बाइस्कोप-ऑफर पर सकपका गए फिरोज खान

इंसान अपने आपको खूबसूरत बनाने के लिए क्या कुछ नहीं करता। वह क्रीम-पावडर, फलों के छिलके और न जाने क्या-क्या अपने चेहरे पर लगाता है। बस इसलिए कि वो खूबसूरत लगे। लोग उसे देखें। लेकिन अगर किसी को कुदरत यानी प्रकृति ने ही खूबसूरत बनाकर पैदा किया हो तो उसका कहना ही क्या है। लोगों का उसकी तरफ आकर्षित होना लाजिमी है। यूं तो फिल्म इंडस्ट्री में अपने पैसे या वसीले के बल पर कई लोग फिल्मों में काम करते देखे गए हैं लेकिन एक अभिनेता ऐसा भी था, जिसने बिना किसी की सिफारिश या अपने पैसों के बल पर फिल्म इंडस्ट्री में एंट्री किया।
फिल्म इंडस्ट्री में फिरोज खान पहले ऐसे अभिनेता थे, जिसे उनकी खूबसूरती की वजह से फिल्मों में काम मिला। बंगलुरू के रहनेवाले फिरोज खान एक बार अपनी बहन से मिलने मुंबई आए थे। वे अपनी बहन के यहां ठहरे हुए थे। उनकी बहन के किसी परिचित के यहां कोई पार्टी थी। अपनी बहन के साथ फिरोज खान भी उस पार्टी में गए थे। उस पार्टी में फिल्म निर्माता एस. मुखर्जी भी आए थे। उन्होंने वहां एक खूबसूरत युवक को बैठे देखा। मुखर्जी साहब उस युवक के पास बैठ गए। उन्होंने उस युवक से पूछा कि आपका क्या नाम है? कहां रहते हो? उसने बताया कि मैं बंगलुरू में रहता हूं। मेरे पिता सादिक अली अफगानिस्तान के पठान थे। मेरा नाम फिरोज है। मुखर्जी साहब ने उस युवक से कहा कि फिल्मों में काम करोगे? वह सकपका गया। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वे क्या कह रहे हैं। मुखर्जी साहब ने कहा कि कोई बात नहीं। सोचकर जवाब देना। यह लो मेरा विजिटिंग कार्ड। जब समझ में आ जाए तो ऑफिस आ जाना।
पार्टी खत्म होने पर वह युवक घर आया। सुबह अपनी बड़ी बहन को रातवाली बात बताई। विजिटिंग कार्ड दिखाया। बहन ने कहा कि ये बहुत बड़े लोग हैं। बड़े नसीब से इस तरह का मौका मिलता है। तुम तुरंत जाओ और उन्हें ‘हां’ कह दो। वे मुखर्जी से मिले। मुखर्जी ने अपनी आगामी फिल्म ‘जमाना’ के लिए उन्हें अनुबंधित कर लिया लेकिन किसी कारणवश वह फिल्म नहीं बन सकी। १९६५ में बनी फिल्म ‘आरजू’ से उन्हें ब्रेक मिला। राजेंद्र कुमार, साधना, फिरोज खान अभिनीत यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर इतनी हिट हुई कि फिरोज खान रातों-रात स्टार बन गए।
२५ सितंबर, १९३९ में पैदा हुए फिरोज खान को बचपन से ही स्टाइलिश कपड़े पहनने का बड़ा शौक था। इसी स्टाइल की वजह से कई बार उन्हें स्वूâल से भी बाहर कर दिया गया था। ६० के दशक से ८० के दशक तक फिल्म के सुनहरे पर्दे पर छाए रहनेवाले अभिनेता, निर्माता, निर्देशक फिरोज खान ने हर तरह की फिल्मों में काम किया। ‘ऊंचे लोग’, ‘सैम्सन’, ‘एक संपेरा एक लुटेरा’, ‘आदमी और इंसान’, ‘जांबाज’, ‘कुर्बानी’, ‘गीता मेरा नाम’, ‘दरवेश’, ‘धर्मात्मा’, ‘दयावान’, ‘यलगार’, ‘सफर’, ‘मेला’, ‘उपासना’, ‘अपराध’, ‘खोटे सिक्के’, ‘काला सोना’, ‘मीत मेरे मन का’ आदि फिल्में उल्लेखनीय हैं। १९७१ में उन्होंने फिल्म ‘धर्मात्मा’ का निर्माण किया था, जिसकी पूरी शूटिंग अफगानिस्तान में हुई थी। आज उनका बेटा फरदीन खान फिल्मों में सक्रिय है।