फितना फैलाना कत्ल से भी बड़ा गुनाह है

क्या मुसलमान अपने वतन से प्यार नहीं करते? क्या मुसलमान देशद्रोही होते हैं? क्या इस्लाम में देशप्रेम जैसी कोई संकल्पना नहीं है? मुसलमानों की वतनपरस्ती को लेकर आज भी ऐसे कई सवाल अक्सर उठते हैं। मुस्लिम समाज के लिए हमेशा से यह चिंता की बात रही है। सर्जिकल स्ट्राइक, पुलवामा, बालाकोट और अभिनंदन प्रकरण के बाद यह सवाल एक बार फिर से मुस्लिम समाज को कटघरे में खड़ा कर रहा है। देशप्रेम पर पवित्र वेद में आदेश है ‘हम अपने देश के जागृत पुरोहित बनें।’ पवित्र कुरआन में निर्देशित किया गया है कि ‘इंसान जिस मुल्क में, समाज में रहता है वहां शांति और अमन के साथ रहे और वहां फितना न पैâलाए।’ पवित्र कुरआन के अनुसार ‘फितना पैâलाना कत्ल से भी बड़ा गुनाह है।’ (-अल-कुरआन- २:१९१) चाणक्य की एक प्रसिद्ध उक्ति है, ‘देश की सीमा मां के वस्त्रों की तरह होती है जिसकी हिफाजत करना उसके प्रत्येक बेटे का कर्तव्य है।’ साफ-साफ कहें तो यह बात दावे से कही जा सकती है कि इस्लाम की तालीम अपने वतन और हमवतनों से मोहब्बत करने, उसकी तरक्की के लिए जी तोड़ मेहनत करने और साहिबे-हुकूमत का अनुपालन करने की सीख देती है।
पैगंबर मोहम्मद साहब की हदीस है, ‘यकीनन अल्लाह उस शख्स को नापसंद करता है जो अपनी कौम पर हमला होने की सूरत में उनका प्रतिकार नहीं करता।’ यहां कौम की मुराद मुसलमान या किसी समाज या पंथ से नहीं बल्कि अपने वतन से है। इसे और आसानी से समझना हो तो पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के एक उदाहरण से समझा जा सकता है। नबी-ए-करीम हजरत मोहम्मद साहब ने जब मक्का में पैâले कुशासन और जुल्म-ओ-ज्यादती का विरोध कर मानवहित की सलामती और इस्लाम अर्थात शांति स्थापित करने की बात की तब मक्का वासियों ने उन पर जुल्म-ओ-सितम की इंतेहा कर दी। कष्ट असह्य हो जाने पर मोहम्मद साहब ने अपने चुनिंदा साथियों के साथ मक्का से हिजरत करने का पैâसला किया। हजरत मोहम्मद साहब मक्का छोड़कर जाते वक्त बार-बार मुड़कर अपने वतन की तरफ देखते जाते थे। जब मक्का उनकी आंखों से ओझल होने को आया तो बेहद गमगीन होकर उन्होंने अपने वतन से मुखातिब होकर कहा, ‘हे मक्का! तू कितनी पवित्र धरती है, मेरी नजर में तू कितनी प्यारी है, अगर मेरी कौम मुझे न निकालती तो मैं कभी तुझे छोड़कर न जाता।’ हालांकि मोहम्मद साहब के रिश्तेदारों, उनके कबीले और उनकी कौम ने उनको, उनकी तालीम को, उनके संदेश को ठुकरा दिया था, इसके बाबजूद वह ईश्वर से हर वक्त अपने वतन और अपने उम्मतियों की शांति और सलामती की दुआ करते रहे। यह बात पवित्र कुरआन और हदीसों से साबित होती है। मक्का से नबी का प्रेम क्या देशप्रेम नहीं कहा जाएगा? मक्का की सीमाओं को पार करते वक्त की भावनाओं को नबी की कातर दुआओं से क्या महसूस नहीं किया जा सकता? तो फिर उनके उम्मती भारतवर्ष की सीमाओं को अपना वतन क्यों न मानें? क्या हिंदुस्थान का मुसलमान किसी अन्य ग्रह से आया है जो अपने नबी की सुन्नत से मुकर जाए?
