगा।’ मुख्यमंत्री के ये उद्गार अति महत्वपूर्ण हैं। युति में मुख्यमंत्री पद का क्या? इस बारे में जुगाली करनेवाली मीडिया को मुख्यमंत्री ने उत्तर दिया है जो निश्चय हुआ है वही होगा। यह युति के समन्वय का मंत्र है। युति कहने पर सबकुछ समान होगा, ऐसा हमारे द्वारा कहते ही मुख्यमंत्री ने इस बात पर दिल खोलकर दाद दी। थोड़े में कहा जाए तो मुख्यमंत्री शिवसेना के मंच पर आए और रहे-सहे मतभेदों को दूर किया। वे शिवसेना के अतिथि नहीं बल्कि हममें से ही एक थे। भविष्य में विधानसभा में युति को दिल्ली की तरह ही प्रचंड बहुमत मिले, इसके लिए एक होकर काम करना चाहिए। युति की वङ्कामूठ अभेद्य है। महाराष्ट्र की समस्याओं को दूर करने के लिए यह आवश्यक है। फडणवीस ने कहा, ‘उन्हें सत्ता कुर्सी और पद के लिए नहीं चाहिए।’ हम भी यही कह रहे हैं। राज्य में अकाल है, पानी की कमी है, किसानों की समस्याएं हैं और ११वीं के विद्यार्थियों के प्रवेश की चिंता बढ़ रही है। इन समस्याओं को दूर करने के लिए सत्ता चाहिए। विरोधियों की फालतू टीका-टिप्पणी की परवाह न करते हुए काम पर ध्यान देना चाहिए। दिल्ली में मोदी भी वही कर रहे हैं। विरोधियों का सयानापन गायब हो गया। लोकसभा चुनाव में युति की जीत के बाद वे बिखर गए हैं। मंत्रिमंडल विस्तार में विखे-पाटिल और जयदत्त क्षीरसागर को पद दिया गया। उन्होंने पहले की पार्टी के विधायक पद से इस्तीफा दिया और बाद में वे ‘युति’ के घर में आए। ये दोनों मंत्री फिलहाल किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं। इसलिए उनका मंत्री पद संविधान विरोधी होने की चिल्ल-पों मची है। इन आधे-अधूरों को समझ लेना चाहिए कि विधायक न रहते हुए भी कांग्रेस-राष्ट्रवादी के कई भगोड़ों ने मंत्री के रूप में शपथ ली है और छह महीने बाद वे विधिमंडल में चुनकर आए हैं। लेकिन पिछवाड़े पर जनता की लात पड़ने के बावजूद ये लोग अपनी पुरानी हरकत छोड़ने को तैयार नहीं। भारतीय जनता पार्टी को ऐसे लोगों के पीछे नहीं लगना चाहिए। संसद में बहुमत है और शिवसेना साथ है तो फिर दूसरों की मान-मनौव्वल क्यों करनी चाहिए? कहा जा रहा है कि आंध्र के जगन पार्टी को लोकसभा उपाध्यक्ष पद की ‘ऑफर’ दी गई थी लेकिन जगन ने भाजपा के समक्ष कुछ शर्तें रखीं। कहा गया कि नियम व शर्तों को पूरा करने के बाद ही वे लोकसभा का उपाध्यक्ष पद स्वीकार करेंगे। जगन के पीछे पड़ने की इतनी क्या जरूरत? एनडीए में से ही किसी एकाध ओम बिरला को उपाध्यक्ष पद के लिए ढूंढ़ा जाना चाहिए और भी अन्य मुद्दे हैं, उन्हें बाद में देखेंगे। मुख्यमंत्री ने कहा ही है, ‘सबकुछ निश्चयानुसार होगा!’