बंद हुआ शरबत, नींबू पानी, जनता को हो रही परेशानी, गर्मी में स्टेशन पर यात्रियों का हंगामा

कुर्ला रेलवे स्टेशन पर नींबू पानी बनाने में गड़बड़ी का खुलासा होने के बाद रेलवे प्रशासन ने मध्य रेलवे के सभी स्टेशनों पर नींबू पानी, रसना, कोकम का शरबत आदि को बेचने पर पाबंदी लगा दी है। स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर लगाई गई इस पाबंदी के चलते भारी गर्मी का सामना कर रहे यात्री शरबत न मिलने से अब अस्वस्थ्य होने लगे हैं। ५ रुपए की जगह अब उन्हें २० से ४० रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं। इसको लेकर यात्रियों तथा स्टेशनों पर स्टॉल चलानेवालों के बीच न केवल वाद-विवाद होने लगा है बल्कि स्टेशन पर तैनात अधिकारी भी यात्रियों के आक्रोश का शिकार होने लगे हैं। इस तरह की रिपोर्ट मध्य रेलवे के कई स्टेशनों से आने लगी है।

गलती एक की, भुगत रहे सारे
उल्लेखनीय है कि दो सप्ताह पूर्व कुर्ला रेलवे स्टेशन के आस-पास नींबू पानी का शरबत बनाने का एक वीडियो वायरल हो गया था। वीडियो में जिस तरह से शरबत बनाया जा रहा था वह बेहद परेशान, हैरान एवं विचलित कर देनेवाला था। इसी आधार पर रेलवे प्रशासन ने उस स्टॉल का न केवल लाइसेंस निलंबित कर दिया बल्कि मध्य रेलवे के सभी स्टेशनों के करीब ३०० स्टॉलों पर सभी तरह के शरबत बनाने एवं बेचने पर रोक लगा दी। रेलवे प्रशासन द्वारा जनहित में उठाए गए इस कदम को दो सप्ताह गुजर गया। यह प्रतिबंध हमेशा के लिए लगा दिया गया है या इसका प्रयोग किया जा रहा है, इसका खुलासा अभी तक नहीं किया जा रहा है। नींबू पानी तथा कोकम का शरबत पीकर तरोताजागी महसूस करनेवाले यात्री अब भीषण गर्मी से परेशान होकर आक्रोशित होने लगे हैं।

क्या कहना है यात्रियों का?
ठाणे स्टेशन पर पसीने से तर-बतर कुछ यात्री एक स्टॉलवाले से नींबू शरबत या कोकम शरबत बनाने की मांग कर रहे थे। स्टॉलवाले ने पाबंदी का हवाला देकर शरबत बनाने से मना कर दिया। इस पर आक्रोशित एक यात्री ने गाली दी और कहा कि पिछले सप्ताह राजधानी एक्सप्रेस में खाना खाकर २० यात्री बीमार हो गए थे। क्या रेलवे ने सभी गाड़ियों में मिलनेवाले घटिया खाद्य पदार्थों को बंद कर दिया है? कुर्ला में शरबत बनाने का वीडियो अगर वायरल नहीं होता तो क्या रेलवे अधिकारी तब भी सभी तरह के शरबतों पर प्रतिबंध लगाते? गलत तरीके से नींबू शरबत बनाते हुए पकड़ा गया है तो नींबू शरबत के साथ कोकम तथा रसना के शरबत पर पाबंदी क्यों लगाई गई? पांच रुपए में मिलनेवाले इन शरबतों को पीकर हम जैसे गरीब और मध्यमवर्गीय लोग अपनी प्यास और गर्मी को शांत कर लेते हैं। इसके लिए अब हमें २० या ४० रुपए खर्च कर कोल्ड्रिंक लेना पड़ रहा है। रेलवे प्रशासन मध्यमवर्गीय लोगों की जरूरतों पर क्यों ध्यान नहीं दे रहा है? रेलवे स्टेशनों पर बिकनेवाले शरबत अगर हानिकारक हैं तो वेस्टर्न रेलवे के स्टेशनों पर बिकनेवाले शरबतों को अभी तक क्यों नही बंद किया गया है? रेलवे का फूड सेफ्टी विभाग क्यों सोया रहता है? वह स्टेशनों पर बिकनेवाले खाद्य एवं पेय पदार्थों की जांच लगातार क्यों नहीं करता है? एक यात्री ने तो यहां तक कह दिया कि कोल्ड्रिंक की ज्यादा बिक्री के लिए रेलवे अधिकारी तथा कोल्ड्रिंक बनानेवाली कंपनियों के बीच सांठगांठ हो गई है। दर्जनों की संख्या में आक्रोशित यात्रियों के सवालों का जवाब देने की बजाय स्टालचालक मूकदर्शक बना सब कुछ सुनता रहा। इसके बाद आक्रोशित यात्रियों का एक समूह इन सवालों के साथ स्टेशन मास्टर कार्यालय में चला गया। स्टॉलचालक का कहना था कि जबसे गर्मी की शुरुआत हुई है, वह लोगों की रोज गालियां खा रहा है।

कैंटीनवालों के साथ तू-तू, मैं-मैं
यात्रियों को देने पड़ रहे हैं ज्याद पैसे
यात्री कर रहे हैं उल्टा-सीधा सवाल