" /> प्राचीन और पारंपरिक इतिहास में अयोध्या!

प्राचीन और पारंपरिक इतिहास में अयोध्या!

वर्तमान अयोध्या हिंदुस्थान के उत्तर प्रदेश राज्य का एक अति प्राचीन धार्मिक नगर है। यह पवित्र नगर सरयू नदी के तट पर बसा है। इसे ‘कौशल देश’ भी कहा जाता था। अयोध्या बौद्ध धर्म, हिंदू धर्म का पवित्र और प्राचीन तीर्थ स्थल में से एक है। जैन धर्म का शाश्वत तीर्थक्षेत्र है। मगर अयोध्या की ख्याति भगवान राम के जन्म के बाद विश्व पटल पर सबसे ज्यादा हुई। इसी अयोध्या में आगामी ५ अगस्त को भगवान श्रीराम के मंदिर का शिलान्यास होनेवाला है। प्रचलित कथा के अनुसार श्रीराम का जन्म चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को हुआ था। इस दिन देशभर में राम नवमी मनाई जाती है जो श्रीराम के जन्म की द्योतक मानी जाती है। अलग-अलग काल के पुराणों और प्रचलित मान्यताओं में लिखित श्रीराम के जन्मतिथि को लेकर मत-मतांतर होते रहते हैं। इनमें सबसे ज्यादा प्रामाणिक महर्षि वाल्मीकि की रामायण को माना जाता है क्योंकि वाल्मीकि भगवान राम के समय जीवित थे और लव-कुश के माध्यम से यह रामायण लोगों तक पहुंची।

महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण के बालकांड में श्रीराम के जन्म का उल्लेख इस तरह किया गया है। जन्म सर्ग के १८वें श्लोक १८-८-१० में महर्षि वाल्मीक जी ने उल्लेख किया है कि श्री राम जी का जन्म चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को अभिजीत मुहूर्त में हुआ। अचंभे की बात ये है कि आधुनिक युग में कंप्यूटर द्वारा गणना करने पर यह २१ फरवरी, ५११५ ईस्वी पूर्व निकलता है। तुलसीदास की रामचरित मानस के बालकांड के १९० वें दोहे के बाद पहली चौपाई में तुलसीदास ने भी इसी तिथि और ग्रह नक्षत्रों का जिक्र किया है। तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में राम के पूरे जीवन की हर अवस्था का जिक्र करते हुए कहा है कि सोलहवें वर्ष में वो विश्वमित्र के साथ तपोवन गए और युद्ध की शिक्षा ली।
अयोध्या के बारे में महर्षि वाल्‍मीकि लिखते हैं, ‘स्‍त्रियों की नाट्य समितियों की भी यहां कमी नहीं है और सर्वत्र जगह-जगह उद्यान निर्मित थे। आम के बाग नगरी की शोभा बढ़ाते थे। नगर के चारों ओर साखुओं के लंबे-लंबे वृक्ष लगे हुए ऐसे जान पड़ते थे, मानो अयोध्‍यारूपिणी स्‍त्री करधनी पहने हो। यह नगरी दुर्गम किले और खाई से युक्‍त थी तथा उसे किसी प्रकार भी शत्रुजन अपने हाथ नहीं लगा सकते थे। हाथी, घोड़े, बैल, ऊंट, खच्‍चर सभी जगह-जगह दिखाई पड़ते थे। राजभवनों का रंग सुनहला था। विमानगृह जहां देखो वहां दिखाई पड़ते थे। उसमें चौरस भूमि पर बड़े मजबूत और सघन मकान अर्थात बड़ी सघन बस्‍ती थी। कुओं में गन्‍ने के रस जैसा मीठा जल भरा हुआ था। नगाड़े, मृदंग, वीणा, पनस आदि बाजों की ध्‍वनि से नगरी सदा प्रतिध्‍वनित हुआ करती थी। पृथ्‍वी तल पर तो इसकी टक्‍कर की दूसरी नगरी थी ही नहीं। उस उत्तम पुरी में गरीब यानी धनहीन तो कोई था ही नहीं, बल्‍कि कम धन वाला भी कोई न था। वहां जितने कुटुंब बसते थे, उन सबके पास धन-धान्‍य, गाय, बैल और घोड़े थे।’

