पारर्दिशता पर  तारीख हुई मुकर्रर

चुनावों में राजनीतिक दलों के चंदा जुटाने की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से चुनावी बॉन्ड की घोषणा की गई थी। समझना जरूरी है कि चुनावी बॉन्ड एक ऐसा बॉन्ड होता है, जिसमें एक करेंसी नोट लिखा रहता है, जिसमें उसकी वैल्यू होती है। यह बॉन्ड पैसा दान करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इस बॉन्ड के जरिए आम आदमी राजनीतिक पार्टी, व्यक्ति या किसी संस्था को पैसे दान कर सकता है। इसकी न्यूनतम कीमत एक हजार रुपए जबकि अधिकतम एक करोड़ रुपए निर्धारित है, पर दूसरे तरीकों से असीमित होती है।
सियासी दलों के लिए लोकसभा का चुनाव ‘बोर्ड परीक्षा’ की तरह होता है, जिसमें जनता नेताओं का प्रत्यक्ष रूप से इम्तिहान लेती है। फिलहाल पहले चरण का चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो गया। अभी छह चरण बाकी हैं। दूसरे चरण की तैयारियां युद्धस्तर पर जारी हैं। पर दूसरे टर्म की वोिंटग से पहले उच्च न्यायालय ने तैयारियों में थोड़ा खलल डाल दिया है। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने सभी सियासी दलों से महीने के अंत तक अपने चुनावी खर्च का पूर्ण ब्यौरा देने को कहा है। चुनावों के बीच सुप्रीम कोर्ट द्वारा लेखा-जोखा लेने के फरमान से समूचे राजनीतिक दल हलकान हैं। सभी को पता है कि आधुनिक युग में चुनाव सिर्फ धन के बल पर टिके होते हैं। चुनावों में प्रचार के रूप में पैसा पानी की तरह बहाया जाता है। चुनावों के दौरान देश के बड़े औद्योगिक घराने, व्यवसायी, रसूखदार व आम आदमी चंदे के रूप में अपने पसंद की र्पािटयों को चुनाव लड़ने के लिए पैसा देते हैं। यह पैसा चंदे के रूप में गुप्त दिया जाता है, जिनका कोई लेखा-जोखा नहीं होता है। देनेवाला व्यक्ति पैसा कहां से लाता है, उसका जरिया क्या होता है? कौन-कौन लोग धन मुहैया कराते हैं? कितना धन देता है और किस शर्त पर देता है इत्यादि व्यावहारिक बातों को सार्वजनिक करने के लिए कोर्ट ने तारीख मुकर्रर की है।
िंहदुस्थान की सियासत का परिदृश्य पूरी तरह से बदल चुका है। राजनीति का मकसद अब समाज सेवा नहीं रहा। चुनाव में ताल ठोंकना सबके बूते की बात नहीं। चुनाव लड़ने की पहली शर्त यही होती है कि उम्मीदवार के पास असीमित धन हो। बड़े नेताओं की चुनावी रैलियों में करोड़ों का खर्च आता है, पर बड़े दलों के लिए इसकी व्यवस्था आसानी से हो जाती है। खबरें तो ऐसी भी हैं कि कुछ कॉरपोरेट समूह नेताओं की रैलियों के खर्च को उठाने के लिए र्पािटयों से संपर्क करते हैं। र्पािटयों से इजाजत मिलने के बाद वह अपना काला धन उन रैलियों में झोंक देते हैं और जब उनकी सरकार बनती हैं तो सूत सहित वसूल कर लेते हैं। कांग्रेस व वाम दलों पर ऐसे आरोप सालों से लगते रहे हैं।
गौरतलब है कि चुनाव सुधार क्षेत्र में काम करनेवाली संस्था ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्मस’ यानी एडीआर और सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन ने मौजूदा समस्याओं को लेकर हाल में उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की थी, जिस पर कोर्ट ने सुनवाई करते हुए आदेश जारी किया है। बहरहाल चुनाव सुधार की दिशा में उठाया गया यह बेहतरीन कदम कहा जा रहा है। इससे चुनावी फंिंडग में निश्चित रूप से पारर्दिशता आएगी लेकिन इस पर सभी सियासी दल सहमत होंगे, उम्मीद कम ही लगती है। कुछ दल सहमत हैं तो कुछ विरोध में हैं, वहीं वाम दलों का मत है कि राजनीतिक दलों के चंदे को पारदर्शी बनाने के नाम पर चुनावी बॉन्ड जारी करने की पहल राजनीतिक भ्रष्टाचार को वैध बनाने का तरीका साबित होगा।
