नेट का चक्कर

हमारे पड़ोसी गोबर दास शाम के समय लड़खड़ाते हुए अपने घर की ओर बढ़े चले जा रहे थे और हमेशा की तरह परंपरागत ढंग से अपने स्कूटर को घसीट रहे थे। यह स्कूटर उन्हें अपने विवाह में प्राप्त हुआ है और पिछले ३५ वर्षों से सेवारत है, लेकिन इनकी जितनी सेवाएं स्कूटर ने नहीं की है, उससे कई गुना सेवा यह स्वूâटर की कर चुके हैं। हमने कहा बेटा गोबर दास क्या हुआ? वह बोले, मैं टेक्नोलॉजी का मारा हूं। हमने कहा, तुम तो टेक्नोलॉजी के बहुत बड़े भक्त हो और आभासी दुनिया के शहंशाह बनते हो तो अचानक तुम्हें इससे क्या परेशानी हो गई? गोबर दास मुंह बिसूरते हुए बोले, आज मैंने अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए जीपीएस सिस्टम ऑन कर लिया और उसी ने मुझे धोखा दे दिया। जिस रास्ते पर मैं पिछले पंद्रह वर्षों से आता-जाता हूं और जहां का एक-एक पत्थर मेरा परिचित है, वहीं आज मैं भटक गया। सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मैंने कहा, ऐसे जाने-पहचाने रास्ते पर कैसे भटक गए और वहां जीपीएस का उपयोग करने की जरूरत क्या थी? गोबर दास बोले, भाई साहब आज मुझे ऐसा शौक चढ़ा कि मैं जीपीएस के निर्देश द्वारा अपने स्थान पर पहुंचूं लेकिन जीपीएस ने ऐसी-ऐसी कलाबाजियां खिलवाई कि आपसे क्या कहूं! जहां से मैं रोज दाहिने घूमता था वहां से जीपीएस ने मुझे बायें घुमा दिया और जहां से सीधे जाता था वहां से यूटर्न मारकर उल्टा जाने को कहा, इस तरह बीस मिनट का रास्ता मैंने दो घंटे में पार किया। इसी भागदौड़ के कारण मेरे स्वूâटर का पेट्रोल भी खत्म हो गया। अब मैं कई घंटों से स्कूटर घसीटते हुए अपने घर की दिशा में बढ़ रहा हूं।
हम समझ गए कि गोबर की ग्रह दशा इस समय खराब चल रही है और ये जहां भी हाथ डालते हैं, वहीं बवाल हो जाता है। हमने कहा जब नाचना नहीं आता तो आंगन को टेढ़ा क्यों बताते हो? जवाब में हमें लाल आंखों से घूरते हुए गोबर अपने घर में घुस गए।