पूनम सिन्हा के आने से लखनऊ का मुकाबला हुआ रोचक

सपा ने शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी पूनम सिन्हा को राजनाथ सिंह के नामांकन के दिन ही मैदान में उतार कर लखनऊ के मुकाबले को काफी रोचक  बना दिया है। लखनऊ की सियासी नब्ज़ को समझने वाले इससे चिंतित तो कतई नहीं हैं, लेकिन इतना जरूर मान रहे हैं कि लड़ाई पहले जैसी आसान नहीं रह गई। वह भी तब जबकि दबी जुबान चर्चा है कि कांग्रेस पूनम को समर्थन दे सकती है।

लखनऊ से वैसे तो पूनम सिन्हा के चुनाव लड़ने की चर्चा तब से ही थी जब शत्रुघ्न सिन्हा ने लखनऊ में अखिलेश यादव से मुलाकात की थी। पूनम के प्रत्याशी के रूप में उतारने का फैसला कोई अचानक नहीं लिया गया। सपा के सूत्रों का दावा है कि पूनम ने लखनऊ सीट पर लड़ने पर तभी अपनी सहमति दी जब यह तय हो गया कि वह विपक्ष की संयुक्त प्रत्याशी रहेंगी। हालांकि यह अभी देखने की बात है कि कांग्रेस यहां से प्रत्याशी उतारती है या समर्थन की घोषणा करती है।

दरअसल, पिछले चार चुनावों से समाजवादी पार्टी का प्रत्याशी लखनऊ सीट पर भाजपा को टक्कर नहीं दे सका। सिर्फ 2004 में सपा की मधु गुप्ता एक लाख छह हजार से अधिक वोटों के साथ दूसरे नंबर पर रहीं थी। इसके अलावा वर्ष 1999, 2009 और 2014 में कांग्रेस ने भाजपा के प्रत्याशियों को करारी टक्कर दी। सपा इस बार ऐसा प्रत्याशी चाहती थी जो भाजपा को टक्कर दे सके। पूनम को लाने के पीछे ऐसी ही रणनीति वजह रही।

पूनम की इंट्री के जरिए समाजवादी पार्टी ने बड़ा दाव चलने की कोशिश की है। दरअसल, पूनम के चेहरे को आधार बनाकर पार्टी लखनऊ में उनकी जाति के सिंधी समाज, कायस्थ समाज के अलावा दलित और मुख्य रूप से मुस्लिमों की आबादी को लुभाने की कोशिश में है। वहीं कन्नौज से सांसद डिंपल यादव के जरिए ज्वाइनिंग करवा कर सपा ने महिला का संदेश भी देने की कोशिश की है। कहना गलत न होगा कि कुछ ऐसे ही समीकरण के बलबूते कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी वर्ष 2014 के चुनाव में राजनाथ सिंह को जबरदस्त टक्कर देती दिखीं थीं। लेकिन नतीजे आए तो रीता लगभग उतने ही वोट के अंतर से हारीं जितने वोट उन्हें मिले थे। रीता को 288357 मत मिले थे जबकि राजनाथ सिंह 561106 पाए थे।