बगदादी तो मर गया आतंक कब मरेगा?

आईएसआईएस सरगना अबू बकर अल-बगदादी की मौत की खबर ने पिछले दिनों पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित किया। ओसामा बिन लादेन के बाद आतंक का पर्याय बने अल-बगदादी की मौत की खबर से खासकर उन देशों ने कुछ हद तक राहत की सांस ली है, जिन देशों में आईएसआईएस ने कहर बरपा रखा है। अमेरिकी सरकार ने अल-बगदादी के सिर पर ढाई करोड़ अमेरिकी डॉलर का इनाम रखा था। आईएसआईएस के साथ आतंकविरोधी देशों की तरफ से छेड़ी गई लंबी जंग के दौरान कई बार अल-बगदादी के मारे जाने की खबर आई। अबू बकर अल-बगदादी न सिर्फ आतंकी संगठन आईएसआईएस का मुखिया था बल्कि उसने खुद को विश्व भर के मुसलमानों का खलीफा घोषित कर रखा था। अबू बकर अल-बगदादी के नेतृत्व में आईएसआईएस ने इराक और सीरिया के बड़े इलाकों को अपने कब्जे में ले लिया था। इस इलाके में आईएसआईएस ने कट्टरपंथी विचारधारा को बड़ी क्रूरता से लागू किया और इस्लामिक कानून अर्थात शरिया से चलनेवाली सरकार की स्थापना की।
आईएसआईएस द्वारा गलत तरीके से इस्लाम के नाम पर पैâलाई गई कट्टरपंथी विचारधारा से आकर्षित होकर धीरे-धीरे कई देशों के भटके हुए नौजवान आईएसआईएस की तरफ आकर्षित हुए और उससे जुड़ गए। दुनिया में पनप रहे कई आतंकवादी संगठन भी आईएसआईएस से जुड़े और उन्होंने स्वयंघोषित खलीफा बगदादी के नेतृत्व को स्वीकार कर लिया। इसके बाद बगदादी के नेतृत्व में आईएसआईएस ने इराक और सीरिया के अलावा दुनिया के कई हिस्सों में आतंकवादी हमलों को अंजाम दिया। अल-बगदादी पूरी दुनिया के लिए आतंक का सबसे डरावना चेहरा बन गया। अल-बगदादी की करतूतों से चौदह सौ वर्षों के इतिहास में इस्लाम की ऐसी विकृत व्याख्या कभी सामने नहीं आई। अल-बगदादी ने अपनी राजनीति साधने और अपना वर्चस्व बनाने के लिए आतंकी संगठनों और आतंकियों के साथ ही मानो पूरे इस्लाम पर कब्जा कर लिया। एक तरह से २१वीं सदी में इस्लाम को दुनिया का सबसे बड़ा दुश्मन बनाने में बगदादी की बड़ी भूमिका रही। अल-बगदादी अपनी धार्मिक कट्टरता और आतंक के कारण सारी दुनिया की खबरों में छाया रहा। उससे पहले ओसामा बिन लादेन अमेरिका पर आतंकी हमले के कारण सबसे बड़े आतंकवादी के रूप में जाना जाता था। लेकिन अल-बगदादी और उसके संगठन दुनियाभर में आतंकी हमले करके अपनी बर्बरता के दृश्य रिकॉर्ड करते और अपनी वेबसाइट पर पोस्ट करते रहते। इन दृश्यों की वीभत्सता और बगदादी की कट्टरपंथी सोच ने एक आतंकी के रूप में ओसामा को भी पीछे छोड़ दिया। अल बगदादी का संगठन आईएसआईएस अलकायदा से भी कई गुना अधिक कट्टरपंथी और आतंकी सिद्ध हुआ। कहने में हर्ज नहीं कि आईएसआईएस कट्टरपंथी आतंकवाद का वो चेहरा है, जिसके आधार पर तालिबान, अलकायदा, बोको हरम, अल-शबाब जैसे संगठन भी उपजे हैं।
दुनियाभर में अल-बगदादी की मौत को लेकर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ ने इसे आतंकवाद के खिलाफ बड़ी जीत बताया तो कुछ सरकारों ने इसे बहुत तवज्जो नहीं दी। सऊदी अरब, तुर्की, अफगानिस्तान, मिस्र सहित अनेक मुस्लिम देशों ने अल-बगदादी की मौत को आतंकवाद से निपटने की दिशा में बेहद अहम कदम बताया। हालांकि ईरान की प्रतिक्रिया इनसे थोड़ी अलग रही। ईरान के सूचना मंत्री मोहम्मद जावेद जरीफ के अनुसार अल-बगदादी की मौत कोई बहुत बड़ी बात नहीं है क्योंकि अमेरिका ने अपने ही जीव को मारा है। दरअसल ईरान अक्सर अमेरिका पर आईएसआईएस को पैदा करने का आरोप लगाता रहा है। ईरान और अमेरिका के कटु रिश्ते से पूरी दुनिया वाकिफ है। हालांकि इस्लामी देशों के सम्मानित देश सऊदी अरब ने अल-बगदादी को इस्लाम की असली छवि