" /> पांच वर्षों में दो बार राष्ट्रपति से वीरता पदक, महाराष्ट्र के लाल ने रचा इतिहास

पांच वर्षों में दो बार राष्ट्रपति से वीरता पदक, महाराष्ट्र के लाल ने रचा इतिहास

-गढ़चिरौली में माओवादियों के सफाए में जुटे हैं खांडवे
-खांडवे का नाम सुनते ही भागते हैं माओवादी
-पढ़ाई के लिए कभी दौड़ते थे मैराथन

महाराष्ट्र के बीड जिले के गांव राजेवाडी गांव के गरीब किसान के बेटे राजेश खांडवे ने महज 5 साल की पुलिस सर्विस में दूसरी बार राष्ट्रपति वीरता पदक हासिल किया है। 2015 में नासिक के पुलिस ट्रेनिंग स्कूल से पासआउट होनेवाले राजेश की वीरता के साथ ही उनका संघर्ष भी प्रेरणादायक है। कभी मैराथन दौड़कर अपनी पढ़ाई के लिए पैसा जुटाने वाले राजेश के डर से अब माओवादी भागते फिरते हैं।

2015 में ट्रेनिंग पूरी करने के बाद राजेश खांडवे ने माओवादियों से लड़नेवाले सी-60 कमांडो फोर्स को गढ़चिरौली में सब-इंस्पेक्टर के रूप में जॉइन किया। फोर्स में शामिल होने के कुछ दिन बाद ही उन्होंने अकेले ही एक एनकाउंटर में दो माओवादियों को ढेर कर दिया। तीन साल बाद 2018 में खांडवे को राष्ट्रपति वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया। तब से वे गढ़चिरौली में 16 एनकाउंटर को अंजाम दे चुके हैं।
उनकी मेहनत, वीरता और कुशलता को देखते हुए राजेश को 2017 में असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर बना दिया गया। 15 अगस्त, 2020 को खांडवे को एक बार फिर राष्ट्रपति वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस बार उन्हें यह पदक 2017 में माओवादियों के खिलाफ दृढ़ कार्रवाई को अंजाम देने की वजह से दिया गया।

हालांकि, खांडवे अपने मेडल के लिए जश्न नहीं मना रहे हैं, क्योंकि शुक्रवार सुबह जब राजेश को पता चला कि उन्हें वीरता पदक से सम्मानित किया जाएगा, उसके कुछ मिनटों बाद ही सूचना मिली कि एक एनकाउंटर में उन्होंने अपने साथी दुष्यंत नंदेश्वर को गढ़चिरौली में कोठी आउटपोस्ट पर खो दिया है, जो माओवादियों के खिलाफ लड़ रहे थे। खांडवे ने फोन पर बात करते हुए कहा कि पिछले 5 साल में मैंने अपने 25 दोस्त खोए हैं और यह पदक उन्हें श्रद्धांजलि है। ऐसी हर घटना मुझे गढ़चिरौली में अपना कार्यकाल को जारी रखने प्रेरित करती है। खांडवे के लिए जिंदगी कभी आसान नहीं रही है, जो बचपन से ही सेना में शामिल होना चाहते थे।

खांडवे कहते हैं कि मैं एक बेहद गरीब परिवार से आता हूं और मेरे पिता जी मुझे पढ़ने के लिए पैसे नहीं दे सकते थे। मैं सातवीं कक्षा तक गांव के स्कूल में पढ़ा और फिर महाराष्ट्र सरकार के क्रीड़ा प्रबोधनी स्कूल के लिए चुन लिया गया। क्रीड़ा प्रबोधनी स्कूल में टैलेंटेड बच्चों को चुना जाता है और फिर उन्हें शिक्षा के साथ उनके पसंदीदा खेल में ट्रेनिंग दी जाती है।

एक एथलीट के रूप में खांडवे को स्कूल में पढ़ने का मौका मिला। इसके बाद वे आगे की पढ़ाई के लिए पुणे आ गए और एक हॉस्टल में रहने लगे। यहां अपना खर्च निकालने के लिए वे कोल्हापुस, सतारा और दूसरे जिलों में आयोजित मैराथन में दौड़ा करते थे ताकि पुरस्कार राशि से अपनी पढ़ाई जारी रख सकें। राजेश कहते हैं कि मुझे आज भी याद है कि कैसे मैं दौड़ा करता था? ताकि अपनी पढ़ाई के लिए पैसा जुटा सकूं। मेरा लक्ष्य भारतीय सेना को जॉइन करना था लेकिन मेरे घर वाले मुझे एनडीए की तैयारी के लिए पैसा नहीं दे सकते थे। मैं देश की सेवा करना चाहता हूं, यही मेरा एकमात्र लक्ष्य है। उन्होंने हॉस्टल में रहने के दौरान इंडियन ऑइल कॉर्पोरेशन सहित कई नौकरियों को ठुकरा दिया और पुलिस फोर्स में जाने का फैसला किया।

माओवादियों के गढ़ गढ़चिरौली में खुशी से पोस्टिंग स्वीकार करनेवाले राजेश अभी भी इस इलाके को छोड़ना नहीं चाहते हैं। उन्होंने कहा कि मेरे परिवार के लोग बहुत चिंता करते हैं। हर बार जब मैं उनसे बात करता हूं तो वे गढ़चिरौली से बाहर ट्रांसफर कराने को कहते हैं लेकिन मैं ऐसा नहीं चाहता और मेरी पत्नी भी मेरे फैसले का समर्थन करती है। राजेश और उनकी पत्नी ने बच्चे का नाम वीर रखा है।