‘प्रमोद’कन्या का ‘माओऽ माओऽऽ’, मुख्यमंत्री अपराधी हैं क्या?

भारतीय जनता पार्टी की जानकार ‘प्रमोद’कन्या पूनम महाजन ने अचानक स्तुति सुमन बरसाए हैं। किसान की फसल उत्तम हो, खेत-खलिहान हरा-भरा हो और अचानक बेमौसम की बारिश या ओले गिरने से सबकुछ बर्बाद हो जाए, ऐसा ही कुछ सांसद पूनम महाजन ने किया है। मुंबई में आए किसान मोर्चे में शहरी माओवाद नजर आने का बयान सांसद पूनम ताई ने दिया है। श्रीमती महाजन भारतीय जनता पार्टी के युवा मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। अपने अधिकारों की मांग के लिए २०० किलोमीटर पैदल चलकर किसानों का मोर्चा मुंबई में पहुंचा था। मोर्चा बहुत ही अनुशासनबद्ध था और इतनी बड़ी संख्या में शहर में आने के बावजूद मुंबईकरों को बिल्कुल भी परेशानी नहीं हुई। उनके इस अनुशासन की प्रशंसा मुख्यमंत्री फडणवीस ने भी की। मुख्यमंत्री ने मोर्चे के लोगों से चर्चा की और उनकी सभी मांगों को मान्य कर तालियां भी हासिल कीं। अर्थात ‘माओ’वाद का समर्थन कर मुख्यमंत्री ने अपराध किया है, ऐसा पूनम महाजन का कहना है क्या? त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी ने ‘लालभाई’ अर्थात कम्युनिस्ट विचारों को पराजित किया। वे विचार लेनिन या माओ के ही थे। सत्ता स्थापित होते ही लेनिन के पुतले उखाड़ पेंâके गए। लेकिन उसी लाल क्रांति की जय-जयकार तथा लेनिन जिंदाबाद के नारे लगाते हुए ५० हजार किसान नासिक से मुंबई तक चलकर आए। उनके हाथ में लाल झंडा और सिर पर लाल टोपियां थीं। लेनिन के उन बच्चों की प्रशंसा मुख्यमंत्री ने की और सभी मांगें मंजूर कर लीं। मतलब पुतले उखड़ने से विचार नहीं मरते। माओवाद यह समस्या है और कुछ क्षेत्रों में हाथ में बंदूक लिए माओवादी हिंसाचार कर उत्पात मचा रहे हैं। नक्सलवादियों से उनका संबंध है, यही माओवाद बाद में जंगल में रहनेवाले बंधुआ मजदूरों तथा आदिवासी बस्तियों में फैल गया क्योंकि उन्हें उनका अधिकार देने से नकार दिया गया था। उन्हें राशनकार्ड भी नहीं मिलता था। इंसानों की तरह जीना उनकी किस्मत में नहीं था। पिछले ४ वर्षों में भाजपा सरकार ने भी इन गरीबों की कम-से-कम प्राथमिक जरूरतों को पूरा करने का प्रावधान किया क्या? ऐसा किया गया होता तो उनके सिर की लाल टोपियां उड़ गई होतीं। मुंबई की मिलों पर ५० वर्ष पहले लाल साम्राज्य था। वहां भी लाल टोपियां और लाल झंडे थे। वह रंग भगवा हुआ क्योंकि उनके जीवनयापन का सवाल शिवसेना ने हल किया। किसी भी क्रांति का संबंध पहले खाली पेट से और बाद में स्वाभिमान से होता है। जब तक समाज में भूख, गरीबी है तब तक ‘शैतान’ जन्मेगा। यह विचार अमर है। आप जिसे माओवादी विचार कहते हो और उसका संबंध किसान मोर्चे से जोड़ते हो, उन्हीं किसानों द्वारा खेत में उत्पादित अनाज तुम खाते ही हो न? पिछले वर्ष महाराष्ट्र का किसान हड़ताल पर गया और उस हड़ताली संगठन में भी लालभाई के संगठन थे लेकिन मुख्यमंत्री ने अंतत: उनसे भी चर्चा की ही न! शहरी माओवाद का विचार पूनम महाजन ने रखा है लेकिन सोमवार के किसान मोर्चे में किसी भी तरह की देशद्रोही घोषणाएं नहीं हुई हैं। इसी माओवाद ने हिंदुत्ववादी नेपाल का निवाला निगला है। सांसद महाजन को चाहिए कि प्रधानमंत्री मोदी से कहकर नेपाल में फौज भेजकर हिंदू राष्ट्र की रक्षा करने की मांग करें। बगल के श्रीलंका, मालदीव जैसे राष्ट्रों में माओवाद को घुसाकर चीन ने चुनौती पैदा की है और हमारे प्रधानमंत्री काशी घाट पर फ्रांस के राष्ट्रपति के साथ होली का रंग उड़ा रहे थे। महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, झारखंड, आंध्र, तेलंगाना जैसे राज्यों में ‘माओवादी’ हाथ में बंदूक लेकर लड़ रहे हैं। परंतु यह सवाल सरकारी असफलता का है। यह माओवाद जितना खतरनाक है उसकी बजाय अधिक खतरनाक नरेश अग्रवाल जैसे लोग हैं। राम की निंदा करनेवाले, हिंदुस्थानी फौज पर कीचड़ उछालनेवाले नरेश अग्रवाल के लिए जो दल रेड कार्पेट बिछाता है उस दल को किसानों को ‘माओवाद’ कहकर अपमानित करना शोभा नहीं देता। कश्मीर में आतंकी अशरफ वाणी के परिवार को भाजपा की ही सरकार ‘पेंशन’ देती है और ‘पाक जिंदाबाद’ का नारा देनेवाले अशरफ वाणी जैसे अनेकों को ‘शहीद’ ठहराया जाता है। महबूबा मुफ्ती के विचारों से जिनका तालमेल बैठा हुआ है, वे किसानों को माओवादी ठहराकर खुद को उघाड़ रहे हैं। किसानों के मोर्चे में शहरी माओवाद घुसा होगा तो भाजपाई मुख्यमंत्री ने आतंकवादियों की मांगें स्वीकार की हैं, ऐसा मानें क्या?