बिगाड़नेवाला बताया और अपराधों को अंजाम देनेवाले आतंकी संगठन के सदस्यों के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई की सराहना की। अल-बगदादी की मौत से आतंकवाद खत्म हो जाएगा, ऐसा दावा करना मूर्खता होगी। जिन कारणों ने अल-बगदादी को पैदा किया, यदि उनका हल नहीं निकलता तो कब दूसरा ओसामा या अल-बगदादी उठा खड़ा हो, कहा नहीं जा सकता। बगदादी प्रकरण के बहाने उन प्रश्नों पर विचार करने की जरूरत है जो कि अत्यंत गंभीर हैं। इंसानियत की सुरक्षा और सही इस्लाम की शिक्षा के लिए उनका उत्तर तलाश करना भी जरूरी है। एक प्रश्न तो यह है कि आखिर इस इक्कीसवीं सदी में एक बड़े मुस्लिम युवा वर्ग में कट्टरपंथी अल-बगदादी जैसे व्यक्ति और उसके द्वारा कायम की गई स्वघोषित इस्लामी खिलाफत के प्रति उत्साह, आकर्षण और सम्मान वैâसे पनपता है? अपना घर-परिवार, अपना करियर दांव पर लगाकर आतंकवादी संगठनों में शामिल होने का जज्बा आखिर वैâसे और क्यों पैदा हो जाता है? एक प्रश्न यह भी है कि क्या अल बगदादी और आईएसआईएस के खात्मे के पश्चात इस्लाम के नाम पर पैâलाए जा रहे आतंकवाद का भी खात्मा हो जाएगा? वैसे तो अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने आईएसआईएस के खिलाफ वर्षों से जंग छेड़ रखी थी लेकिन सालों तक वे उस समूह पर काबू नहीं पा सके। आईएसआईएस के आतंकवादी आज भी कई जगहों पर पैâले हुए हैं और दुनिया के लिए एक चुनौती बने हुए हैं। इराक में इस्लामिक संगठन से जुड़े लड़ाके अमेरिका समर्थित फौजों से लड़ाई हार चुके हैं, इस वजह से अब वो गुरिल्ला वॉर के हथकंडों पर लौट आए हैं। ऐसा नहीं है कि अमेरिकी फौजों के हमले के बाद से इस्लामिक संगठन के वैंâप बंद हो गए हों, ये वैंâप अब भी वहां चल रहे हैं। आईएसआईएस के लगभग दो हजार आतंकी अपहरण, बलात्कार और अन्य हिंसक गतिविधियों से जुड़े हुए हैं।
दरअसल मुस्लिम शासकों और साम्राज्यों ने अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी की प्रगतिशील सभ्यता को और औद्योगिक क्रांति को नहीं पहचाना। उस दौर में जब वैज्ञानिक विजन, लोकतांत्रिक राजनीति और आधुनिक अर्थव्यवस्था पर आधारित समाज की संरचना तैयार हो रही थी, तब भी उसके विपरीत जाकर मुस्लिम सभ्यता बादशाही और सामंतवादी मूल्यों पर आधारित बनी रही। पवित्र ग्रंथ कुरआन की असल शिक्षा से मुंह मोड़कर अलग-अलग विचारों के जरिए इस्लाम को अपनी जेब में रखनेवाले कथित उलेमा की किताबों के आईने में धर्म की व्याख्या होती रही। ऐसे में मुसलमान धर्म और मूल्यों के आधार पर दुनिया से ज्यादा कटने लगा। हालांकि बड़ी चालाकी से उन मूल्यों को धार्मिक लबादा ओढ़ाकर मुसलमानों को बरगलाया गया। कुरआन ने ‘इकरा’ यानी ‘पढ़’ की सीख दी लेकिन हुक्मरानों द्वारा मुसलमानों को आधुनिक और समाजोपयोगी शिक्षा से दूर रखने की तमाम कोशिशें हुर्इं। आज भी अनेक मदरसों में आधुनिक शिक्षा को लेकर उदासीनता है। ऐसे में बौद्धिक विकास में काफी पीछे छूटे मुस्लिम युवावर्ग को कट्टरपंथ की अफीम का नशा देना आसान होता गया और ओसामा और अल बगदादी जैसी नकारात्मक सोच ने अपने पैर पैâलाए। समस्या इस्लाम या मुसलमानों की नहीं है, समस्या उस शिक्षा की है जहां धर्म के नाम पर हिंसा को जायज और जिहाद को जन्नत का मार्ग बताया जा रहा है। होना तो यह चाहिए था कि कुरआन की सर्वशिक्षा को आम कर मानवीय आधार पर सार्वभौमिक और आधुनिक शिक्षा के साथ कदम से कदम मिलाकर चला जाता। अगर आगे भी ऐसा नहीं हुआ तो ओसामा और अल बगदादी के मारे जाने से क्या होगा? अभी भी मसूद अजहर जैसी विचारधारा मौजूद है और आतंक को धर्म के नाम पर जायज ठहरा सकती है।