" /> प्रशांत मल्हारी बटुले फिर से आफत!

प्रशांत मल्हारी बटुले फिर से आफत!

राज्य के किसानों के सुखमय दिन आएं, उनके चूल्हें न बुझने पाएं, उनकी चिंता का भार कम हो, इसके लिए ‘ठाकरे सरकार’ सतत प्रयासरत है। लेकिन संयम का बांंध टूट जाता है और किसान आत्महत्या कर लेता है, ऐसा होने लगा है। अब फिर से बेमौसम बरसात ने मराठवाड़ा, उत्तर महाराष्ट्र सहित पश्चिम महाराष्ट्र को भी झकझोर दिया है। ओलावृष्टि के साथ हुई बारिश से किसान हतबल हो गए और तैयार फसलें नष्ट हो गर्इं। एक भी साल ऐसा नहीं जाता कि किसानों की अपेक्षा के अनुसार बेमौसम बारिश का झटका तैयार फसलों को न लगा हो। पिछले साल अतिवृष्टि के कारण खरीफ की फसलों का नुकसान हुआ। इस बार रबी की अच्छी फसल हुई थी और किसानों के चेहरे पर मुस्कान आ गई थी लेकिन बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि के कारण उनकी मुस्कान आंसुओं में बदल गई। फिलहाल ऐसा ही हो रहा है, किसान निराश होकर आत्महत्या की ओर बढ़ रहा है। आज भी कभी-कभार किसानों या उनके परिजनों के आत्महत्या की खबरें आती रहती हैं। ऐसी ‘कभी-कभार’ वाली खबरें हमेशा के लिए बंद हो जाएं और अन्नदाता किसान सुखपूर्वक रहें, ऐसा कौन नहीं चाहेगा? नगर जिला के पाथर्डी तालुका में भारजवाडी गांव है, वहां के किसान मल्हारी बाबासाहेब बटुले ने आत्महत्या कर ली। आत्महत्या का कोई अन्य कारण नहीं है। हजारों किसानों ने अब तक जिस वजह से अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली, उसी अनुपज और कर्जदार होने के कारण मल्हारी ने भी अपना जीवन समाप्त कर लिया लेकिन मल्हारी की आत्महत्या के बाद महाराष्ट्र उसके छात्र बेटे को देखकर हिल गया। मल्हारी का बेटा प्रशांत तीसरी कक्षा में पढ़ता है। स्कूल के एक कार्यक्रम में सुबह उसने एक कविता सुनाई। किसान परिवारों को दिलासा देनेवाली इस कविता के बोल थे-
‘अरे किसानों, आत्महत्या मत करो!’
खेतों में मेहनत के बावजूद तुम दर्द से पीड़ित
अरे किसानों, आत्महत्या मत करो!’
पैसे न होने पर भी स्कूल भेजते हो बच्चों को
भीषण गर्मी में खेती करते हो
फसलें उगाकर मिलते हैं पैसे
खेती करके हाथों में पड़ते हैं छाले,
अरे किसानों, आत्महत्या मत करो!’
प्रशांत ने सुबह ये कविता सुनाई और रात के समय अपने पिता की गोद में सोने चला गया। सुबह जब वह उठा, तब उसके पिता इस दुुनिया में नहीं थे। उन्होंने जहर पीकर अपनी जान दे दी। मल्हारी खेती-बारी करके अपना जीवनयापन करते थे। उन्होंने कर्ज लेकर ट्रैक्टर खरीदा था लेकिन बेमौसम बरसात के कारण फसलों का नुकसान हो गया और कर्ज वैâसे चुकाया जाएगा, इस चिंता में उन्होंने आत्महत्या कर ली। ये सुन्न कर देनेवाली घटना है। अब तक ऐसे हजारों अन्नदाता मल्हारी ने अपनी जान दी है। ऐसे मल्हारी जब ‘हताश’ होकर मर जाते हैं, तब उनके बाद उनका परिवार रास्ते पर आ जाता है। आत्महत्या करनेवाले कई माता-पिता की वेदना प्रशांत के कोमल मन को विचलित कर गई। किसानों का जीना मुश्किल है, इसके बावजूद वे मरने का रास्ता न चुनें, इसके लिए प्रशांत ने कविता के माध्यम से अपनी बात कही थी। लेकिन उसके किसान पिता का उसी रात हताश होकर आत्महत्या करना एक विचित्र संयोग है। किसान आत्महत्या न करे, इसके लिए सरकार ने तीन महीनों में बड़े काम किए हैं। नेतागण किसान कल्याण की घोषणा करते हैं लेकिन उसे अमल में लाने के दौरान कई बार आक्षेप लिया जाता है। आंकड़े सही हैं या गलत, सरकारी तंत्र इसकी जांच करे, लेकिन २०१९ में २,८०८ किसानों के आत्महत्या की बात सामने आई है। उससे पहले कितने किसानों की मौत हुई, ये सरकार और भगवान को ही मालूम है। लेकिन प्राकृतिक आपदाओं सहित अन्य संकटों से किसान हमेशा के लिए मुक्त हो जाएं, इसके लिए ‘ठाकरे सरकार’ कदम उठा रही है। किसानों की फसलों का २ लाख तक का कर्ज माफ होने की केवल घोषणा नहीं है बल्कि कर्जमाफी प्राप्त किसानों की सूची सरकार की ओर से प्रकाशित की जा रही है। रोग पुराना है और मजबूत हो गया है लेकिन मरीज ठीक होकर रहेगा, हमें ऐसा पूरा विश्वास है। गत १५-२० सालों में हजारों मल्हारी बटुले कर्जदार होकर मर गए और हजारों प्रशांत अनाथ हो गए। प्रशांत की दिल कचोटनेवाली कविता के बावजूद उसके पिता मल्हारी का दुख अपनी सीमा लांघ गया। उनकी वेदना पर राजनीति न होने पाए। महाराष्ट्र का विरोधी दल संवेदनशील होगा तो केवल विरोध करने के लिए विरोध की नीति को रोककर ऐसे मुद्दों पर गंभीरता से चर्चा हो और सबको मिलकर किसान वैâसे जीएगा, इस नीति पर काम करना चाहिए। फिलहाल ये तस्वीर नहीं दिख रही। कर्जमाफी तात्कालिक मरहमपट्टी है। कई किसानों को इस मरहम पट्टी का लाभ नहीं मिलता। उसी में के मल्हारी बटुले हैं। मल्हारी बटुले को अपनी जीवनलीला क्यों समाप्त करनी पड़ी? उनके बेटे प्रशांत को ‘अरे किसानों, मत करो आत्महत्या!’ जैसी कविता क्यों सूझी? इन सवालों का जवाब नेताओं को खोजना होगा। सरकार फडणवीस की हो या ठाकरे की, अन्नदाता आत्महत्या का रास्ता चुनता है। प्रशांत की यह सिसकी महाराष्ट्र को बेचैन करनेवाली है।