" /> प्रेत बनकर लोगों को डरा रहा था राजा महिध्वज : ऋषी ने रखा ये उपवास तो मिली मुक्ति

प्रेत बनकर लोगों को डरा रहा था राजा महिध्वज : ऋषी ने रखा ये उपवास तो मिली मुक्ति

अचला एकादशी आज

हर महीने पड़ने वाली एकादशी पर श्रद्धालु भगवान विष्णु का व्रत करते हैं। एकादशी व्रत सभी प्रकार की मनोकामनाओं को पूर्ण करने के लिए रखा जाता है। इस महीने भगवान विष्णु को अति प्रिय अचला एकादशी पड़नेवाली है। ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को पड़नेवाली अचला एकादशी के व्रत को सभी व्रतों में को सर्व श्रेष्ठ माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की एकादशी को अचला एकादशी मनाई जाती है। अचला एकादशी को अपरा एकादशी, भद्रकाली एकादशी और जलक्रीड़ा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा की जाती है। हिंदू धर्म में यह उपवास अत्यधिक पवित्र और मोक्ष प्राप्त करने का उत्तम माध्यम माना जाता है। इस साल यह तिथि 18 मई को पड़ रही है। यह दिन मां भद्रकाली की पूजा के लिए भी बेहद अनुकूल है क्योकि ज्येष्ठ माह में कृष्ण पक्ष की एकादशी को माता भद्रकाली प्रकट हुईं थीं। यह भी माना जाता है कि प्रभु श्रीराम से हनुमान जी की मुलाकात भी ज्येष्ठ माह में ही हुई थी। इसलिए इस एकादशी पर उपवास कर भगवान विष्णु की आराधना करने से समस्त पापों से मुक्ति मिलती है। इस व्रत के प्रभाव से प्रेत बाधा कभी परेशान नहीं करती। साथ ही इंसान को मोक्ष की प्राप्ति भी होती है। अचला एकादशी का व्रत करने से सभी तरह के पापों और कष्टों का नाश होता है। घर में धन-धान्य की कमी नहीं होती है। माना जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से अपार धन-दौलत की प्राप्ति होती है।

अपरा / अचला एकादशी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार एक राज्य में महीध्वज नाम का बहुत ही धर्मात्मा राजा था। राजा महीध्वज जितना सच्चा और ईमानदार था उसका छोटा भाई वज्रध्वज उतना ही पापी था। वज्रध्वज बड़े भाई महीध्वज से चिढ़ता था। एक बार वह अपने मंसूबे में कामयाब हो गया और महीध्वज को मारकर उसे जंगल में फिंकवा देता है।
असमय मौत के कारण महीध्वज को प्रेत का जीवन जीना पड़ता है। वो पीपल के पेड़ पर रहने लगता है। उसकी मृत्यु के बाद राज्य में उसके दुराचारी भाई से तो प्रजा दुखी थी ही साथ ही अब महीध्वज भी प्रेत बनकर आने जाने वाले को दुख पंहुचाने लगा था। एक बार एक ज्ञानी ऋषि वहां से गुजर रहे थे। उन्हें आभास हुआ कि कोई प्रेत उन्हें तंग करने का प्रयास कर रहा है। अपने तपोबल से उन्होंने उसे देख लिया और उसका भविष्य सुधारने का जतन सोचने लगे। सबसे पहले उन्होंने प्रेत को पकड़कर उसे अच्छाई का पाठ पढ़ाया फिर उसके मोक्ष के लिए स्वयं ही अपरा एकादशी का व्रत रखा। खुद व्रत और संकल्प लेकर अपने व्रत का पुण्य प्रेत को दान कर दिया। इस प्रकार उसे प्रेत जीवन से मुक्ति मिली और बैकुंठ गमन कर गया।

अपरा / अचला एकादशी पूजा विधि
1. इस दिन सुबह जल्‍दी उठें स्नान करके व्रत का संकल्प लें।
2. भगवान विष्णु की धूप, दीप, फल, फूल, तिल आदि चढ़ा कर पूजा करें।
3. पूरे दिन निर्जल उपवास करें। अगर ना हो पाए तो 1 समय पानी और 1 फल खा सकते हैं।
4. पारण के दिन भगवान की दुबारा पूजा, कथा और पाठ करें।
5. कथा समाप्‍त करने के बाद प्रसाद बाटें तथा ब्राह्मण को भोजन खिला कर दक्षिणा देकर भेजना चाहिये।
6. बाद में आप व्रत खोल कर भोजन कर सकते हैं।
7. व्रत वाले दिन ‘ओम नमो नारायण’ मंत्र का जाप करें। साथ में मन को शांत करने के लिये प्रभु के नाम को दोहराएं।

अचला / अपरा एकादशी तिथि-
अचला एकादशी – 18 मई 2020
एकादशी तिथि प्रारंभ – 12:42 PM 17 मई को
एकादशी तिथि समाप्त – 03:08 PM 18 मई को
अचला एकादशी पारण का समय – 05:28 AM से 08:12 AM तक