पेड़ सत्ता में आए तो… अंग्रेजों का जंगलराज अच्छा था!

विधानसभा चुनाव के मौके पर आरे में वृक्षों की कटाई का मुद्दा चर्चित हुआ परंतु अब ठंडा हो गया। अंग्रेजों का शासन जिन्हें जंगलराज लगता था उन अंग्रेजों ने इस देश के एक-एक पेड़ों को वैâसे संजोया, इसे समझना चाहिए। पेड़ बोलते हैं, पेड़ रोते हैं। इंसानों के आंसू झूठे होते हैं।
विधानसभा चुनाव के मौके पर आरे में पेड़ों की कटाई का विषय चर्चित हुआ परंतु पर्यावरण हमारे देश में चुनावी मुद्दा नहीं हो सकता है। सरदार सरोवर से लेकर अब मुंबई में वृक्षों की कटाई से ये अनुभव मिल चुका है। मेट्रो के कारशेड के लिए आरे में वृक्ष न काटें, ऐसा आदेश सर्वोच्च न्यायालय ने दिया परंतु उससे पहले ही ‘मेट्रो’ कॉर्पोरेशन ने ढाई हजार पेड़ों को रात के अंधेरे में काटकर सपाट मैदान बना दिया। इलेक्ट्रिक आरी से पेड़ काटे गए। पेड़ों के जमीन पर गिरते समय उन पेड़ों पर रहनेवाले पक्षी, उनके घोसले और उन घोसलों में रहनेवाले उनके बच्चे मर गए। आरे वन क्षेत्र में पक्षियों की कलरव और फड़फड़ाहट थम गई। पेड़ों में जान होती है, यह सत्ताधारियों को स्वीकार न होने के कारण हमने २,५०० जीवों की बलि ली। यह सत्य वे स्वीकार नहीं करेंगे। इसलिए पर्यावरण, प्रकृति, जल तत्व इन मुद्दों पर सत्ताधारियों को अब आगे नहीं बोलना चाहिए, यही सत्य है।
पेड़ों की सत्ता
पेड़ों को मतदान का अधिकार नहीं है। यदि ये रहा होता तो नोची गई पेड़ों की खाल लेकर राजनीतिज्ञ सड़क पर रोते दिखे होते। पक्षी-प्राणी मतदाता नहीं हैं इसलिए उन्हें पाकिस्तानी नागरिक समझकर मार दिया गया। कवि द.मा. धामणस्कर की एक कविता इस मौके पर याद आती है-
।। झाडे सत्तेवर आली की…।।
माणसे
निरपराध झाडांवर प्रावांतिक हल्ले करतात,
त्यांचे हातपाय तोडून त्यांना
बेमुर्वतखोरपणे
उघड्यावर रचून ठेवतात
माणसांच्या राज्यात हे असेच चालायचे
उद्या झाडे सत्तेवर आली की तीही
तोडलेल्या माणसांची हाडे अशीच उघड्यावर रचून ठेवतील
वृक्षकुळातील कुणी मेला तर
माणसांचा सरपण म्हणून उपयोग करतील
फिरून माणसांचे राज्य येण्यापूर्वी
खुनांच्या अवशेषांची विल्हेवाट लावण्याची कला
झाडेही आत्मसात करतील
फक्त एकदा
त्यांचे राज्य आले पाहिजे…
ये जंगल कैसे?
हजारों किसानों की खुदकुशी, बाढ़ में बह गए परिवार आदि जहां राजनीतिज्ञों के लिए संवेदना का विषय नहीं हो सकते हैं वहां पेड़ मुद्दा वैâसे हो सकते हैं? पेड़ छांव देते हैं परंतु इसके बाद अब लोग छांव के लिए छाता, टोपी पहनकर घूमेंगे। पेड़ प्राणवायु देते हैं। लोग इसके आगे नाक में प्राणवायु की नली डालकर घूमेंगे। सर जगदीशचंद्र बोस नामक हिंदुस्थानी वैज्ञानिक ने ये सिद्ध किया है कि वनस्पति, पेड़ों में जान होती है। उन्हें स्पर्श, प्रकाश, संवेदना महसूस होती है। वनस्पतियों का प्रतिसाद उन्हें मिलता है। धूप में पानी के बगैर इंसान मरते हैं। पेड़ भी मरते हैं। पेड़ जन्म लेते हैं और बढ़ते हैं। पत्थर बढ़ते नहीं परंतु ऐसे जिंदा पेड़ों का कत्ल निर्दयता से किया जाता है। तमिलनाडु और कर्नाटक के जंगलों में वीरप्पन तथा उसकी टोली जंगल नष्ट करती थी। चंदन के पेड़ों की तस्करी करने के कारण अंतत: पुलिस ने उसे मार दिया। सड़क पर आवारा कुत्ते आने-जानेवाले लोगों की गर्दन दबोच लेते हैं, उन्हें भी कानून का संरक्षण है परंतु जीवित पेड़ों को न कानून का संरक्षण है और न सरकार का। यह दृश्य भयंकर है। ये कत्ल मिलीभगत से हुए हैं और यह बड़ी साजिश का हिस्सा है। आरे जंगल नहीं है, ऐसा सरकार का