प्राण शून्यता मृत्यु है!

प्राणों पर संकट है। वायु में विष है। हिंदुस्थान के आकाश में धुंध है। जीवन पर संकट है। प्राणों में थरथर्राहट है। वायु प्राण है। वायु में आयु है। पूर्वज वायु को देवता जानते थे। देवता प्राय: प्रत्यक्ष नहीं होते लेकिन वायु प्रत्यक्ष देव हैं। ऋग्वेद के ऋषि की अनुभूति में वायु प्रत्यक्ष ब्रह्म है। एक मंत्र (१.९०.९) में वायु से स्तुति है, ‘नमस्ते वायो त्वमेव प्रत्यक्ष ब्रह्मासि, त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि – वायु को नमस्कार है। आप प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं। मैं आपको प्रत्यक्ष ब्रह्म कहता हूं।’ वायु के प्रति ऐसा आदर भाव दुनिया की किसी संस्कृति में नहीं मिलता। यह मंत्र-मान्यता महत्वपूर्ण है। सो यही मंत्र ऋग्वेद, यजुर्वेद, अर्थवेद व तैत्तिरीय उपनिषद् में भी आया है। वायु से जीवन है। जब तक शरीर में वायु तब तक आयु और जीवन। ऋग्वेद (१०.१६.३) में मृत जीव से प्रार्थना है ‘आपकी आखों की ज्योति सूर्य में मिले और प्राण आत्मा वायु में चले जाएं।’
वायु प्राण धारक है। वायु दो तरह की। एक हमारे भीतर स्थित हमारे प्राण का आधार है और दूसरी संपूर्ण सृष्टि में प्रवाहमान ब्रह्म की तरह सर्वत्र व्यापक वायु। यही सर्वत्र व्यापी वायु सभी प्राणियों का प्राण है। कठोपनिषद् की कथा में यम ने नचिकेता को बताया था,’ वायुर्थेको भुवनं-प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो वभूव: -यह वायु सभी भुवनों में प्रविष्ट होकर रूप रूप प्रतिरूप होता है।’ यह सभी भूतों का मधुरस भी है। वृहदारण्यक उपनिषद् में कहते हैं ‘अयं वायु: सर्वेषां भूतानां मध्वस्य, वायो सर्वाणि भूतानि मधु- यह वायु सभी प्राणियों का मधु है और सभी प्राणी वायु के मधु।’ मधु पूर्वजों का प्रिय आत्मावलंबन है। प्राणी और वायु परस्परावलम्बन में हैं। दोनों एक-दूसरे के मधु हैं। ऐसी ही अनेक मान्यताओं के कारण हम भारतवासी वायु को अतिरिक्त महत्व देते थे। वायु निर्मल थी। वायु प्रवाह में होना आनंददाता था। तब वायु प्रदूषण की बात भी नहीं थी।

भारतीय चिंतन में सृष्टि का आधार पांच महाभूत हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। हम पृथ्वी ग्रह के निवासी हैं। पृथ्वी तत्व के साथ हमारे जीवन में जल, अग्नि, वायु और आकाश भी है लेकिन वायु प्राणों का मूलाधार है। शरीर के भीतर वायु की गति ही प्राण की गति है। योग का प्राणायाम शरीर के प्रत्येक कोष को वायु पहुंचाने का विज्ञान है। शुद्ध वायु शरीर की मूलभूत आवश्यकता है। पूर्वजों ने वायु का गहन अध्ययन किया था। उन्होंने वायु को बहुवचन मरूद्गण कहा है। उन्हें रुद्र का पुत्र बताया था। ऋग्वेद के सुंदर मंत्र (७.५६.१-२) में ऋषि वशिष्ठ की जिज्ञासा है, ‘इनके जन्म के संबंध में कोई नहीं जानता।’ आगे कहते हैं ‘इनकी माता ने इन्हें अंतरिक्ष में धारण किया था। वे (अन्य देवों की तरह) ऋत सत्य धारण करते हैं।’ इस सूत्र की मजेदार बात है कि ‘वे सब पर एक समान कृपा करते हैं।’ मरुद्गण भले ही समाजवादी हैं, लेकिन वायु प्रदूषण के जिम्मेदार वंचित, गरीब कम है और अराजक औद्योगिक सभ्यता के लाभार्थी ज्यादा हैं।

वर्षा से जल है। जल से वनस्पतियां हैं। अन्न भी है। अन्न का उद्भव जल से है। गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन को बताया-पर्जन्य (वर्षा के कारक) से अन्न है-अन्नाद भवति पर्जन्या। वर्षा का उद्भव सत्कर्म हैं। सत्कर्मी जल वायु का प्रदूषण नहीं करते। ऋग्वेद (१.१६६.१) के अनुसार वायु वर्षा को तत्पर मेघों के भीतर भी उपस्थित रहते हैं।’ ऋग्वेद के पूर्वजों का ध्यान वर्षा की हरेक गतिविधि पर है। जल बरसानेवाले अनेक देवता हैं। इंद्र हैं। पर्जन्य हैं और मरुद्गण भी हैं। कहते हैं कि ‘गतिशील मरुद्गण भूमि पर दूर-दूर तक जल बरसाते हैं। वे सभी जीवों के मित्र हैं।’ (१.१६७.४) वर्षा के समय मेघों के बीच विद्युत चमकती है। आकाशीय विद्युत वायु की प्रेम प्यासी है। वह मरुतों का वरण करती है। ऋषि इस प्रेम को काव्य बनाते हैं। कहते हैं ‘मनुष्य मन पर प्रभाव डालनेवाली विद्युत ने मरुतों का वरण किया है। विद्युत भी इनके साथ चलती है।’ (१.१६७.५)

