" /> बजाज का ‘बैंड’

बजाज का ‘बैंड’

एक बड़े तूफान के बाद नुकसान का अनुमान लगाया जाता है। पंचनामा आदि किया जाता है। इसी तरह का पंचनामा अब लॉकडाउन के बाद के नुकसान को लेकर किया जा रहा है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने ‘पुनश्च हरिओम’ का नारा दिया। तदनुसार, मुंबई सहित महाराष्ट्र में नियमों में ढील दी गई है, लेकिन कुछ प्रमुख लोगों के गुट ने ७२-दिवसीय लॉकडाउन का भी पंचनामा शुरू किया है। अचानक लॉकडाउन लादा गया। मुख्यमंत्री ठाकरे पहले ही कह चुके हैं कि इस संबंध में कोई योजना नहीं थी। राहुल गांधी ने भी बिल्कुल वही बात कही और अब देश की अर्थव्यवस्था के बारे में उद्योगपति राजीव बजाज के साथ राहुल गांधी ने सार्वजनिक चर्चा की, उससे लॉकडाउन के बाद की अर्थव्यवस्था का भयानक चेहरा सामने आया है। मोदी सरकार ने निर्मम तरीके से देश में लॉकडाउन लागू किया। इससे कोरोना का प्रसार तो नहीं रुका बल्कि अर्थव्यवस्था उद्ध्वस्त हो गई। राजीव बजाज ने कोई नई बात नहीं कही। देश का उद्यमी, व्यापारी और श्रमिक वर्ग यही कहना चाहता था, लेकिन उन्होंने अनजान डर से चुप रहना ही उचित समझा। राजीव बजाज ने दृढ़ता से अपने विचार व्यक्त किए हैं। लॉकडाउन को लेकर बजाज ने केंद्र सरकार की आलोचना की। इसके लिए उन्हें ‘ट्रोल’ किया जाएगा और राष्ट्र-विरोधी साबित किया जाएगा, लेकिन देश की आजादी के पहले का बजाज परिवार का योगदान और आजादी के बाद अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की उनकी मेहनत देश को पता है। इसलिए दूसरों पर आजमाए जानेवाले ‘हथकंडे’ बजाज के मामले में नहीं चलेंगे। देश की अर्थव्यवस्था के बारे में जो मुद्दे बजाज ने उठाए, सरकार को उसका जवाब देने का साहस दिखाना चाहिए। राजीव बजाज ने ये मुद्दे उठाए-
इस लॉकडाउन के कारण बनी स्थिति में, आर्थिक रूप से मजबूत वर्ग कुछ हद तक सहन कर लेगा। लेकिन यह मजदूरों, गरीबों और किसानों के लिए बहुत मुश्किल समय है।
जापान और अमेरिका जैसे देशों में प्रति व्यक्ति एक हजार डॉलर की सीधी मदद दी गई। यह धन प्रोत्साहन राशि नहीं थी। संस्थानों, संगठनों और नागरिकों को वहां सरकार द्वारा प्रदान की गई सहायता से सीधे लाभ हुआ है। यह अनुपात हिंदुस्थान में जैसे-तैसे केवल १०ज्ञ् है।
हिंदुस्थान जैसा लॉकडाउन किसी भी दूसरी जगह नहीं है। हमें जापान और स्वीडन की तरह एक नीति अपनानी चाहिए थी। वहां नियमों का पालन किया जा रहा है। लेकिन लोग परेशान नहीं हैं। हमारे यहां कोरोना कैंसर के रूप में देखा जाने लगा। हम सच बताने में नाकाम रहे हैं।
हिंदुस्थान दुनिया का एकमात्र देश है, जहां लॉकडाउन के बाद भी कोरोना के मरीजों की संख्या बढ़ रही है। इसलिए हम वापस वहीं आ गए, जहां हम थे।
हिंदुस्थान में तालाबंदी राक्षसी व्यवस्था वाली ही है। विश्व युद्ध के दौरान भी इस प्रकार की तालाबंदी नहीं थी। कोरोना के बारे में लोगों के मन में बैठे डर से छुटकारा दिलवाने के लिए लोगों को एक ठोस दिशा देने की जरूरत है। ये कार्य केवल प्रधानमंत्री ही कर सकते हैं।
