बह गया पैसा…

इन दिनों देश में शेयर बाजार से लेकर खुदरा बाजार तक गिरावट का दौर जारी है। शेयर बाजार में कुछ दिनों से जारी गिरावट थमने का नाम नहीं ले रही है। गुरुवार को काम-काज शुरू होते ही शेयर बाजार का सूचकांक एक हजार अंक नीचे आ गया। राष्ट्रीय सूचकांक निफ्टी में भी कुछ अलग नहीं हुआ। निफ्टी भी ३११ अंक से नीचे गिर गया। इस गिरावट के चलते सिर्फ ५ मिनट में निवेशकों के करीब ४ लाख करोड़ रुपए बह गए। पिछले १५-२० दिनों में करोड़ों रुपए शेयर बाजार में आई सुनामी के चलते निवेशकों पर डूबने की नौबत आई है। साथ ही डॉलर की तुलना में रुपए का गिरना भी निरंतर जारी है। गुरुवार को एक डॉलर की तुलना में रुपया ७४.७४ रुपए पर आ गया। मतलब विदेशी मुद्रा के बारे में भी गिरावट थमी नहीं है। शेयर बाजार के व्यवहार से गरीब आदमी का क्या संबंध या वहां होनेवाली करोड़ों रुपयों की गिरावट का आम आदमी पर क्या परिणाम होगा, ऐसा सवाल हमेशा उठाया जाता है। कुछ हद तक इसमें तथ्य होगा और शेयर बाजार मतलब सटोरियों का लेन-देन। इसे विवाद के लिए स्वीकार कर लें तो भी उस बाजार के उतार-चढ़ाव का देश की अर्थव्यवस्था से संबंध होता है। शेयर बाजार धराशायी होने से जिन लोगों के ४ लाख करोड़ रुपए डूबे उसमें आम निवेशक भी हैं। उनकी जेब से यह पैसा भले ही न गया हो लेकिन उनकी जेब में गिरनेवाला यह पैसा बह गया है। शेयर बाजार से लेकर खुदरा बाजार तक इन दिनों यही चल रहा है। इसलिए देश की जनता में शेयर बाजार में गिरावट, सूखा और महंगाई के कारण परेशानी का माहौल है। केंद्र और राज्य सरकार द्वारा दी गई पेट्रोल-डीजल की मूल्य कटौती की राहत भी अस्थायी साबित हुई है क्योंकि उसके बाद भी र्इंधन मूल्यवृद्धि का सिलसिला जारी है। पेट्रोल-डीजल रोज कुछ-न-कुछ पैसों से महंगा होने का सिलसिला थमा नहीं है। सरकार द्वारा ४ से ५ रुपए की मूल्य कटौती के कारण आम जनता की रिसती जेब कुछ समय के लिए थमेगी, ऐसी उम्मीद थी लेकिन वो निरर्थक साबित हुई। सरकार न तो र्इंधन मूल्य वृद्धि रोक पाई है और न ही बढ़ती महंगाई। ऊपर से इस बार बरसात भी कम हुई है। अक्टूबर हीट की आंच इस बार काफी तेज है। उसका असर सब्जी और फलों के उत्पादनों पर हुआ है, जिसके चलते उसके दाम भी बढ़ गए हैं। स्थिति इतनी गंभीर होने के बावजूद अगस्त की तुलना में सितंबर माह में महंगाई दर नीचे आई है, ऐसा सरकार का दावा है। सरकार कागज पर सस्ताई का आंकड़ा दिखा रही है लेकिन प्रत्यक्ष रूप से आम आदमी चारों ओर होनेवाली मूल्यवृद्धि से हताश है। ऊपर से माल्या से लेकर नीरव मोदी तक कई कर्जखोरों के चलते देश का करीब एक लाख करोड़ बह गया है। बैंक की तिजोरी का यह पैसा वापस लाने की बात सरकार कर रही है, कर्ज डुबानेवालों की संपत्ति जप्त करने की कार्रवाई शुरू है मगर यह ऊंट के मुंह में जीरा के समान है। बकाएदार उद्योगपति हों या स्विस बैंक के कालेधन के खातेदार हों, सारा पैसा देश की आम जनता का ही है। जनता ने इसे कर के रूप में देश की तिजोरी में भरा था। मगर वह सीधे कर्ज डुबानेवाले उद्योगपतियों की जेब में और स्विस बैंक के खाते में पहुंच गया। विदेश का कालाधन वापस लाएंगे। प्रत्येक व्यक्ति के बैंक खाते में १५ लाख रुपए जमा कराने का आश्वासन मौजूदा सत्ताधारियों ने दिया था। ये १५ लाख रुपए आज तक जमा नहीं हुए मगर निवेशकों से लेकर आम आदमी की जेब और बैंक खाते खाली हो रहे हैं। शेयर बाजार का निवेश हो या जेब में बचा-खुचा पैसा, महंगाई की बाढ़ में सब बहता जा रहा है। हमारे यहां ऐसा कहा जाता है कि तेजी से बारिश आई और पैसा उसमें बह गया लेकिन न १५ लाख तेजी से आए और न ही बारिश ही तेजी से आई। उल्टे जेब का पैसा बह गया, देश की आम जनता की ऐसी भयंकर दशा हो गई है।