दावा है। इसलिए पेड़ काटा जाए? मुंबई की सड़कों पर कई पेड़ विकसित हुए हैं। उन पेड़ों के कारण हादसे होते हैं। फिर भी पेड़ काटने के लिए न्यायालय की अनुमति नहीं मिलती। कानून की व्याख्या में और सरकारी दस्तावेजों में उन्हें जंगल नहीं दिखाया गया है इसलिए क्या उन्हें खत्म कर दिया जाए? आरे में फिलहाल ५ लाख पेड़, दो नदियां, तीन जलाशय, १८ प्रकार के सरिसृप प्राणी, ७६ प्रकार के पक्षी, घासवाला क्षेत्र, तराई क्षेत्र ऐसा बहुत कुछ है और सामान्य भाषा में इसे जंगल ही कहते हैं।
बोलनेवाले पेड़
अंग्रेजों ने हमें गुलाम बनाकर रखा परंतु देश की नदियों, पेड़ों, जंगल और प्रकृति के मामले में वे जबरदस्त संवेदनशील थे। वे कितने नर्मदिल थे, इसकी एक बात बताता हूं और विषय खत्म करता हूं। वरिष्ठ पत्रकार अनंत भालेराव को दैनिक ‘मराठवाड़ा’ में संपादकीय लिखा जाए, ऐसा महसूस हुआ। ऐसा एक बोलनेवाला पेड़ा था। उस बोलनेवाले पेड़ की ये कहानी है।
।।बोलनेवाला पेड़।।
स्वर्गीय राजगोपालाचार्य के समय की ये कहानी है। वे गवर्नर जनरल के पद से सेवानिवृत्त होकर मद्रास में रहते थे। एक दिन राजाजी ने मद्रास में एक पेड़ को श्रद्धांजलि देनेवाला मृत्यु लेख लिखा। वो ऐसा कि मद्रास शहर में एक बड़े महामार्ग पर स्थित एक बड़ा पेड़ भहराकर गिर गया। प्रयास करने के बाद भी उसे वापस नहीं लगाया जा सका। वो पेड़ हमेशा के लिए मर गया। राजाजी को पेड़ के भहराकर गिरने की बात पता चलते ही वे उस जगह गए। वो पेड़ राजाजी का परिचित था। अंग्रेजों के शासन में भी वो इसी तरह भहराकर गिरा था। तब एक अंग्रेज गवर्नर था। वह पेड़ों का बड़ा प्रेमी था। उसने आकर उस भहराकर गिरे हुए पेड़ को वापस लगवाया। उस पेड़ की आत्मकथा राजाजी ने लिखी। कहते हैं वह पेड़ उस गवर्नर से सुबह-शाम बात करता था। उनके सपने में आता था। सपने में जाकर वो अपने सुख-दुख उस अंग्रेज गवर्नर से कहता था। किसने कहां कुल्हाड़ी चलाई, जख्मों से खून बहा। कौन-सी डाली तोड़कर र्इंधन के लिए ले गया। जड़ में घाव हुई आदि बातें ये पेड़ गवर्नर को रात में सपने में जाकर कहता था। दूसरे दिन लाट साहब पेड़ के पास आते थे और देखते थे तो सपने में कही गई बातें सच होती थीं। फिर ये साहब इलाज करते थे। पेड़ को चोट न पहुंचे इसके लिए उन्होंने बाड़ लगवाई। चबूतरा बनवाया। अकेले पेड़ का दुलार किसी की नजर में न आए इसलिए जो-जो व्यवस्था उस पेड़ के लिए होती थी वो-वो व्यवस्था सड़क के किनारे स्थित अन्य सभी पेड़ों के लिए की गई। ये गवर्नर बाद में अकेले हिंदुस्थान में रहने लगा। बीवी-बच्चे नहीं थे। सुबह-शाम वो इस पेड़ के नीचे आकर बैठता था और इसी मित्र के साथ चर्चा करने जैसे इस पेड़ से बात करता था। लोग कहते थे कि लाट साहब पागल हो गए हैं। वे पेड़ों से बोलते रहते हैं, ऐसा कहते थे। बाद में वे इंग्लैंड चले गए। उन्हें पता चला कि वह पेड़ उखड़ गया है। उन्होंने राजाजी को पत्र लिखकर सूचना दी और कहा कि उस पेड़ के लिए व्यवस्था करो। राजाजी ने उचित व्यवस्था की परंतु वह पेड़ मर गया। उस समय गवर्नर नहीं थे। राजाजी ने उस पेड़ के बारे में मन को कचोटनेवाला मृत्युलेख लिखकर वो और उसका मित्र- उस गवर्नर और उन दोनों को श्रद्धांजलि अर्पित की। मुंबई में २ हजार ५०० पेड़ मर गए। उनकी मृत्यु पर शोक कम और विकास का आनंदोत्सव ज्यादा मनाया जा रहा है। अंग्रेजों का शासन अच्छा था, ऐसा कभी तो कहा जाता है वो इसीलिए। २ हजार ५०० पेड़ों को श्रद्धांजलि। पेड़ कट गए। राजनीति खत्म हो गई। आंसू भी सूख गए।