हिंदुस्थान सूफी संतों का देश है। सूफियाना मिजाज के हजरत अमीर खुसरो के बारे में कहा जाता है कि वो ऐसे राष्ट्रवादी मुसलमान थे जिनके मन में भारतभूमि के प्रति अपार श्रद्धा थी। ‘नूहे-सिफर’ नामक उनके महाकाव्य में हिंदुस्थान के प्रति उनकी भक्ति-भावना साफ झलकती है। उनकी रचनाएं बताती हैं कि कम से कम उनके समय तक हिंदुस्थान दुनिया के देशों का सिरमौर था। खुसरो ने खुरासान, तुर्की, बसरा, चीन, समरकंद, मिस्र, कंधार इन सबको हिंदुस्थान भूमि की तुलना में कमतर बताया है। फिर अपने काव्य में खुसरो ने यह भी लिखा है कि ‘कोई मुझसे ये पूछ सकता है कि तू मुसलमान होकर हिंदुस्थान की बड़ाई क्यों करता है? तो मेरा जवाब होगा क्योंकि हिंद मेरी जन्मभूमि है और मेरे रसूल का ये हुक्म है कि ‘हुब्बुल वतनी निस्फुल ईमान’ यानी ‘वतनपरस्ती आधा ईमान है।’ हजरत अमीर खुसरो हजरत निजामुद्दीन औलिया के शागिर्द थे। ‘छाप तिलक सब छीनी’, ‘आज रंग है री मां’ जैसी कालजयी और विशुद्ध हिंदुस्थानी रचना उन्हीं की देन है। अगर वतनपरस्ती की बात करें तो हिंदुस्थान से बेइंतहा मुहब्बत करनेवाले मुसलमानों में अमीर खुसरो का नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा। ऐसे में अगर कोई वतनपरस्ती को कुप्रâ कहे तो फिर हजरत अमीर खुसरो से बड़ा काफिर कोई नहीं लेकिन ठहरिए, अब इस काफिर का क्या मकाम है? इस उदाहरण से समझ लीजिए। हजरत निजामुद्दीन औलिया ने एक बार कहा था, ‘कयामत के रोज खुदा अगर मुझसे पूछेगा कि निजामुद्दीन तू तोहफे में मेरे लिए क्या लेकर आया है तो मैं अमीर खुसरो को पेश कर दूंगा?’ अगर वतनपरस्ती कुप्रâ है तो क्या आला दर्जे के सूफी-संत निजामुद्दीन औलिया, अल्लाह को बतौर तोहफा एक नाफरमान को पेश करेंगे?
