बस, जागने की सीमा दस!, चैन से जीना है तो जल्दी सो जाओ ८१% मुंबईकर हैं अनिंद्रा के शिकार

 

मायानगरी मुंबई में मुंबईकर अपनी नींद को अधिक महत्व नहीं दे रहे हैं। इस वजह से अनिद्रा, असंतुलित नींद जैसी समस्याओं ने उन्हें घेर रखा है। रात के समय घंटों मोबाइल में लगे रहना, देर-देर रात तक गेम खेलने के चक्कर में लोगों की नींद पूरी नहीं होती है और वे अनिद्रा के शिकार हो जाते हैं। नींद न पूरी होने के कारण सिर दर्द, एसिडिटी, बदनदर्द, चिड़चिड़ापन आदि जैसे लक्षण उभर आते हैं। एक सर्वे के अनुसार ‘मुंबईकरों को चैन से जीना है तो जल्दी सो जाने की जरूरत है।’ सर्वे के मुताबिक मुंबईकरों को बस, १० बजे तक जागने की सीमा होनी चाहिए और १० से १०.३० बजे तक उन्हें सो जाना चाहिए। सर्वे के मुताबिक ८१ प्रतिशत मुंबईकर अनिद्रा के शिकार हो चुके हैं।
मेडिकल की भाषा में अनिद्रा को ‘इनसोम्निया’ कहा जाता है। इस तरह ८१ प्रतिशत मुंबईकर इनसोम्निया के शिकार हैं, जबकि ७८ प्रतिशत मुंबईकर अपनी नींद पूरी करने के लिए हफ्ते में १ से ३ बार अपने कार्यस्थल पर ही सो जाते हैं। `वेकफिट को’ के सर्वे में यह चौंकानेवाले तथ्य भी सामने आए हैं कि ३६ प्रतिशत लोग ७ घंटे से भी कम सोते हैं और ९० प्रतिशत लोग रात को १-२ बार नींद से उठ जाते हैं, जबकि ऐसा माना जाता है कि हमारे शरीर की आंतरिक घड़ी के लय के संदर्भ में आरामदायक नींद पाने के लिए लगभग रात १० से १०.३० बजे तक हमें सो जाना चाहिए। सर्वे में कहा गया है कि स्मार्टफोन्स से लेकर टीवी तक, विभिन्न प्रकार के प्लेटफॉर्म्स पर असंख्य मनोरंजन लगातार प्रवाहित हो रहे हैं, जो मुख्य रूप से आंखों से नींद को दूर रखने के लिए जिम्मेदार हैं। ९० प्रतिशत लोग सोने से पहले अपने फोन का इस्तेमाल करते हैं। २६ प्रतिशत मुंबईकर रात को जागे रहते हैं क्योंकि वे लैपटॉप्स या स्मार्टफोन पर शो देखते हैं, २३ प्रतिशत लोगों ने बताया कि वह काम या वित्त से जुड़ी परेशानियों को लेकर चिंतित रहते हैं जिससे उन्हें जल्दी नींद नहीं आती। इस सर्वे पर `वेकफिट को’ के सीईओ अंकित गर्ग का कहना है कि ‘नींद की कमी से कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती हैं जो उच्च रक्तचाप से लेकर बेचैनी तक बढ़ा सकती हैं। सर्वेक्षण से हमें पता चला कि वैâसे देशभर में भारतीय इन समस्याओं की उपेक्षा करते हैं। इससे अधिक चिंताजनक है कि उनमें से अधिकांश नींद की बीमारी को वास्तविक समस्या ही नहीं मानते।