" /> बच निकलनेवाली बिल्लियां!

बच निकलनेवाली बिल्लियां!

कानून से बच निकलने का रास्ता ढूंढ़कर और कानून को धता बताकर सजा को लंबित करने में हमारे देश का कोई सानी नहीं है। ‘निर्भया’ मामले के चारों आरोपियों की फांसी तीसरी बार दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेशानुसार अगले आदेश तक बढ़ा दी गई है। दरअसल, पहले के आदेश के अनुसार चारों को मंगलवार की सुबह फांसी पर लटकाया जाना था। मुकेश कुमार सिंह, पवन गुप्ता, विनय कुमार शर्मा और अक्षय कुमार सिंह नामक चारों आरोपियों के खिलाफ १७ फरवरी को अदालत ने नया ‘डेथ वारंट’ जारी किया था और ३ मार्च को फांसी की तारीख घोषित की थी। इसके पहले इसी प्रकार से ७ जनवरी को भी पहला डेथ वारंट जारी किया गया था। हालांकि इसकी कार्रवाई पहले १७ जनवरी और फिर ३१ जनवरी तक बढ़ा दी गई थी। अब तीसरी बार इन चारों की फांसी आगे सरका दी गई है। आरोपियों के वकीलों द्वारा कानूनी प्रावधान पर ‘उंगली’ रखे जाने से न्यायालय के समक्ष विकल्प नहीं रहा होगा। हालांकि डेथ वारंट (स्थगिति) मांगनेवाले पवन गुप्ता और अक्षय कुमार सिंह की अर्जी को निचली अदालत ने सोमवार को खारिज कर दिया था। पवन द्वारा सोमवार को राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका भेजे जाने से और उस पर निर्णय प्रलंबित होने के कारण फांसी की कार्रवाई को रोका जाए, ऐसा तर्क पवन की ओर से किया गया। इस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने यह कहते हुए सजा को अगले आदेश तक रोक दिया था कि आरोपी की दया याचिका पर पैâसला आने तक फांसी की कार्रवाई नहीं की जा सकती। देश की महिलाओं पर बढ़ते अत्याचारों के बावजूद इस प्रकार से फांसी पर ‘तारीख पे तारीख’ मिलने से आम आदमी में गुस्सा आना स्वाभाविक है। न्याय व्यवस्था के हाथ कानूनी रूप से बंधे होने के बावजूद मुकदमे के हर स्तर पर कानूनी रूप से बच निकलने का रास्ता ढूंढ़नेवाले और कानून को धता बताने का लाभ आरोपियों को मिल रहा होगा तो इस प्रवृत्ति को जाने-अनजाने में बल मिलना कहां तक उचित है? पहले से ही हमारे अलग-अलग कारणों से कई साल तक मुकदमे चलते रहते हैं। ऐसे अटके हुए कई मामले लाखों घरों में देखे जा सकते हैं। महिला अत्याचार-बलात्कार जैसे नृशंस अपराधों का फैसला जल्द आए इसके लिए सरकार ने ‘फास्ट ट्रैक’ अदालत की स्थापना की। इसके बावजूद ‘तारीख पे तारीख’ शुरू है। आंध्र प्रदेश के बलात्कार मामले के आरोपी हैदराबाद पुलिस की ‘कार्रवाई’ में मारे गए। आम जनता के मन में आंध्र प्रदेश द्वारा दिखाई गई इस ‘दिशा’ को ही सही माना जाने लगा है। इसके पीछे पैâसले में देरी का कारण महत्वपूर्ण है। निर्भया जैसे देश को हिला देनेवाले मामले के आरोपियों की फांसी का तिहाड़ जेल में ‘रिहर्सल’ और ‘डमी’ फांसी के बावजूद तीसरी बार टल रही होगी तो और क्या होगा? अदालत हो या सरकारी तंत्र, प्रचलित कानूनी प्रावधानों से उनके हाथ बंधे हैं। इसे स्वीकार कर भी लिया जाए तो कहीं-न-कहीं सजा पर कार्रवाई में विलंब पर पूर्ण विराम लगना आवश्यक है! सर्वोच्च न्यायालय तक फांसी पर मुहर लगने के बाद, राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका खारिज कर दिए जाने के बाद फांसी का रास्ता, जल्लाद की तैयारी, डेथ वारंट, फांसी का दिन और समय निश्चित हो जाने के बाद इस प्रकार से कानूनी रूप से बच निकलनेवाली बिल्लियों की सजा पर कार्रवाई में अड़चन न आए। दुर्भाग्य से निर्भया मामले में जो नहीं होना चाहिए, वही हो रहा है। इसका दोष किसे दें? इस मामले के दोषियों की फांसी कानून के अनुसार और कितनी लंबित होगी? निर्भया की मां को हम इसका क्या जवाब देंगे? भले ही देर हो, ‘न्याय’ मिलने का सुकून उस मां को कब मिलेगा? लंबित होती यह फांसी जनता के मन में व्यवस्था को लेकर बचे-खुचे विश्वास को खत्म न करे और ‘निर्भया’ के परिजनों के लिए ‘गहरा जख्म’ साबित न होने पाए, बस इतना ही!