" /> बच्चों के चरित्र निर्माण में अमित छाप छोड़ेगा क्रांतिकारियों की गौरवशाली स्मृतियों का उपवन-अजिताभ दुबे

बच्चों के चरित्र निर्माण में अमित छाप छोड़ेगा क्रांतिकारियों की गौरवशाली स्मृतियों का उपवन-अजिताभ दुबे

देवी पाटन मंडल मुख्यालय गोंडा को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों की चित्र और उनकी गौरवपूर्ण वीरता के बखान से आकर्षक बनाने की कवायद शुरू हो गई है। लखनऊ रोड स्थित मंडेनाला फोरलेन के बीचों-बीच डेल्टा पर क्रांति उपवन नाम से एक मनोरम स्थल बनाए जाने की योजना पर विचार चल रहा है, जो आजादी की पहली लड़ाई के कुछ गौरवशाली पलों की याद दिलाएगा। भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष व गोंडा के सांसद ब्रजभूषण शरण सिंह के पुत्र सदर विधायक प्रतीक भूषण सिंह ने बताया कि इसकी रूपरेखा बनाई जा रही है। सब कुछ ठीक रहा तो अगस्त में ही इस परिकल्पना को यथार्थ के पटल पर उतारा जाएगा। उन्होंने बताया कि 1957 में भारत सरकार ने प्रथम क्रांति के आठ क्रांतिकारियों की चित्रमाला जारी की थी। उस ऐतिहासिक स्मारक चित्र को भी इसमें स्थान दिया जाना है। जनपद के वरिष्ठ साहित्यकार व प्रमुख शिक्षण संस्थान के निदेशक अजिताभ दुबे के अनुसार सरकार द्वारा जारी चित्रमाला में उन आठ क्रांतिकारियों के चित्र हैं, जिनसे ब्रिटिश साम्राज्य थर्राता था। जिनमें बहादुरशाह जफर, मंगल पांडे, बेगम हजरत महल, तात्या तोपे, नानासाहेब, कुंवर सिंह, रानी लक्ष्मीबाई और गोंडा के राजा देवीबख्श सिंह का चित्र शामिल है। इस उपवन में जब बच्चे आएंगे तो उन्हें अपने इतिहास की जानकारी मिलेगी। उन्होंने कहा कि बच्चों के आंखों में बालपन में किसी भी चित्र की जितनी सुंदर अनुभूति बन जाती है, उनमें उतने ही सुंदर चरित्र का निर्माण हो जाता है। अंतिम मुगल शासक बहादुरशाह जफर की देशभक्ति के अनेक किस्से मशहूर हैं। ब्रितानिया शासक ने इन्हें रंगून में कैद कर रखा था, जहां उनकी मौत हो गई। मंगल पांडे ईस्ट इंडिया कंपनी की 19वीं इन्फेंट्री के सिपाही थे। उन्होंने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में महती भूमिका निभाई थी। अंग्रेजी शासन ने इन्हें बागी करार दिया था। बाद में इन्हें फांसी दे दी गई थी।बेगम हजरत महल अवध की बेगम के नाम से भी प्रसिद्ध थीं, वे अवध के नवाब वाजिद अली शाह की दूसरी पत्नी थीं। अपनी रियासत बचाने के लिए उन्होंने 1857 के ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ विद्रोह किया। नेपाल में शरण के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। तात्या टोपे भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के प्रमुख सेनानायक थे। सन् 1857 के महान विद्रोह में उनकी भूमिका सबसे महत्वपूर्ण, प्रेरणादायक और बेजोड़ थी। नानासाहेब प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के शिल्पकार थे। उनका मूल नाम ‘धोंडूपंत’ था। स्वतंत्रता संग्राम में नानासाहेब ने कानपुर में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोहियों का नेतृत्व किया। खास बात ये रही कि अंग्रेज अंत तक उनकी गिरफ्तारी करने में सफल नहीं रहे। कुंवर सिंह प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सिपाही और महानायक थे। अन्याय विरोधी व स्वतंत्रताप्रेमी बाबू कुंवर सिंह कुशल सेनानायक थे। उनको 80 वर्ष की उम्र में भी लड़ने तथा विजय हासिल करने के लिए जाना जाता है। रानी लक्ष्मीबाई मराठा शासित झांसी राज्य की रानी और 1857 की राज्यक्रांति की दूसरी शहीद वीरांगना थीं। उन्होंने सिर्फ 29 साल की उम्र में अंग्रेज साम्राज्य की सेना से युद्ध किया और रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हुईं। अमर सेनानी देवीबख्श सिंह गोंडा के राजा थे। उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के आगे समर्पण के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था और पूरी जिंदगी अंग्रेजों के हाथ नहीं आए थे। स्वतंत्रता संग्राम में उनकी सहभागिता का कारण सिर्फ और सिर्फ देशप्रेम था, अपनी हुकूमत अंग्रेजों से बचाना नहीं।