प्लेट से गायब होगी पाप्लेट, झींगा भी दे रहा है धोखा

कहते हैं कि किसी भी कार्य को लेकर अति नहीं करनी चाहिए वरना उसके दुष्परिणामों को भुगतना पड़ता है। वो दिन दूर नहीं जब मुंबईकरों की पसंदीदा पाप्लेट मछली उनके प्लेट से गायब हो जाएगी और झींगा भी धोखा देगा। मुंबई सहित राज्य में मछली मारने के लिए प्रतिबंधित ट्रालर्स और बारीक जालों का इस्तेमाल इस कदर हो रहा है कि बड़ी मछलियों के साथ-साथ उनके बच्चे भी मछुआरों के शिकार हो रहे हैं। जानकारों की मानें तो मछुआरों के इस कृत्य से समुद्र के परिस्थितिकी तंत्र का विनाश हो रहा है। आनेवाले दिनों में समुद्र में मछलियों की कमी देखने को मिल सकती है।
बता दें कि वो दिन दूर नहीं जब मुंबई और महाराष्ट्र के तट पर मछलियों का टोटा (कमी) होगा। समुद्र में अवैध तकनीक व उपकरणों का इस्तेमाल कर मछली मारने से मछलियों के बच्चे तक मारे जा रहे हैं। गौरतलब है कि मछली मारने में २.८ टन के साथ महाराष्ट्र देश में पहले पायदान पर है लेकिन यह बात भी सत्य है कि मछलियों के बच्चों को मारने में लगभग ५० प्रतिशत हाथ मुंबईकरों का है। वर्ष २०१८ में मछली मारने के दौरान ४० प्रतिशत पाप्लेट, ४० प्रतिशत धोमा, ४० प्रतिशत सुरमई, २८ प्रतिशत शिंगाड़ा और ४० प्रतिशत तक बांगड़ा के बच्चे पकड़े जाने की जानकारी केंद्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (सीएमएफआरआई) ने दी है। सीएमएफआरआई के मुताबिक राज्य में अल्पायु मछली मारने के कारण गत वर्ष ६८६ करोड़ रुपए का आर्थिक नुकसान हुआ है। राष्ट्रीय पर्ससिएन फिशरमैन वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष गणेश नखावा ने कहा कि सरकार ने तीन वर्ष पहले ही मछली मारने के लिए ४० मिलीमीटर के गैपवाली वर्ग नेट का इस्तेमाल करने का आदेश दिया था, ताकि अल्पायु मछलियां जाल में न फंसे लेकिन अब भी राज्य में कई मछुआरे २० एमएम की डायमंड नेट का इस्तेमाल कर रहे हैं। अवैध तकनीक का इस्तेमाल कर समुद्री जीवों के चक्र को तोड़ने का कार्य जारी है। अब बड़ी मछलियों के साथ उनके बच्चे भी पकड़े जाएंगे तो समुद्र में मछलियां कम होती चली जाएंगी। ऊपर से कभी चीनी ट्रालर्स तो कभी गुजरात के ट्रालर्स का अवैध तरीके से राज्य के समुद्री क्षेत्र में घुसकर मछली मारना अब मछलियों के लिए खतरनाक होता जा रहा है।
अल्पायु मछली पकड़े जाने से आर्थिक घाटा
अल्पायु मछलियां बनती हैं चारा
गणेश नखावा ने कहा कि महाराष्ट्र में अल्पायु मछली पकड़ने का कार्य जोरों पर है क्योंकि इसके काफी अच्छे पैसे मिलते हैं। मछुआरे अल्पायु मछलियों को पकड़ कर उन्हें बेच देते हैं, जिसके बाद नन्हीं मछलियों का पाउडर बनाकर उन्हें तालाब और नदी में मौजूद मछलियों के चारे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। सरकार कानून तो बना रही है लेकिन उसे सख्ती से अमल करने में नाकाम साबित हो रही है। यदि ऐसा ही चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब समुद्र में मछलियों के लिए दर-दर भटकना होगा।
पाप्लेट – २२०-२८० करोड़
धोमा- ६०-१५० करोड़
सुरमई- ५०-१२० करोड़
शिंगाड़ा- २०-४० करोड़
बांगड़ा- १ से ६ करोड़