बाइकवालों अपनी गर्दन संभालो!

यदि आपके पास बाइक है तो आपको आगामी दो दिन सावधान रहना है। खासकर उन बाइकवालों को अपनी गर्दन संभालने की जरूरत है जो रोजमर्रा कॉलेज, ऑफिस बाइक से जाते हैं क्योंकि ये दो दिन पतंगबाजी के हैं। मकर संक्रांति के पर्व पर पतंगबाजी की प्रथा तो अच्छी है लेकिन चीनी व धारदार मांजों के कारण खुशियों का यह पर्व कई जिंदगियों में दुख व मातम ले आता है। बाइक चलाते समय ऐसे कई हादसे हुए जहां बाइक सवार के गले को मांजे ने रेत दिया। इन हादसों में कई बाइकचालकों ने अपनी जान गंवाई तो कई गंभीर रूप से घायल भी हुए।

मकर संक्रांति के आगमन की आहट के साथ ही बाजार तिल-गुड़ और पतंगों से सज गए है। दो दिन पहले से रंंग-बिरंगी पतंगों की उड़ान के साथ आसमान भी रंगीन हो गया है। दांव-पेंच के साथ पतंगें कट और बलखाते हुए जमीन पर गिर भी रही हैं। मगर ये पतंगबाजी खतरनाक भी है। किसी की पतंग कटे या न कटे लेकिन बाजार में धड़ल्ले से बिक रहे जानलेवा चीनी मांजे से किसी मनुष्य या प्राणी के कटने की संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता है। खासकर बाइक चालकों को सावधान रहने की जरूरत है क्योंकि हर वर्ष घातक धातुओं से बने मांजे का शिकार वे होते हैं।
गौरतलब है कि सरकार द्वारा चीनी मांजों पर बैन भी लगाया गया लेकिन कुछ लोग चोरी-छिपे उक्त मांजा बेच रहे हैं। पीपल फॉर एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल (पीईटीए) के प्रवक्ता निकुंज शर्मा ने कहा कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने २०१७ में अपने पैâसले में चीनी मांजे पर बैन लगाया लेकिन ग्लास कोटेड और नायलॉन के मांजे अभी बिक रहे हैं। दिल्ली आईआईटी के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के एक प्रोफेसर ने अध्ययन किया और पाया कि ग्लास कोटेड कॉटन मांजा भी उतना ही घातक है जितना चीनी तंगूस मांजा। दिल्ली सरकार ने पहल करते हुए सभी प्रकार के मांजों पर प्रतिबंध लगाया लेकिन हमारी राज्य सरकार कब जागेगी? सर्जन डॉ. चिंतन पटेल ने बताया कि बाइक स्पीड में होने के कारण मांजा शरीर या गले में तुरंत फंस जाता है और गला कट जाता है। यदि मस्तिष्क तक खून पहुंचानेवाली नली को क्षति पहुंचती है तो आदमी की जान तक चली जाती है। कई बार आहार नली और आवाज की नली तक कट जाती है। हाल ही में एक २६ वर्षीय डॉ. रुपाली निकम की मृत्यु बाइक चलाते वक्त गले में मांजा फंसने और कटने से हुई थी।

परिंदों का कैसे होगा इलाज?
घातक मांजों के कारण हर वर्ष कई दर्जन परिंदे घायल होते हैं तो कई की मृत्यु हो जाती है। गौरतलब है कि बड़े जानवरों से लेकर कुत्ता, बिल्ली तक के विशेष डॉक्टर हैं लेकिन पक्षियों को बेहतर इलाज देने के लिए विशेष डॉक्टर नहीं हैं। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि परिंदों का इलाज वैâसे हो? संक्रांति के दौरान कई एनजीओ, पक्षी प्रेमी घायल पंछियों के लिए कार्य करते हैं लेकिन उनकी सर्जरी करने, टाका लगाने और खानपान को लेकर और विशेष देखभाल करने के लिए न तो कोई कोर्स पढ़ाया जाता है न ही कोई डॉक्टर है। चोट पर हल्दी दवा का काम करती है लेकिन विशेषज्ञों की माने तो पक्षियों को हल्दी और आयोडीन लगाने से उनकी स्वास्थ्य समस्या बढ़ सकती हैं।