पत्थर, पटाखों और ना-पाक परस्ती पर चिंतन जरूरी है!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संयुक्त राष्ट्र को संबोधित करके लौट आए। ‘हाउ-डी’ में हिंदुस्थानियों का अभिवादन किया तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का हाथ थामकर दुनिया को ‘मजबूत संदेश’ भी दे दिया। पर्यावरण पर चिंता, नव-भारत पर प्रगति, देश-दुनिया पर ‘क्रांतिकारी’ दृष्टिकोण, संकल्प व योजनाएं विश्व मंच से साझा कीं तो यूएन की साइड लाइन पर कई राष्ट्रप्रमुखों से महत्वपूर्ण मुलाकातें भी कीं, कई अहम समझौते भी हुए। कुल मिलाकर राष्ट्रहित में वे जो कुछ कर सकते थे, जितना माहौल बना सकते थे, उन्होंने वह सब कुछ करने में अपना शत-प्रतिशत लगा दिया और इसमें वे सफल भी रहे। विश्व ने उनके मंतव्य व हिंदुस्थान के महत्व को सराहा, उसका समर्थन भी किया। लेकिन जब प्रधानमंत्री स्वदेश लौटे तो पार्श्वभूमि में उपजे कुछ अहम सवाल भी उनके साथ हिंदुस्थान चले आए। जिन पर आज चिंतन-मनन बेहद जरूरी है।
हिंदुस्थान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री संयुक्त राष्ट्र के साप्ताहिक ‘संग्राम’ के बाद अब अपने-अपने देश में हैं। प्रधानमंत्री मोदी जब अमेरिका से लौटे थे तब उनका नई दिल्ली में ढोल-नगाड़ों और पटाखों के साथ जोरदार स्वागत हुआ था। उधर, वजीर-ए-आजम इमरान खान का भी उनकी पार्टी ने कुछ ऐसा ही स्वागत पाकिस्तान में किया था। दोनों ओर से जीत के दावे थे, लिहाजा यह परिदृश्य नजर आना स्वाभाविक ही था। इसलिए चिंता इस बात की थी ही नहीं कि इस्लामाबाद में भी बाजी जीतने के दावे हो रहे हैं, पिंडी और लाहौर में भी जीत के पटाखे फूट रहे हैं। इसमें चिंता बढ़ाने वाला कुछ है तो वो हमारे कश्मीर में है। बीच राजधानी श्रीनगर में ‘गद्दारों’ का गदगद होना है, इमरान के समर्थन में पटाखे फोड़ना है। निश्चित तौर पर यही ज्यादा चिंतित करनेवाला है। कल तक जो अलगाववादी हाथ घाटी में खून की पत्थरबाजी करते थे, वे आज आतंकिस्तान के लिए जश्न की आतिशबाजी कर रहे हैं, कश्मीर के लिए ताजा चिंता की बात यही है। चिंता का विषय ना-पाक परस्ती का एक नया गठजोड़ भी है। संयुक्त राष्ट्र में तुर्की और मलेशिया ‘पाकिस्तान प्रेमालाप’ का ‘संयुक्त’ पाठ पढ़ने की होड़ में नजर आए थे। उनकी हिंदुस्थान विरोधी मिली-जुली तीखी प्रतिस्पर्धा ही चिंतित करनेवाली है। उनके राष्ट्राध्यक्षों का कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र के भीतर व बाहर लिया गया स्टैंड ही चिंताजनक है। उनके द्वारा कश्मीर पर पाकिस्तान का खुलकर पक्ष लेना ही गंभीर चिंता का विषय था और आज भी है। बात संयुक्त राष्ट्र में ही खत्म हो जाती तब भी ठीक होता पर तुर्की के प्रधानमंत्री ने तो अमेरिका से लौटकर अभी अपने देश में ठीक से कदम तक नहीं जमा पाया कि पाकिस्तान परस्ती का दूसरा पराक्रम कर डाला। उन्होंने स्वदेश लौटते ही पाकिस्तान को चार अत्याधुनिक युद्धपोत देने की परियोजना पर काम शुरू कर दिया, चिंता का मामला यह है। चीनी विमानवाहक पोत हासिल करने के करीब पहुंच चुके नापाकियों को मिल रही यह दूसरी घातक सौगात ही हमारे लिए नई चिंता है। हमारी चिंता उस पिद्दी से मलेशिया ने भी बढ़ाई है जो जाकिर नाईक का जहर पोसते-पोसते इस कदर विषैला हो गया है कि अब हिंदुस्थान विरोध की कश्मीरी फुफकार मारने लगा है। वो देश जो हमारे द्वारा खरीदे गए पाम ऑयल पर जीता है, हमसे सालाना ६ से ७ बिलियन डॉलर का मुनाफा पाता है, वो हमें आंखें तररने लगा है, यह चिंता की बात है। जिस देश की इकॉनोमी को हम पर्यटन से विस्तृत आधार देते हैं, वो ही हिंदुस्थान से हिमाकत पर उतर आया है, यह चिंतन का विषय है।
