पानी रे पानी

पानी रे पानी ओह पानी
तेरी क्या लिखूं मैं कहानी ओह पानी
तू है प्यासों की जिंदगानी
हवाओं में तू है फिजांओं में तू है
पृथ्वी के अंदर और पृथ्वी के ऊपर भी तू है
समंदर में तू नदियों में तू ऊंचे-ऊंचे पर्वतों की
बर्फीली चोटियों में तू है
पानी रे पानी ओह पानी
फूलों में तू पत्तों में तू है
आदमी के हर भोजन के कण-कण में तू है
मदिरा में तू है अमृत में तू है
जिंदगी के हर रंग में तू है
पानी-पानी ओह पानी
गम हो या खुशी, आंखों से आंसू बनकर
बहता पानी है
मंत्रों में तू तंत्रों में तू
मनुष्य हो या पंछी या हो जानवर
हर जीव के कण-कण में बसता है तू
बिन तेरे जिंदगी की चल नहीं सकती है गाड़ी
भोले शंकर के सिर पर गंगा बनकर
बहता है पानी पानी
ओह पानी ओह पानी
मौसम आते हैं चले जाते हैं
ऋतुओं के हर रंग में रंगता चला जाता है पानी
ठंडी में बर्फ बनता है पानी
कभी पेड़ों के पत्तों पर ओस बनकर
मोती की तरह चमकता है पानी
पानी रे पानी ओह पानी
तेरी क्या लिखूं मैं कहानी ओह पानी
– विजय कुमार अग्रवाल, मुंबई