" /> बदल रही हैं महिलाएं…

बदल रही हैं महिलाएं…

इन दिनों महिला सशक्तिकरण शब्द को बहुत भुनाया जा रहा है। महिला सशक्तिकरण वास्तव में है क्या? क्या आपको महिलाओं के सशक्तिकरण पर अब भी असमंजस है? महिला सशक्तिकरण के द्वारा ही महिला अधिकारों की बातें होती हैं और आज महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति सजग हैं, जागृत हैं, यह बात आशा से भरे हुए भविष्य की ओर संकेत कर रही हैं।
बाहर निकलकर देखिए क्या आपको अब भी महिलाएं घूंघट लेकर काम करते हुए दिखती हैं? नहीं न!…आप किसी भी दुकान, ऑफिस या मॉल में जाइए आपको पुरुषों की तरह ही वेशभूषा में काम करती चुस्त-दुरुस्त लड़कियां, महिलाएं बड़े आत्मविश्वास के साथ काम करती हुई दिखाई देंगी। यही आत्मविश्वास महिला सशक्तिकरण का बहुत बड़ा उदाहरण है। आज घर में रहनेवाली गृहिणी भी घरेलू उद्योग जैसे वड़ी, पापड़, अचार या अन्य घरेलू वस्तुएं बनाकर आर्थिक रूप से सशक्त हो रही हैं। गांव की महिलाएं भी छोटे स्कूटर चलाकर अपना काम कर रही हैं। सामाजिक रूप में छोटे-छोटे समूह बनाकर गांव में महिलाओं ने अपने खुद के बैंक बना लिए हैं। आज ऑटो हो या गाड़ियां या ट्रेन, महिलाएं एक सजग चालक के रूप में अपना काम संभालना बखूबी जानती हैं। इंजीनियरिंग जैसे जटिल कार्य समझनेवाले क्षेत्रों में भी आज महिलाएं जिस कुशल बुद्धि के साथ देश के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट का काम संभाल रही हैं, वह आश्चर्यचकित कर देता है। सेना में आज महिलाएं पूरे साहस और आत्मविश्वास के साथ कमान संभाल रहीं है। अंतरिक्ष के उपक्रम में आपने महिलाओं की कुशाग्रता देखी ही है। चिकित्सा क्षेत्रों में भी महिला चिकित्सक बहुत अधिक प्रसिद्ध है। बड़े-बड़े उद्योग-जगत की कमान आज महिलाएं संभाल रही हैं। हां, राजनीति में जरूर महिलाओं की भागीदारी का प्रतिशत कम है। किंतु राजनीति में भी महिलाओं का आगे आना जरूरी है क्योंकि इससे ही देश की उन्नति में महिलाओं का योगदान और अधिक बढ़ेगा।
इसी क्रम में ८ मार्च को मनाया जानेवाला अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस समस्त विश्व में मनाया जाता है। विश्व के विभिन्न क्षेत्रों के कार्यरत महिलाओं के प्रति सम्मान एवं उनकी प्रशंसा करने हेतु उन्हें और अधिक प्रोत्साहित करने हेतु इस दिवस को मनाया जाता है।
इस दिवस को मनाने के पीछे का क्या कारण है, इसके लिए हमें वर्तमान से थोड़ा अतीत की ओर जाना होगा। सर्वप्रथम ८ मार्च १९०९ को अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने इसे मनाने पर जोर दिया। महिलाओं की उपेक्षा और लैंगिक समानता के आधार पर ८ मार्च १९१० को इसे अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में पहचान मिली। इसकी एक कड़ी जर्मनी से भी जुड़ती है। जर्मनी जैसे अन्य कई राष्ट्रों में ८ मार्च २०१४ के पूर्व महिलाओं को मतदान की अनुमति नहीं थी अर्थात महिलाएं नागरिक अधिकारों से वंचित रह जाती थीं। किंतु गौर करनेवाली बात यह थी कि उस समय भी महिलाएं बड़े व्यवसाय संभाल रही थीं, मजदूरी भी कर रही थीं, अपना घर भी संभाल रही थीं, सरकार को कर भी दे रही थीं। एक नागरिक के रूप में अपरोक्ष रूप में ही सारे कर्तव्य निभा रही थीं किंतु उन्हें मतदान का अधिकार नहीं था। इस कारण जर्मन में महिलाओं के मन में बहुत अधिक विरोध था। वे अपना हक, अपना मानव-अधिकार मांग रही थीं इसलिए महिलाएं बाहर आकर अपना विरोध प्रगट करने लगीं। यह विरोध तब और अधिक मुखर हुआ जब १९१७ में रूस की महिलाओं ने भी महिला दिवस के दिन ही अपने रोटी और कपड़े के अधिकार के लिए हड़ताल कर दी। यह हड़ताल कई दृष्टियों में महत्वपूर्ण मानी जाती है। जार ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। महिलाओं के इस विराट जुलूस और गंभीर हड़ताल को देखते हुए अंतत: रूस ने महिलाओं को मतदान का अधिकार दिया इसीलिए यह दिन और भी विशेष हो जाता है।
प्रत्येक वर्ष महिला दिवस का एक विशेष उद्देश्य वाक्य होता है, उसी विशेष उद्देश्य को लेकर पूरे वर्ष कार्यक्रम किए जाते हैं। अब यहां मूल प्रश्न यह है कि यदि प्रत्येक वर्ष महिलाओं के लिए कोई विशेष उद्देश्य होता है तो क्या एक वर्ष के भीतर वह उद्देश्य की पूर्ति हो जाती है? यदि नहीं, तो क्या उस उद्देश्य की पूर्ति हेतु सतत कार्य होते रहते हैं? उदाहरण के लिए २०१९ का इसका उद्देश्य वाक्य था ‘समान सोचे, बदलाव के लिए नया करें, ंल्ग्त्् ेस्arू’ अब इस वर्ष २०२० का महिला दिवस का उद्देश्य वाक्य है, ‘मैं लैंगिक समानता, महिलाओं के अधिकारों को महसूस कर रही हूं’ यह उद्देश्य वाक्य बहुत अच्छा है लेकिन लैंगिक समानता और महिलाओं के अधिकारों के प्रति केवल राष्ट्र ही नहीं अपितु संपूर्ण समाज में जागरूकता आनी ही चाहिए। अन्यथा महिला सशक्तिकरण के रूप में मनाया जानेवाला यह ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ केवल एक कार्यक्रम या एक दिवस विशेष की खानापूर्ति बनकर न रह जाए।

– डाॅ. सुषमा गजापुरे (सुदिव)