पटाखों से ज्यादा ‘पों पों’ का प्रदूषण

दिवाली महज कुछ ही सप्ताह में आनेवाली है। ऐसे में सरकार वायु और ध्वनि प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए ईको प्रâेंडली पटाखों पर जोर दे रही है लेकिन क्या आप जानते हैं कि सरकार जिन पटाखों पर प्रतिबंध लगाकर ईको प्रâेंडली पटाखों पर जोर दे रही है, उससे ज्यादा सरकार को वाहनों के ‘पों पों’ बजनेवाले हॉर्न की तीव्रता को कम करने के लिए गंभीरता से सोचने की जरूरत है। दरअसल पर्यावरण को पटाखों से ज्यादा वाहनों के ‘पों पों’ से नुकसान हो रहा है। ये खुलासा एक अध्ययन में हुआ है। अध्ययन से पता चला है कि पटाखों से ९० डेसिबल तक ध्वनि प्रदूषण होता है जबकि वाहनों के पों-पों से उठनेवाले ध्वनि प्रदूषण की तीव्रता १०० डेसिबल के पार होती है। ये अध्ययन इंद्रप्रस्था इंस्टीट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (आईआईआईटी) द्वारा इसी साल फरवरी और मार्च महीने में करीब ३० दिन तक किया गया था।

दिवाली करीब आ रही है और पटाखों की आवाज को लेकर एक बार फिर पर्यावरणविद सक्रिय हो गए हैं। मगर क्या आप जानते हैं कि पटाखों से ज्यादा पर्यावरण को नुकसान वाहनों के बजनेवाले हॉर्न पहुंचाते हैं। एक अध्ययन में पाया गया है कि सबसे ज्यादा ध्वनि प्रदूषण बाइक की पों-पों से होता है। यानी बाइक, कार से ज्यादा कानफोड़ू है।

लंबे समय तक बाइक की आवाज से पर्यावरण में ध्वनि प्रदूषण की मौजूदगी अधिक समय तक रहती है। अध्ययन में एक जानकारी ये भी सामने आई कि मेट्रो लाइन या स्टेशन से सटी सड़कों के आस-पास ध्वनि प्रदूषण का असर काफी समय तक रहता है क्योंकि आस-पास कांक्रीट होने के कारण आवाज काफी समय तक रिफ्लेक्ट होती है। आईआईआईटी के सहायक प्रोफेसर परवेश बियानी ने ये अध्ययन ध्वनि मापक यंत्र से लगातार ६० घंटे तक कई दिन किए थे। बियानी का कहना है कि अध्ययन के दौरान हमने देखा कि ध्वनि प्रदूषण का स्तर १०० डेसिबल के पार जा रहा है। उन्होंने बताया कि बाइक वाहन ध्वनि प्रदूषण के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं क्योंकि इनसे निकलनेवाली आवाज चारपहिया वाहनों के हॉर्न से निकलनेवाली ध्वनि के मुकाबले कहीं ज्यादा है।