सब जानते है कि चुनावों में चंदे का पैसा पूर्ण रूप से ‘काला धन’ होता है। काले धन को सफेद में परिर्वितत करने के लिए चुनावी बांड का नाम दिया गया। इसका मतलब यह हुआ कि ‘चुनावी बॉन्ड’ के जरिए काले धन को सफेद करने या इसके जरिए सत्ताधारी पार्टी से कारोबारी लाभ लेने के लिए कॉरपोरेट समूह, कर पनाहगाहों में रातों-रात कोई कंपनी बनाकर उसके जरिए चुनावी बॉन्ड खरीदकर उसे दान कर सकते हैं। व्यवस्था ज्यादा पुरानी नहीं है। जबसे चुनावी खर्च बढ़ा है तभी से सभी दलों को इलेक्शन के दौरान इनकी जरूरत पड़ती है। चुनावों में राजनीतिक दलों के चंदा जुटाने की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से चुनावी बॉन्ड की घोषणा की गई थी। समझना जरूरी है कि चुनावी बॉन्ड एक ऐसा बॉन्ड होता है, जिसमें एक करेंसी नोट लिखा रहता है, जिसमें उसकी वैल्यू होती है। यह बॉन्ड पैसा दान करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इस बॉन्ड के जरिए आम आदमी राजनीतिक पार्टी, व्यक्ति या किसी संस्था को पैसे दान कर सकता है। इसकी न्यूनतम कीमत एक हजार रुपए जबकि अधिकतम एक करोड़ रुपए निर्धारित है, पर दूसरे तरीकों से असीमित होती है।
करीब दो वर्ष पहले केंद्र सरकार ने अपने आम बजट में राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे को लेकर नियमों में बदलाव किया था, जिसके बाद राजनीतिक र्पािटयों के बीच बहस छिड़ गई थी। एक-दूसरे पर अपने से ज्यादा चंदे मिलने का आरोप गढ़ने लगे थे। पूर्व नियमों के मुताबिक सियासी दलों को किसी भी व्यक्ति विशेष या कंपनी से प्राप्त हुए बीस हजार रुपए से कम का स्रोत बताने की आवश्यकता नहीं थी, पर २०१७ के बजट में अरुण जेटली ने इस रकम को घटाकर दो हजार कर दिया था और इसे राजनीतिक दलों के कामकाज में पारर्दिशता बढ़ानेवाला कदम बताया था लेकिन उसी वक्त नेशनल इलेक्शन वॉच और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की रिपोर्ट ने सभी के दावों की हवा निकाल दी।
एडीआर रिपोर्ट के आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले दस-बारह सालों में विभिन्न राजनीतिक दलों की करीब सत्तर फीसद आय अज्ञात स्रोतों से हुई। रिपोर्ट में बताया गया कि वर्ष २००४ से लेकर मार्च २०१५ तक सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की कुल आय ११,३६७ करोड़ रुपए रही, जिसमें से सिर्फ ३१ फीसद आय के ही स्रोत का पता चला। हालांकि कुछ क्षेत्रीय दलों ने चंदे से परहेज भी किया। चंदा लेने में पिछले कुछ सालों में आम आदमी पार्टी ने सभी को पीछे छोड़ दिया था। खैर अगर चंदे के धन में पारर्दिशता आती है तो चुनाव सुधार क्षेत्र में उठाया गया यह पहला कदम माना जाएगा। देखने वाली बात होगी कि इस ३१ तारीख को र्पािटयां ईमानदारी से चंदे का ब्यौरा देती हैं या नहीं?