पारंपरिक इतिहास में अयोध्या कौशल राज्य की प्रारंभिक राजधानी थी। गौतमबुद्ध के समय कौशल के दो भाग हो गए थे। उत्तर कौशल और दक्षिण कौशल जिनके बीच में सरयू नदी बहती थी। बौद्ध ग्रंथों में भी अयोध्या और साकेत को भिन्न-भिन्न नगरों के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वहीं वाल्मीकि रामायण में अयोध्या को कौशल की राजधानी बताया गया है, जिसके बाद संस्कृत ग्रंथों में साकेत से मिला दिया गया है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लंबाई और तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी। पहले यह कौशल जनपद की राजधानी था। प्राचीन उल्लेखों के अनुसार तब इसका क्षेत्रफल ९६ वर्ग मील था।
अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका ।
पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिका:।।
अर्थात अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, काञ्चीपुरम, उज्जैन, और द्वारिका – ये सात पुरियां नगर मोक्षदायी हैं।
वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है-
‘अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या’ और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। अथर्ववेद में यौगिक प्रतीक के रूप में अयोध्या का उल्लेख है- अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या। तस्यां हिरण्मयः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः।। (अथर्ववेद — १०.२.३१)
सातवीं सदी के चीनी यात्री ह्वेन सांग ने इसे ‘पिकोसिया’ संबोधित किया है। उसके अनुसार इसकी परिधि १६ली (एक चीनी ‘ली’ बराबर है १/६ मील के) थी। संभवतः उसने बौद्ध अनुयायियों के हिस्से को ही इस आयाम में सम्मिलित किया हो। आईन-ए-अकबरी के अनुसार इस नगर की लंबाई १४८ कोस तथा चौड़ाई ३२ कोस मानी गई है। अयोध्या में कई महान योद्धा, ऋषि-मुनि और अवतारी पुरुष हो चुके हैं। भगवान राम ने भी यहीं जन्म लिया था। जैन मत के अनुसार यहां आदिनाथ सहित ५ तीर्थंकरों का जन्म हुआ था। अयोध्या की गणना भारत की प्राचीन सप्तपुरियों में प्रथम स्थान पर की गई है। जैन परंपरा के अनुसार भी २४ तीर्थंकरों में से २२ इक्ष्वाकु वंश के थे। इन २४ तीर्थंकरों में से भी सर्वप्रथम तीर्थंकर आदिनाथ (ऋषभदेव जी) के साथ चार अन्य तीर्थंकरों का जन्मस्थान भी अयोध्या ही है।
सरयू नदी के तट पर बसे इस नगर की रामायण अनुसार विवस्वान (सूर्य) के पुत्र वैवस्वत मनु महाराज द्वारा स्थापना की गई थी। माथुरों के इतिहास के अनुसार वैवस्वत मनु लगभग ६६७३ ईसा पूर्व हुए थे। ब्रह्माजी के पुत्र मरीचि से कश्यप का जन्म हुआ। कश्यप से विवस्वान और विवस्वान के पुत्र वैवस्वत मनु थे।
वैवस्वत मनु के १० पुत्र- इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध थे। इसमें इक्ष्वाकु कुल का ही ज्यादा विस्तार हुआ। इक्ष्वाकु कुल में कई महान प्रतापी राजा, ऋषि, अरिहंत और भगवान हुए हैं। इक्ष्वाकु कुल में ही आगे चलकर प्रभु श्रीराम हुए। अयोध्या पर महाभारत काल तक इसी वंश के लोगों का शासन रहा। पौराणिक कथाओं के अनुसार ब्रह्मा से जब मनु ने अपने लिए एक नगर के निर्माण की बात कही तो वे उन्हें विष्णु जी के पास ले गए। विष्णुजी ने उन्हें साकेतधाम में एक उपयुक्त स्थान बताया। विष्णु जी ने इस नगरी को बसाने के लिए ब्रह्मा तथा मनु के साथ देवशिल्‍पी विश्‍वकर्मा को भेज दिया। इसके अलावा अपने रामावतार के लिए उपयुक्‍त स्‍थान ढूंढने के लिए महर्षि वशिष्‍ठ को भी उनके साथ भेजा। मान्‍यता है कि वशिष्‍ठ द्वारा सरयू नदी के तट पर लीलाभूमि का चयन किया गया, जहां विश्‍वकर्मा ने नगर का निर्माण किया। स्‍कंदपुराण के अनुसार अयोध्‍या भगवान विष्‍णु के चक्र पर विराजमान है।