श्री राजीव बजाज द्वारा व्यक्त किए गए इन विचारों में राष्ट्र विरोधी जैसा क्या है? राजीव बजाज वाहन उद्योग क्षेत्र का एक बड़ा नाम हैं। वर्तमान अस्थिर अर्थव्यवस्था से यह उद्योग अवश्य प्रभावित होगा, ये तय है, लेकिन केवल ‘लॉकडाउन’ हटाकर लोगों को काम-धंधे पर लगा देना ही इसका हल नहीं है। ‘लॉकडाउन’ कोरोना संक्रमण को रोकने का एक तरीका मात्र था और इसका उपयोग दुनिया भर में किया गया। बजाज वाहन उद्योग को एक तरफ रखकर कोरोना की वैक्सीन ढूंढेंगे तो ही कुछ अच्छा होगा। अन्यथा एकमात्र समाधान धीरे-धीरे ‘लॉकडाउन’ उठाना ही है, जैसा कि हो रहा है। ‘लॉकडाउन’ करते समय ‘नोटबंदी’ की तरह कोई योजना नहीं बनाई गई थी, इस पर चर्चा हो सकती है। तालाबंदी नहीं की गई होती तो विषाणु ज्यादा फैल जाता। रोगियों और मौतों की संख्या में वृद्धि हो सकती थी, यह सच है लेकिन ‘नोटबंदी’ की तरह तालाबंदी की भी कोई योजना नहीं थी। इसका दुष्परिणाम देश भुगत रहा है। ऐसे मामलों में अकेले निर्णय नहीं लिए जाते। सभी को विश्वास में लेकर कदम उठाने होते हैं। गुजरात में राज्यसभा चुनाव में ‘धक्का’ देने के लिए कांग्रेस के विधायक को खरीदना या बहलाना, मध्य प्रदेश में सरकार गिराना और इसके लिए जैसी योजना बनाई जाती है, उसी तरह की योजना तालाबंदी के दौरान भी बनाना बहुत जरूरी था। यहां देश के भविष्य का ही सवाल है। सरकार ने २० लाख करोड़ रुपए का पैकेज दिया, लेकिन निसर्ग तूफान की तरह ही वह पैकेज गरजते हुए आया और चला गया। बजाज ने यही कहा। राहुल गांधी, रघुराम राजन और अब राजीव बजाज ने भी सीधे लोगों की मदद करने की बात कही है, लेकिन कोई योजना और दिशा ही तय नहीं है। यह योजना अब प. बंगाल और बिहार विधानसभा चुनाव में दिखाई देगी। हर किसी को अर्थव्यवस्था को दिशा देने की बजाय राजनीतिक प्रबंधन में अधिक रुचि है। राजीव बजाज ने बताया है कि देश की अर्थव्यवस्था की कैसी ‘बैंड’ बजी है। यह उनकी राय है। सरकार की नीतियों की आलोचना करोगे तो मुसीबत में पड़ोगे, ऐसी सलाह बजाज को दी गई थी, लेकिन जो सुनें वह बजाज कैसे? बजाज गिने-चुने उन औद्योगिक घरानों के प्रतिनिधि हैं जो देश और समाज की परवाह करते हैं। वह उन लोगों में से नहीं हैं जो सरकार की दहलीज पर बैठकर कांट्रेक्ट पाते हैं और बैंक से कर्ज लेकर चूना लगाकर अमीर बनते हैं। राजीव बजाज के पिता राहुल बजाज बेबाकी से सच बोलने के लिए जाने जाते हैं। चमचागिरी आदि से उनका कभी कोई संबंध नहीं रहा। इसलिए बजाज ने देश के कठिन समय के दौरान जो कहा है, वह महत्वपूर्ण है। इससे अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति पता चली। देश को राहुल गांधी का आभार भी मानना ही चाहिए। अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता की तालाबंदी में गांधी ने कई लोगों से बुलवाया। इससे मत-मतांतर पता चलता है, इतना ही।