बरसो, नहीं तो बरसाएंगे!,  महीने के आखिर में सरकार कृत्रिम वर्षा के लिए तैयार

सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र सरकार ने सूखाग्रस्त भागों में जुलाई के अंत तक कृत्रिम बारिश (क्लाउड सीडिंग) कराने की योजना बनाई है। इस योजना का नाम ‘क्लाउड सीडिंग प्रेसीपीटेशन’ दिया गया है। कृत्रिम बारिश कराने के लिए गत मई महीने में वैâबिनेट की बैठक में ३१ करोड़ रुपए की मंजूरी दी गई थी। यह कृत्रिम बारिश विशेषकर सूखा प्रभावित मराठवाड़ा व विदर्भ के जिलों में कराई जाएगी। जिन जिलों में कृत्रिम बारिश कराई जाएगी, उसमें सातारा, सोलापुर, सांगली, नगर आदि जिलों का समावेश है।
कृत्रिम बारिश कराने के लिए केंद्र सरकार से अनुमति मांगी गई है। बाकी अन्य अनुमतियां ले ली गई हैं। कृत्रिम बारिश के लिए सी बैंड डॉपलर रडार और विशेष विमान का उपयोग किया जाएगा। इस विशेष विमान से बादलों के बीच होनेवाले रसायनिक छिड़काव से सूखा प्रभावित क्षेत्रों सहित राज्य के सभीं भागों में बारिश होगी। पुणे की संस्था आईआईटीएम सोलापुर में इस कृत्रिम बारिश के लिए बादलों के बीच तैयारी कर रही है। विशेष तौर पर कृत्रिम बारिश का अधिक असर बांध के क्षेत्रों में हो, इसका भी ध्यान रखा जाएगा। कृत्रिम बारिश के लिए केंद्र सरकार की संस्था क्लाउड इंटरेक्शन एंड प्रेसिपीटेशन इन हैसमेंट एक्सपेरिमेंट (सीएआईपीईईएक्स) अलग से तैयारी कर रही है।

पहले भी हुए थे प्रयोग
महाराष्ट्र में इससे पहले भी कृत्रिम बारिश का प्रयोग किया गया था। २०१५ में कृत्रिम बारिश पर २८ करोड़ रुपए खर्च किए गए थे। मराठवाड़ा के नगर जिला में प्रयोग किया गया था। एक अधिकारी का दावा है कि उस समय २० प्रतिशत अधिक बारिश हुई थी। उसका प्रभाव दूर तक पड़ा था। १९७०-८० के दशक में, उसके बाद २००३ में महाराष्ट्र सरकार ने इस योजना को मंजूरी दी थी, जिसका नाम ‘प्रकल्प वर्षा’ दिया गया था।

मुंबई मनपा ने भी आजमाया था
मुंबई महानगर पालिका ने ७ अगस्त २००९ को कृत्रिम बारिश का प्रयोग किया था। उस समय १६ मीमी बारिश हुई थी। इस प्रयोग में वर्षा विशेषज्ञ शांतिलाल मेकोनी ने २५० ग्राम सिल्वर आयोडाइड का इस्तेमाल किया था जिसे एक चूल्हा किस्म के जनरेटर पर वाषित किया गया था। आयोडाइड की वाष्प ऊपर उठी और छह मिनट पर बादलों की सतह पर पहुंच गई। इससे बादलों का घनत्व बढ़ गया और पानी की बूंदे टपकने लगीं।

ऐसे होती है कृत्रिम बारिश
कृत्रिम बारिश के लिए सिल्वर आयोडाइड या शुष्क बर्फ (ठोस कार्बन डाईआक्साइड) को जनरेटर या विमान के जरिए वातावरण में पैâलाया जाता है। विमान में सिल्वर आयोडाइड के दो बर्नर या जनरेटर लगे होते हैं, जिनमें सिल्वर आयोडाइड का घोल उच्च दाब पर भरा होता है। लक्षित क्षेत्र में विमान हवा की उल्टी दिशा में चलाया जाता है। सही बादल से सामना होते ही बर्नर चालू कर दिए जाते हैं। उड़ान का पैâसला क्लाउड-सीडिंग अधिकारी मौसम के आंकड़ों के आधार पर करते हैं, जिससे लक्षित क्षेत्र में वर्षा होती है।

५० देशों में होती है
पिछले आधी शताब्दी से लगभग ५० देश कृत्रिम बारिश पद्धति का उपयोग कर रहे हैं। इसमें चीन अग्रणी है। चीन के ९० प्रतिशत राज्यों में इसका उपयोग किया जाता है।