असल में हिंदुस्थान की चिंता अब केवल चीन तक सीमित नहीं रही, बल्कि अब वो चीन और पाकिस्तान की सीमाएं पार करके काफी आगे बढ़ चुकी है। आज तुर्की-मलेशिया के अलावा ब्रिटेन भी हमारे लिए गहरी चिंता का सबब है। इन दिनों ब्रिटेन की विपक्षी पार्टी को कश्मीर कायाकल्प पर लेबर-पेन उठ रहा है। वहां की लेबर पार्टी हिंदुस्थान विरोध में कराह रही है, वहां हिंदुस्थान विरोधी रिजोल्यूशन पास हो रहे हैं और शिद्दत से हिंदुस्थान विरोध को सार्वजनिक मंच दिया जा रहा है। यह वही देश है जो हमेशा से पाकिस्तान के गलत मंसूबों को बढ़ावा देता रहा है, उसे हिंदुस्थान के खिलाफ गतिविधियों के लिए प्रोत्साहन देता है। अनुच्छेद ३७० निष्प्रभावी होने के बाद भी लंदन में इसी वजह से सबसे ज्यादा पाकिस्तान प्रायोजित हिंदुस्थान विरोध को जगह मिली थी। तब हिंदुस्थानियों से हाथापाई और भारतीय दूतावास पर पत्थरबाजी तक हुई थी। तब लंदन पुलिस जानबूझकर काफी समय तक आंखें मूंदे रही। जबकि ह्यूस्टन में ‘हाउडी मोदी’ इवेंट से पहले ही अमेरिकी पुलिस ने ना-पाकियों की नकेल कस दी, उन्हें जरा-सी भी बदमाशी नहीं करने दी। इससे साफ है कि यदि सरकारें चाह लें तो दुनिया में कहीं भी, कभी भी ना-पाक हरकतें नहीं हो सकतीं। दरअसल, इंग्लैंड में हिंदुस्थान विरोधी प्रदर्शनों को अमूमन सियासी ‘सहमति’ मिल ही जाती है। चाहे फिर वो प्रदर्शन खालिस्तान से जुड़े हों या कश्मीर से। परंतु वहां बलोच या उइगर मुसलमानों को ऐसे प्रदर्शनों की स्पेस नहीं मिल पाती। तिब्बती प्रदर्शनकारियों को तो यह कतई नहीं मिलती। वहां फोकस हिंदुस्थान विरोध पर ही होता है। ब्रिटेन की स्वार्थी सियासत की ही तरह उनके अनुदानित बीबीसी जैसे चैनल भी हमेशा हिंदुस्थान को लेकर फर्जी रिपोर्टिंग करते हैं, भ्रम पैâलाते हैं। वे एक एजेंडे के तहत निरंतर पाकिस्तान के नरेटिव का समर्थन करते रहते हैं। बीबीसी के अलावा अब तक यमन नियंत्रित अलजरीरा के पेट में हीr हिंदुस्थानी विरोध की मरोड़ उठती थी, लाख चेतावनियों के बावजूद कश्मीर पर बाकायदा भड़काऊ व जहरीली रिपोर्टिंग की जाती थी, पर अब इस ‘बकवास ब्रॉडकास्ट कार्पोरेशन’ की टीम में पाकिस्तान-तुर्की और मलेशिया फंडेड एक और शुद्ध अंतर्राष्ट्रीय इस्लामी चैनल भी जुड़ने जा रहा है। जो जाहिर है हिंदुस्थान और हिंदू विरोध का दुनियाभर में अंग्रेजी प्रोपेगंडा चलाने के मकसद से डिजाइन किया गया है। हमें बड़ी चिंता इस बात की भी है। असल में ब्रिटेन आज भी हमारे मसले में ‘फूट डालो’ की नीति पर चलता है। कुछ दिन पहले भी जब यूएन सिक्यूरिटी काउंसिल में चीन की पहल पर ‘कश्मीर चर्चा’ की बात आई थी तब ब्रिटेन के प्रतिनिधि ने ही सबसे पहले सकारात्मक रुख दर्शाया था। परंतु बाद में सभी १५ सदस्य देशों का विरोधी रुख भांपकर वो पीछे हट गया।
कुल जमा यही कि कल तक कश्मीर पर पाकिस्तानी बदनीयती को चीनी और तुर्की ही अपनी शह देते थे पर अब इसमें मलेशिया और ब्रिटेन की आवाजें भी जुड़ने लगी हैं। कल को हो सकता है कि आतंक पोषण के लिए जिम्मेदार पाकिस्तान को एफएटीएफ की ब्लैक लिस्ट से बचाने के लिए भी ये सारे देश आगे आ जाएं और फिर से हिंदुस्थान विरोधी आतंक के पोषण के लिए पाकिस्तान आजाद हो जाए तो हमारी च्ािंता आसमान की बुलंदियों पर होगी। खैर, ना-पाक परस्ती के वैश्विक ताने-बाने और ‘देसी’ पटाखों की ‘गूंज’ नई दिल्ली ने भी निश्चित तौर पर सुनी है और इसका संज्ञान भी लिया है। हमारे साइप्रस, ग्रीस, आरमेनिया और इंडोनेशिया से इंगेजमेंट्स बढ़े हैं ताकि तुर्की और मलेशिया को काबू में रखा जा सके। कुछ और कूटनीतिक मोहरे भी चले गए हैं लेकिन ये सब नाकाफी हैं। इस दिशा में भारत सरकार को तेजी से, अभी और पुख्ता कदम उठाने की जरूरत है। मलेशिया से पाम ऑयल आयात काबू में लाने की जरूरत है तो इंडोनेशिया से व्यापार बढ़ाने की जरूरत है। साइप्रस, आरमेनिया और ग्रीस के जरिए तुर्की पर तुरंत नकेल कसने की जरूरत है। जरूरत ब्रैक्सिट में फंसे ब्रिटेन का दायरा तंग करने की भी है। आज यह सब करना बेहद जरूरी है। हम हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकते। खासकर उस माहौल में जब कश्मीर का कायाकल्प हो रहा हो और इस नाजुक वक्त में ना-पाकियों की जिहादी जुगलबंदियां तेज हों। लिहाजा सरकार को अपनी कूटनीतिक जीत के जश्न में विद्वेष के गठबंधन व विरोध के पटाखों की आवाज पर भी चिंता करने की जरूरत है।