प्राचीनकाल में प्रकृति के सभी घटकों से मनुष्य की प्रीति थी। वायु शुद्ध थी। मनुष्य वायु को देवता जानते मानते थे। तब प्रदूषण का दुस्साहस सोचना भी प्रकृति के विरुद्ध अपराध था। ऋग्वेद में वायु के साथ जल कण की गति है। विद्युत की दीप्ति है। वायु के सम्बंध में यही बात ऋग्वेद की शैली में आधुनिक काल में कहनी हो तो कहेंगे ‘हे वायु देव! आपको हम आधुनिक मनुष्यों ने करोड़ों वाहनों का धुआं सौपा है। खेतों में फसल के अवशेष जलाकर विषैला बनाया है। आप इन सबका मार ढोते हुए प्रवाहित हैं। धुंध आपकी देन है। अब आपकी शक्ति पहले से बहुत ज्यादा हो गई है। आपकी धुंध के डर से वायुयान भी अव्यवस्थित है।’

महानगरों में वायु प्रदूषण की होड़ बढ़ी है। सब प्रथम रहना चाहते हैं लेकिन उलटवासी बड़ी है। महानगरवासी वायु शुद्ध चाहते हैं। शुद्ध वायु में टहलने के लाभ गिनाते हैं लेकिन वायु प्रदूषण के सारे उपद्रव करते हैं। वे परंपरा और संस्कृति के मूल्यों का मजाक बनाते हैं। स्वस्थ परंपराओं को पिछड़ापन बताते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बातें करते हैं तो भी वायु प्रदूषण रोकने के वैज्ञानिक उपायों का पालन नहीं करते। शुद्ध वायु प्रतिपल की आवश्यकता है। ऋग्वेद के ऋषि सजग थे। स्तुति है कि ‘हे मरूतो! आप सतत् गतिशील रहें, रात दिन चलें। सभी क्षेत्रों में भ्रमण करें।’ (५.५४.४) सही बात है। वायु की सघन उपस्थिति में स्फूर्ति है। जितनी गहरी शुद्ध वायु की सांस उतनी ही गहरी स्फूर्ति। वायुहीन वातायन निर्वात है। निर्वात प्राण शून्यता है और प्राण शून्यता मृत्यु है। शुद्ध वायु की अनुपस्थिति से पृथ्वी ग्रह के सामने जीवन अस्तित्व का संकट है।

वायु से वाक है। न बोल पाना अवाक कहा जाता है। भयंकर वायु प्रदूषण से भारत अवाक है। वायु से वाणी है। वायु से ही गीत उगते पैâलते हैं। वायु से संगीत है। गीत संगीत का श्रवण स्रोत भी वायु आधारित है। शब्द या ध्वनि अपनी गतिशीलता में वायुरथ से ही चलते हैं। प्राण स्पंदन का मूल वायु है। वायु प्राण है। जब तक प्राण तब तक प्राणी और तभी तक वाणी। दुर्भाग्य से हिंदुस्थान का वातायन प्रदूषित है। ऋग्वेद के पूर्वजों ने मधुवातायन की स्तुतियां की थीं, ‘मधुवाता मधु ऋतायते’ लेकिन आधुनिक काल प्रदूषण की धुंध में है। यह प्रदूषण हम सबकी ही जीवन शैली का परिणाम है। हम सब स्वयं ही इस आत्मघात के उत्तरदायी हैं। सब कुछ जानते हुए भी सतर्क नहीं हैं। प्रकृति ने लगातार चेतावनी दी है। हम प्रकृति, संस्कृति और संवैधानिक संस्थाओं की चेतावनी भी सुनने को तैयार नहीं हैं। हिंदुस्थान का भविष्य भी प्रदूषण धुंध से आच्छादित है। संकट बड़ा है।

हम आधुनिक समाज के लोग वायु प्रदूषण के खतरे से अवगत हैं। भूमंडलीय ताप की वृद्धि के परिणाम भी जानते हैं। पृथ्वी ग्रह के जीवन को बचाने की चुनौती से भी विश्व अवगत है। वायु में विष है अ‍ैर जल में भी। हम सब यह तथ्य भी जानते हैं। मूलभूत प्रश्न है कि सब कुछ जानते हुए भी हम वायु प्रदूषण में बढ़ावा देने वाले कुकर्म क्यों करते हैं? दीपावली पर करोड़ों टन पटाखे जलाते हैं। सरकारें परामर्श जारी करती हैं। हम कोई परामर्श नहीं सुनते। आखिरकार हम पृथ्वी का जीवन नष्ट करने को ही क्यों तत्पर हैं? हम आत्मघात की दिशा में ही क्यों बढ़ रहे हैं? प्रश्न बड़े हैं। हिंदुस्थान के अपने अतीत में प्रकृति के सभी घटकों को संरक्षण देनेवाली सदाबहार प्राणवान वैदिक संस्कृति थी। पर्यावरण का संवर्द्धन था। तब जल को माताएं कहा जाता था और वायु को प्रत्यक्ष ब्रह्म। समूचा प्राचीन साहित्य जल, जंगल, वनस्पति और सभी प्राणियों के प्रति प्रीति से भरापूरा है। हम सबको ऋग्वेद और उसके पूर्व से चली आ रही सांस्कृतिक परंपरा से क्यों नहीं जुड़ना चाहिए?