पहले सजा, फिर अदालत, सीबीआई का अंत!

मुझको पहले सजा दी गई
फिर अदालत में लाया गया…
सीबीआई के निदेशक पद से आनन-फानन में हटाए गए आलोक वर्मा के मन में उपरोक्त भावनाएं उठ रही होंगी। किसी अधिकारी को हटाने और तबादला करने का पूरा अधिकार प्रधानमंत्री कार्यालय को है। उसी अधिकार के तहत वर्मा को हटाया गया है। सीबीआई निदेशक को हटाया गया इसका दुख नहीं है, मगर उन्हें हटाते समय मोदी सरकार ने गलत परंपरा का निर्वाह किया है। वर्मा को बचाव करने या उनकी भूमिका रखने का मौका नहीं दिया गया। ‘सीवीसी’ की रिपोर्ट के आधार पर सरकार सीबीआई निदेशक को नहीं हटा सकती, ऐसी राय भाजपा के ही एक सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने रखी है। यदि ‘सीवीसी’ रिपोर्ट के अनुसार सरकार को सीबीआई के पूर्व निदेशक आलोक वर्मा ‘भ्रष्टाचारी’ लग रहे होंगे तो सरकार ने उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की? उनके खिलाफ मामला दर्ज क्यों नहीं कराया? यदि वे ‘भ्रष्ट’ ही थे तो महानिदेशक, अग्निशमन जैसे बड़े पद पर उनकी नियुक्ति क्यों की गई? ऐसे कई सवाल अब उपस्थित हो रहे हैं और उनका जवाब सरकार को देना पड़ेगा। मूलत: ‘सीवीसी’ बहुत ही ईमानदार संस्था नहीं है। ‘सीवीसी’ के असफल होने के कारण ही भ्रष्टाचार रोकने के लिए ‘लोकपाल’ की नियुक्ति करने की मांग हो रही है। मतलब वर्मा को हटाने के लिए मोदी सरकार ने सिर्फ ‘सीवीसी’ का इस्तेमाल किया ऐसा नहीं, बल्कि उसके आधार पर देश की मुख्य जांच एजेंसी को कंधा देने का भी काम किया है। राफेल मामले में मोदी सरकार पर आरोप जारी है। इसलिए बचाव के लिए वे एक भी मंच नहीं छोड़ रहे हैं। राहुल गांधी द्वारा उठाए गए सवालों का जवाब मोदी के वकीलों के पास नहीं है लेकिन बचाव का हंगामा जारी है। फिर ये मौका सीबीआई प्रमुख को क्यों नहीं मिलना चाहिए? उन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगानेवाले राहुल अस्थाना को मोदी सरकार ने ‘सीबीआई’ में घुसाया और अस्थाना ने सीबीआई की संपूर्ण मशीनरी को सरकार का गुलाम बनाने की कोशिश की। दो बड़े अधिकारियों के विवाद में प्रधानमंत्री को उसी समय हस्तक्षेप करना चाहिए था। मगर अस्थाना को प्रधानमंत्री कार्यालय का संपूर्ण समर्थन प्राप्त था। आज भी है। अस्थाना को बचाने के लिए ही वर्मा को उड़ाया गया। वर्मा और अस्थाना को पहले छुट्टी पर भेजा गया। आज वर्मा को हटाकर उनकी नियुक्ति अग्निशमन दल में कर दी गई। विवाद जब बढ़ रहा था उसी समय वर्मा या अस्थाना को नए स्थान पर भेजा जाना चाहिए था। मगर वर्मा को हटाना तय था इसीलिए विवाद को और बढ़ने दिया गया। वर्मा चले गए। अब अस्थाना को बचाया जाएगा, लेकिन राफेल मामले में सीबीआई निदेशक वर्मा सरकार को आरोपी बनाएंगे, किसी अपराध को सीबीआई कार्यालय में दर्ज करेंगे, इसी भय के चलते उन्हें हटाया गया क्या, इस आरोप का क्या? सर्वोच्च न्यायालय ने वर्मा को फिर से अधिकार दिया था। मगर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति ने अगले २४ घंटों में ही उन्हें दूर कर दिया। वर्मा ३१ जनवरी को सेवानिवृत्त होनेवाले ही थे। मगर सरकार तब तक रुकने के लिए तैयार नहीं थी। सीबीआई की कमान एक दिन भी यदि वर्मा के हाथ में रही तो छिपी हुई कई बातें सामने आ जाएंगी, ऐसा भय किसी के मन में था क्या? सरकार के क्रिया-कलाप पर हमें आश्चर्य नहीं होता। आरोप से घिरी एक भयभीत सरकार से और दूसरी कोई उम्मीद नहीं है। देश का आंतरिक चैतन्य तबाह करने का यह मामला है। तानाशाही या एकाधिकारशाही का अंधेरा जब देश में पैâलता है तब प्रकाश की चिंगारी आम जनता ही डालती है। लाचारी और लालसा का कोहराम तानाशाही में जारी था। स्वतंत्रता का जन्म कारावास या अंधेरे में ही होता है। देश में क्या हो रहा है, इसे जानने का अधिकार हर नागरिक को है। लोकतंत्र का यह पहला सबक है। सरदार पटेल जिस भूमि से आए थे उसी भूमि से आए वर्तमान सत्ताधारी भी हैं। सरदार ने देसी रियासतों तथा उनके घमंड को तोड़ डाला था। रियासतों को दिए गए आश्वासनों के बारे में १० अक्टूबर, १९५० को बोलते हुए सरदार पटेल ने संसद सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा था कि, ‘आपने इतिहास नहीं पढ़ा है क्या? इतिहास बनाने का शुभारंभ करने के बाद आप ताजा इतिहास भूल गए हैं क्या? आप यदि हाल का इतिहास भूल गए होंगे तो आपका भविष्य अंधकारमय हो जाएगा, इसे मत भूलो। तुमने जो वचन दिया था, उसे निभाओ। तुम पीछे नहीं हट सकते। नई संसद में नीतिमत्ता को कोई भी स्थान नहीं है क्या? हम हमारी नई स्वतंत्रता इसी तरह चलानेवाले हैं क्या?’ ‘हम तुम्हें गारंटी किसलिए दें? हमारी संसद सार्वभौम है,’ ऐसा हाथ में लाठी लेकर कहनेवाले हो क्या? आपको सभी के बारे में सर्वाधिकार मिला है क्या? वचन बदलने का भी अधिकार तुम्हें मिला है क्या? आप ऐसा ही करते रहे तो आप पर होनेवाला विश्वास खत्म हो जाएगा और कुछ दिनों के भीतर ही आपकी सार्वभौमिकता नष्ट हुए बिना नहीं रहेगी!’ सीबीआई निदेशक के हटाए जाने से पटेल द्वारा पूछे गए सवाल एक बार फिर उठ रहे हैं। अमदाबाद में स्थापित सरदार की प्रतिमा कुछ मार्गदर्शन करेगी क्या?