न बिजली- न पानी! भाइंदर के गांव की कहानी

देश को आजाद हुए ७१ वर्ष हो गए। मगर आज भी कई ऐसे गांव है जो मुलभुत सुविधाओं से वंचित है। इस गांव में आज तक बिजली भी नहीं पहुंची है। ऐसा ही एक गांव मेट्रो सिटी मुंबई और मीरा-भाइंदर शहर के बीच बसा हुआ जामझाड़पाड़ा गांव है। यह गांव बोरीवली विधानसभा क्षेत्र के अधीन आता है लेकिन जमीनी रूप से यह भाइंदर पश्चिम से जुड़ा हुआ है।
जामझाड़पाडा भाइंदर गोराई रोड पर पड़ता है। जहां जाने के लिए केशव श्रुष्टि के किशन गोपाल राजपुरिया वान प्रस्थाश्रम के पास से जाना पड़ता है। वान प्रस्थाश्रम के पास से सर्पाकार पहाड़ियों से होते हुए करीब २ किलोमीटर का सफर तय कर जामझाड़पाड़ा पहुंचा जा सकता है।
इस गांव की मंदा नामक महिला ने बताया की इस गांव के बच्चों को पढ़ाई के लिए गोराई में म्युनिसिपल स्कूल में जाना पड़ता है। जो की गांव से कई किलोमीटर दूर है। ५० घरों की बस्तीवाले इस गांव में सातवी से आगे कोई नहीं पढ़ पाया। इस गांव की एक मात्र लड़की ने १०वीं तक की पढ़ाई किसी तरह पूरी की है। इस गांव में अभी तक न विद्यालय है, न ही अस्पताल। यदि कोई बीमार हो जाए तो मरीज को डोली में उठाकर भाइंदर या उत्तन ले जाना पड़ता है। ऐसे तो यह गांव मीरा-भाइंदर महानगरपालिका से सटा हुआ है लेकिन मुंबई महानगरपालिका की सीमा में आता है। इस गांव के लोगों का मुख्य रोजगार खाड़ी से मछली पकड़ना है। इस गांव में एक बोरिंग है जिसके माध्यम से लोग प्यास बुझाते है। हाल ही में किशन गोपाल राजपुरिया आश्रम से इस गाव तक एक  छोटी सड़क का निर्माण हुआ है। इस गाव में बिजली के कनेक्शन भी नहीं है। कहीं कहीं सोलर बिजली के खंबे लगे हुए हैं। गांव में किसी के घर टीवी नहीं है। इस गाँव की महिलाएं आज भी जंगलो से सुखी लकड़ी जमा कर मिटटी के चूल्हे पर खाना बनाती हैं। इस गांव के सभी लोगों के पास आधार कार्ड ,मतदाता पहचान पत्र आदि सभी सरकारी कागजात हैं लेकिन आजतक सरकार की किसी भी सुविधाओं का लाभ इन्हें नही मिला है। देश के आजाद होने के इतने वर्ष बाद भी इस गांव के लोग मुलभुत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। जिससे मुंबई जैसे चकाचौन्ध शहर का एक गांव आज भी अंधकार में डूबा हुआ है और मेट्रो शहर में खुद को बेगाना महसूस कर रहा है।