पालनहार भगवान

आदि-अनंत है अलख
शुारुआत-अंत नहीं है अनंत!
परिभाषा शब्दों से परे
अहसास अनुभूति पूरक!
जाति-धर्म, देश-काल से परे
अखिल ब्रह्मांड का है मालिक
सृष्टि रचयिता पालनहार
नभ-धरा, अनल-नीर
पवन में है विद्यमान
खोया नहीं, फिर भी
हम ढूंढ़ रहे बाहर
है वह हमारे अंदर!
शरीर रूपी मंदिर में
है सदा विराजमान
निराकार है साकार
सर्वव्यापक है कण-कण में
आनंददायक दुखहरण की
दिव्य चक्षु से करो पहचान
सद्गुरु दीदार कराएं
अलख की अनुभूति कराएं
जीवन सफल बनाएं
-आर.डी. अग्रवाल ‘प्रेमी’, खेतवाड़ी, मुंबई