बदली चाल, बबुआ बेहाल

२०१४ लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा की यूपी में बुरी गत बनी थी। ७३ सीटें जीतकर एनडीए चैंपियन बनी थी। तब से ही सपा के मुखिया अखिलेश यादव का मन कुलबुला रहा था कि वैâसे अपनी डूबती नैया बचाई जाए? इसके बाद जब यूपी में उपचुनाव हुए तो आपसी दुश्मनी भूलकर सपा-बसपा धीरे से करीब आए तो वैâराना, फूलपुर और गोरखपुर जीत लिया। बस यहीं से तस्वीर साफ हो गई थी कि २०१९ के चुनाव में एक-दूसरे की जानी दुश्मन रहीं ये दोनों पार्टियां गठबंधन करेंगी और गठबंधन हो गया। फिर शुरू हुआ ओपिनियन पोल का दौर और यूपी में गठबंधन को ५० से ज्यादा सीटें दी जाने लगीं। कई राजीनितक विश्लेषक हमेशा से अपना ज्ञान परोसते आए हैं कि केंद्र की सत्ता की चाबी यूपी से होकर ही जाती है। बस, अखिलेश के मन में प्रधानमंत्री बनने की ख्वाहिश जाग गई। मगर कहें किससे? खैर, मन में पीएम बनने की आस लिए अखिलेश ने प्रदेश में धुआंधार प्रचार किया। उनका दावा था कि यूपी में भाजपा को १० सीटें भी नहीं मिलेंगी। मगर एक सवाल वे भूूल गए कि यूपी में सभी ८० सीटें गठबंधन जीत भी ले तो उनका कोई प्रधानमंत्री बनेगा क्या? पीएम बनने के लिए २७२ सीटों की जरूरत होती है। कांग्रेस जब यूपी में उनके साथ गठबंधन करना चाहती थी तो उन्होंने उसे भाव नहीं दिया। एग्जिट पाोल्स के बाद हाल बदल गए और बबुआ बेहाल नजर आ रहे हैं। चुप-चुप से हैं। अब सच्चाई जो भी हो पर चुनाव पूर्व कड़वाहट तो हो ही गई। अब चुनाव बाद उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि स्थिति को कैसे नियंत्रण में लाया जाए? क्योंकि बिना कांग्रेस दिल्ली में सरकार बनना काफी मुश्किल है। इसीलिए पिछले तीन दिनों से अखिलेश कहीं नजर नहीं आ रहे और सिर्फ अपनी बुआ के साथ मिल भविष्य की खिचड़ी पका रहे हैं। खिचड़ी जिसे फिलहाल एग्जिट पोल ने तो खराब कर ही दिया है!