दरअसल मुस्लिम समाज पर शक-ओ-शुबहात के दुर्भाग्य की काली छाया तबसे पड़नी शुरू हुई जब मजहब को अपनी राजनीति के रूप में इस्तेमाल करनेवालों ने मुसलमानों के मन में ये बात डालनी शुरू कर दी कि ‘मुसलमान किसी देश की सीमा से बंधे नहीं होते। सारा विश्व उनका है इसलिए उनकी निष्ठा केवल एक मुल्क के प्रति नहीं होनी चाहिए।’ हिंदुस्थान में भी अंग्रेजों से आजादी मिलने के पूर्व ही इस्लामिक मुल्क का खाका बन गया था। मजहब के नाम पर पाकिस्तान बना लेकिन मुसलमानों की बड़ी आबादी ने इस्लामी मुल्क पाकिस्तान की बजाय हिंदू बहुल हिंदुस्थान को अपने वतन के रूप में प्राथमिकता दी और उसे अपनी पसंद से चुना। यह अपने हिंदुस्थान से मोहब्बत की इंतेहा थी। हालांकि चंद गद्दार पाकिस्तान के प्रति अपनी निष्ठा और प्रेम पर कायम रहे। उनके इस कृत्य पर आम मुसलमान, उलेमा और मुस्लिम बुद्धिजीवी न जाने क्यों खामोश रहे। ऐसे में हमवतनों के एक बड़े तबके की नजर में अधिकांश भारतीय मुसलमानों की निष्ठा संदिग्ध, संदेहास्पद और विवादित हो गई। ऐसे तबके का मानना था कि पाकिस्तान के अलग होने के बाद भी यहां के मुसलमान इस देश के प्रति पूर्ण रूप से वफादार नहीं हैं। मुसलमानों के बारे में ऐसी सोच को बदलने के लिए मुसलमानों को ही प्रयास करना होगा। इन बातों को क्या लड़कर मनवाया जा सकता है? वतन से मोहब्बत का जज्बा मुस्लिम समाज के व्यवहार में, आचरण में, चरित्र में परिलक्षित होना चाहिए। मुस्लिम समाज के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह अपने हमवतन भाइयों को यह बताएं कि उनके मन में भी अपने महान पूर्वजों को लेकर वही सम्मान भाव है जो किसी आम हिंदू के हैं। अपने जज्बे और जूनून से यह बताना होगा कि वतन पर आया संकट उनका अपना संकट है। यह संकट उनकी रातों की नींद और दिन का चैन छीन लेता है। वह भी अपने मुल्क की हिफाजत करते हुए अपने सीने पर गोलियां खाने का माद्दा रखते हैं। अपने हमवतनों को यह विश्वास भी दिलाना होगा कि उन्हें भी इस मुल्क के निजाम और कानून पर उतना ही भरोसा है जितना किसी अन्य को। अफसोस इसी बात का है कि आज भी चंद गद्दारों के कारण आम मुसलमान भी अविश्वास की इस दीवार को लाख प्रयासों के बावजूद नहीं गिरा पा रहा है।
दुनिया का कोई इस्लामी मुल्क क्या अपने वतन को किसी दूसरे इस्लामी मुल्क से कमतर मानने को तैयार है? कत्तई नहीं। हर इस्लामी मुल्क के लिए उनकी पहली प्राथमिकता अपने वतन की हिफाजत, उसकी तरक्की और अपने देशवासियों की खुशहाली है। तस्वीर के दूसरे रुख पर अगर गौर करें तो पाएंगे कि यह वतनपरस्ती का भाव ही तो है कि सऊदी अरब या गल्फ के इस्लामी देशों का कोई मुसलमान किसी पाकिस्तानी को अपने वतन में आकर पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे नहीं लगाने देता या फिर कोई पाकिस्तानी ही किसी अन्य मुस्लिम राष्ट्र के नागरिक को पाकिस्तान आकर उस राष्ट्र के जिंदाबाद का नारा लगाने देगा? अगर मुस्लिम मुल्कों के लिए इस्लाम ही सब कुछ होता तो आज खाड़ी देश बांग्लादेशी मुसलमानों को अपने मुल्क से निकल जाने का हुक्म न देते। मुस्लिम समाज को इस्लामी तालीम के अनुसार इस भाव को आत्मसात करना होगा कि ‘अगर वतन है तो हम हैं और वतन नहीं तो हम भी नहीं।’ वतनपरस्ती कभी भी इस्लाम प्रेम में बाधा नहीं बन सकती। मुस्लिम समाज को समझना होगा कि हमारी पूजा-पद्धति कोई भी हो, धर्मग्रंथ कोई भी हो पर हमारी निष्ठा का केंद्र यही हो कि यह ‘मेरा अपना वतन’ है। मेरे वतन के सभी महापुरुष मेरे अपने हैं। उनके प्रति सम्मान प्रदर्शित करना देशभक्ति है।’ सही इस्लाम की शिक्षा और हिंदुस्थानी रवायत के अनुसार इबादत के साथ वतनपरस्ती ‘निस्फ’ आधे ईमान को ‘मुकम्मल’ पूर्ण बनाती है, न कि कम करती है।